विश्व पर्यावरण दिवस 2022
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भारत का नाम दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों के देश में शुमार है। अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में लगभग 700 मिलियन लोग प्रदूषित हवा के बीच जीवन-यापन कर रहे हैं। कोरोना महामारी ने हमें जिस हाल में लाकर खड़ा किया है वह चिंतनीय है।
एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के कारण समय के पहले मौतें हो रही हैं और यह अब तक का शीर्ष रिकॉर्ड है। राष्ट्रों के लिए अच्छी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता जरूर है लेकिन लोगों का स्वस्थ रहना और स्वस्थ वातावरण में रहना भी उतना ही जरूरी है। हमें यह समझना होगा कि अर्थव्यवस्था प्रकृति का विकल्प कभी नहीं बन सकती।
अनियंत्रित ग्रीन हाउस गैस हमारे स्वास्थ्य और हमारे जीवन के लिए सबसे बड़ा जोखिम हैं। जलवायु परिवर्तन का कारण बनने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करके हम प्रदूषण में कटौती कर सकते हैं। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी स्वास्थ्य चेतावनियां नजर अंदाज करने योग्य नहीं हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शोध के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण वातावरण में गर्मी बढ़ती जाएगी और कुपोषण में वृद्धि होगी। एक अनुमान है कि इससे वर्ष 2030 और 2050 के बीच प्रति वर्ष लगभग 2,50,000 मौतें हो सकती हैं।
आज पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली वैज्ञानिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की प्रमुख चिंताओं में से है। पारिस्थितिक तंत्रों बहाली में नष्ट हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों का पुनर्विकास और उनका संरक्षण ही एक मात्र रास्ता है जिससे अभी भी इस दिशा में हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।
समृद्ध जैव विविधता के साथ स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र, अधिक उपजाऊ मिट्टी, लकड़ी और मछली की बड़ी पैदावार, और ग्रीन हाउस गैसों के बड़े भंडार जैसे उपाय इस अभियान में सहायक हो सकते हैं। इसके अलावा सक्रिय वृक्षारोपण से भी प्रकृति के संरक्षण में मदद मिलेगी।
घटती जैव विविधता
ईश्वर ने हमें एक धरती दी है, हमने उसे विविधता दी लेकिन धीरे-धीरे तमाम तरह की हमारी गतिविधियों ने शुद्ध प्रकृति को बिगाड़ दिया। जैव विविधता घटती चली गई और मनुष्य ने पृथ्वी पर प्रदूषण का भार लगातार बढ़ाया। भूमि, जल, वायु हर तरह प्रदूषण से पूरी दुनिया अट गई है। आज वायु प्रदूषण, खराब अपशिष्ट प्रबंधन, पानी की बढ़ती कमी, गिरता भूजल स्तर, जल प्रदूषण, वनों की अंधाधुंध कटाई, जैव विविधता की हानि और मिट्टी का क्षरण भारत के लिए प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दे हैं।
इन सबके अलावा चक्रवात, भूकंप और बाढ़ जैसी पर्यावरणीय आपदाएं हैं जो पहले से कहीं अधिक विकराल हैं। इन सभी से निपटने के लिए पूरी दुनिया को को एक साथ आने की आवश्यकता है। पूरी दुनिया में पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए छोटे-बड़े सभी तरीके एक साथ, एक ही पैमाने पर अपनाए जाने चाहिए। घर के पानी बचाने से लेकर गीले और सूखे कचरे को छांटकर कचरे के निपटान जैसे कामों से भी इसकी शुरुआत की जा सकती है।
वर्षा जल संचयन, प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग पर रोक, भोजन की बर्बादी पर रोक एवं पर्याप्त जागरूकता पैदा करने के लिए पर्यावरण क्लब आदि भी काफी महत्त्वपूर्ण उपाय साबित होंगे। दुनिया के देशों को अपनी कूटनीति, राजनीति और सीमावर्ती लड़ाइयों से ऊपर उठकर कम से कम मनुष्य के अस्तित्व के लिए एक सार्वभौमिक नीति पर अमल करना ही होगा, नहीं तो कैसे बचेगी पृथ्वी?
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