यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी ने 44 धरोहरों को असुरक्षित माना है।
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समय समय पर संग्रहालयों, स्मारकों और धार्मिक स्थलों से सदियों पुरानी कलाकृतियों, मूर्तियों आदि ग़ायब होने की खबर छपती रहती हैं। भारत में ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण प्रदान करने के लिए पहला कानून 1810 में बंगाल रेगुलेशन-19 पारित हुआ।
इसके बाद 1817 में मद्रास रेगुलेशन-8 पारित हुआ। बाद में ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखने के लिए 1958 में प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम संसद द्वारा पारित किया गया।
1972-73 में पुरातत्व और बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम के माध्यम से तस्करी, निजी स्वामित्व एवं इमारतों और धरोहर को संरक्षण करने का कानून बना था।
संरक्षण और कानून
आज भी देश में इस तरह की तस्करी में सजा अधिकतम तीन साल की कैद और केवल 2,000 रुपये जुर्माना जो इस तरह के अपराध को बढ़ावा ही दे रहे हैं। समय आ गया है कि कानून में बदलाव किए जाये जिससे ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा की जा सके।
विश्वभर में कुल 1052 विरासत स्थल हैं। इनमें 814 सांस्कृतिक ,203 प्राकृतिक और 35 मिश्रित हैं। अभी विश्व में 226 हेरिटेज सिटी हैं। यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी ने 44 धरोहरों को असुरक्षित माना है। इनमें प्रमुख अफगानिस्तान की बामियान वैली, इजिप्ट का अबू मैना, येरुशलम शहर, डोमेस्टिक रिपब्लिक ऑफ कांगो की पांच धरोहरें हैं।
अंतर्राष्ट्रीय महत्व के धरोहरों के यथोचित देखभाल के लिए विश्व विरासत कोष वार्षिक चार मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करता है। जरूरत और संकटग्रस्त स्थलों को धन आवंटन में प्राथमिकता दी जाती है। यूनेस्को हर साल 25 वैश्विक धरोहरों को विरासत की सूची में शामिल कर रहा है जिससे अधिक से अधिक विरासतों को संरक्षित किया जा सके।
बीते हुए समय को तो वापस नहीं लाया जा सकता लेकिन बीते समय की अनमोल निशानियों को अवश्य ही सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। कोविड-19 महामारी के कारण पिछले दो वर्षों से विरासतों के रखरखाव में कमी आने लगी थी, किन्तु पुनः यूनेस्को से जुड़े विभिन्न संगठन जागरूकता कार्यक्रम चला कर इनके संरक्षण को बढ़ावा दे रहे हैं।
विश्व धरोहर प्रवाल भित्तियों से सम्बंधित आंकड़े चिंताजनक होते जा रहे हैं। यूनेस्को ने विश्व धरोहर - सूचीबद्ध चट्टानों की लचीलापन को बढ़ावा देने के लिए आपातकालीन योजना शुरू की है।
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदा, खराब नीति जैसी संभावित स्थितियों में विरासत को संरक्षित करने नयी तकनीकों का सहारा लेना जरूरत बन गई है।
इस क्षेत्र में 3डी स्कैनिंग उपकरण एक नई तकनीक है जो न केवल स्थिति को डिजिटलाइज करता है बल्कि प्रतिकृति के लिए एक 3डी आभासी (वर्चुअल) मॉडल भी प्रदान करता है। किसी भी संग्रहालय के कलाकृतियों को भी डिजिटलाइज करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। प्रौद्यौगिक प्रगति संरक्षण में लाभकारी ही सिद्ध हो रहा है।
हमारा भारत भी ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक एवं संस्कृतियों कलाकृतियों, स्मृतियों एवं स्थलों से परिपूर्ण देश है। ये विरासत के स्थल संसार के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को अपने देश की विरासत स्थलियों पर गर्व होना चाहिए तथा उनके संरक्षण के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
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