साठ के दशक में जापान की फ़िल्मों ने दुनिया में धूम मचा दी
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साठ का दशक रहा काफी धमाकेदार
साठ के दशक में जापान की तीन फ़िल्मों ने दुनिया में धूम मचा दी, ‘रासोमोन’, ‘सेवेन समुराई’ तथा ‘टोक्यो स्टोरी’ आज भी सर्वोत्तम फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। 1950 में अकीरा कुरोसावा की 88 मिनट की ‘रासोमोन’ ने अकादमी पुरस्कार जीता। इस क्राइम, मिस्ट्री ड्रामा फ़िल्म में डाकू (तोशिरो मिफ़ुन), पत्नी (मैचिको किओ), समुराई के भूत (मैसायुकी मोरी) तथा एक लकड़हारे (ताकासी शिमुरा) के द्वारा पत्नी के बलात्कार एवं उसके समुराई पति की हत्या को याद किया गया है।
कोई भी पूरा सच नहीं बता रहा है। सब अलग-अलग बात कह रहे हैं। इस फ़िल्म को कई अन्य पुरस्कार प्राप्त हुए। कुरोसावा की ‘सेवेन समुराई’ (1954) से प्रभावित हो हॉलीवुड में ‘द मैग्नीफ़िसेंट सेवेन’ बनी।
इसी दशक में यासुजीरो ओज़ु की ‘टोक्यो स्टोरी’ आई। यह फ़िल्म 1953 में बनी पर आज भी यही कहानी है। 136 मिनट की इस फ़िल्म में एक वृद्ध दम्पति अपने वयस्क बच्चों से मिलने शहर जाते हैं, मगर उपेक्षा का शिकार होते हैं। बेटा-बेटी के पास पैसे हैं, समय नहीं है, केवल एक बहु उनका थोड़ा ध्यान रखती है। फ़िल्म को ब्रिटिश फ़िल्म संस्थान का पुरस्कार मिला था।
इसी काल में युद्ध विरोधी दो फ़िल्में (‘द बर्मीज हार्प’ तथा ‘फ़ायर्स ऑन द प्लेन’) भी बनी। युकिओ मिशिमा के उपन्यास ‘टेंपल ऑफ़ द गोल्डेन पैवेलिअन’ पर ‘एन्जो’ (1958) नाम से फ़िल्म बनी। ‘द ह्युमन कंडीशन’ त्रयी भी इसी काल की देन है। ‘द बर्मीज हार्प’ में जब एक जापानी सैनिक अपने लोगों के समर्पण में असफल रहता है, तो वह बौद्ध भिक्षु का जीवन अपना लेता है।
सत्तर का दशक
सत्तर के दशक में टीवी के आगमन से जापानी सिनेमा की हानि हुई लेकिन टेक्निकलर में कई फ़िल्में बनी। तीन घंटे की डॉक्यूमेंट्री ‘टोक्यो ओलिम्पियाड’ उनमें से एक है। नगीसा ओशिमा, सुसुमु हानी, कैनेटो शिन्डो, शोहेइ इमामुरा इस काल के प्रसिद्ध निर्देशक हैं। ‘वुमन इन द डून्स’ को कान समारोह में स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार मिला, इसे ऑस्कर में नामांकन भी प्राप्त हुआ।
अस्सी और नब्बे के दशक में जापान में कई पोर्नोग्राफ़िक फ़िल्में बनीं। इसी काल में हैयाओ मियाज़ाकी ने प्रसिद्ध एनीमेशन फ़िल्म ‘नौसिका ऑफ़ द वैली ऑफ़ विंड’ बनाई। करीब दो घंटे की इस फ़ीचर लेंथ सफल एनीमेशन को कई पुरस्कार प्राप्त हुए। शोहेइ इमामुरा ने 1983 में ‘द बालाड ऑफ़ नारायामा’ (1958) का रिमेक बनाया और कान में गोल्डेन पॉम अपनी झोली में कर लिया। उन्होंने पिछली सदी के अंतिम दशक में एक बार फ़िर इस पुरस्कार को (इरानी निर्देशक किआरोस्तामी को भी मिला) फ़िल्म ‘दि ईल’ के लिए प्राप्त किया। ताकेशी किटानो को ‘हाना-बी केलिए गोल्डेन लायन मिला।
नई सदी की शुरुआत में किन्जी फ़ुकासाकु की फ़िल्म ‘बैटल रॉयल’ एक कल्ट फ़िल्म बन गई। यह फिल्म भविष्य को भयंकर मनहूस ढंग से प्रस्तुत करती है। बेरोजगारी, झुंड-के-झुंड छात्रों का स्कूल को नकारना, अपहरण, आत्मविश्वास की कमी, अत्याचार-अपराध आदि इसके कथानक का हिस्सा हैं। 2001 में हायाओ मियाज़ाकी की ‘स्पिरिटेड अवे’ को सर्वोत्तम एनीमेशन फ़ीचर का अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
‘डॉल’, ‘ज़टोइची’, ‘प्रिंसेस राकून’, ‘डिस्टेंस’, ‘नोबॉडी नोज’, ‘गोड्ज़िला: फ़ाइनल वार्स’ 21वीं सदी में जापान से आने वाली कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं।
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