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इसरो के चंद्रयान-2 की टीम में महिला वैज्ञानिक और भारतीय समाज

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चंद्रयान-2 के प्रोजेक्ट में दो महिला वैज्ञानिकों को भी शामिल किया गया है। - फोटो : ISRO
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ऐसा कहा जाता है कि बहुत पहले अर्थात् वेदों और उनके बाद के भी कुछ समय तक भारत में विदुषी और विज्ञान के क्षेत्र में भी कार्य करने वाली महिलाओं का समाज में एक विशेष स्थान था। वह किसी भी प्रकार से अनावश्यक रीति-रिवाजों और रुढ़ियों से बंधी हुई नहीं थी। उनके आने-जाने पर कोई बंदिश या पाबंदी नहीं थी।

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दरअसल, किसी हद तक वह स्वतंत्र थीं और स्वनिर्णय लेने में सक्षम थीं। किसी भी प्रकार के पर्दे या घूंघट के आवरण से वह दूर थीं। शायद उस समय और कोई सभ्यता ऐसी मौजूद नहीं थी जिसमें महिलाओं का यूं बराबरी का दर्जा मिलता हो।

यूनान और भारत की सभ्यता 
प्राय: यूनान देश और उसकी सभ्यता के बहुत गुण गाए जाते हैं। अंग्रेजी शासन में इसके इतिहास को बहुत जोरों से पढ़ाया जाता रहा और भारतीय इतिहास को एकदम भूलाने की कोशिशें की जाती रहीं पर उस यूनानी सभ्यता में भी महिलाएं दोयम दर्जें की ही मानी जाती थीं और उन्हें अध्ययन करने की कोई छूट नहीं थी। जबकि भारतीय समाज की महिलाएं उस समय या काल में शिक्षित होती थीं।
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भारतीय महिला वैज्ञानिक और समाज की धारणा
बहरहाल, भारत में अब पुन: महिला वैज्ञानिकों की धाक जमने वाली है जो समाज में फैली इस धारणा पर गहरी चोट करेगी कि महिलाएं नाजुक कामों के लिए बनी हैं और बहुत साहस व हौंसले वाले कामों में उनकी यह कोमलता आड़े आ जाती है।

खास बात यह है कि भारत में अब महिलाओं पर विश्वास करने व उनकी योग्यता व क्षमता को सही प्रकार से आंकने का नजरिया बनने लगा है। विज्ञान के क्षेत्र में तो प्राय: यही कहा जाता था कि महिलाएं अर्थात् युवतियां विज्ञान के विषयों और गणित में न तो रुचि लेती हैं और न ही इन विषयों को लेकर कुछ विशेष करना चाहती हैं। लेकिन अब हालात यह हैं कि युवतियों ने विज्ञान को ही अपनी उच्च शिक्षा में अध्ययन का विषय बनाया है।
 

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इसरो के इस मून मिशन की लॉन्चिंग रितु करिधाल श्रीवास्तव के सुपरविजन में होगी जो उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वाली हैं। - फोटो : Social Media
इसमें इसरो में कार्यरत् महिला वैज्ञानिकों का बहुत बड़ा योगदान है कि जब उनके बारे में जानकारी मिली और पढ़ने-सुनने को मिला तो कई युवतियां इससे बहुत प्रभावित हुईं और इससे प्रेरित होकर उन्होने अपने उच्च अध्ययन के लिए विज्ञान के विषयों का चुनाव किया और अब भी इस विषय को चुन रही हैं। इसके लिए यदि उन्हें कम्फर्ट जोन से भी बाहर आना पड़े तो भी वह इसके लिए पूरी तरह से तैयार होती दिखाई दे रही हैं। 

यही नहीं उनके माता-पिता भी अब उनके साथ सहयोग करते हैं और वह यदि अपने घर से दूर भी किसी विशेष स्थान पर जाकर इस अध्ययन को पूरा करना चाहती हैं तो वह इसकी अनुमति भी दे देते हैं। भले ही वे यदि स्वयं इसके महत्व को समझ पाएं या नहीं पर बेटी की रुचि व इच्छा में बाधा नहीं बनना चाहते। इसे एक सुखद परिवर्तन कहा जा सकता है।

इसरो का बड़ा चमत्कार 
इधर जब से इसरो ने अपने चंद्रयान-2 की कमान दो महिलाओं को सौंपने की घोषणा की है तब से महिलाओं के विज्ञान के क्षेत्र में और अधिक संख्या में आने की संभावना और बढ़ी है। इसे एक बहुत बड़ी पहल कहा जा सकता है। यह भारत का पहला ऐसा अंतरग्रहीय मिशन है जिसमें महिला सक्रिय रूप से भाग लेंगी और उनकी सफलता को विश्व देखेगा।

एक ओर एम वनिता चंद्रयान-2 की प्रोजेक्ट इंजीनियर हैं और रितु करिधाल मिशन डायरेक्टर होंगी। जब इसरो प्रमुख ने इन दो महिला वैज्ञानिकों की घोषणा की तो अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा में इसकी बहुत चर्चा की और इसरो की इस घोषणा का स्वागत किया। जाहिर है अब तो विश्व जान गया है कि भारतीय महिला वैज्ञानिक भी किसी भी प्रकार कमतर नहीं है और भारतीय महिलाओं की योग्यता व क्षमता भी कम नहीं है। 

पुरषों ने साइंस, मैथ्स और इससे जुड़े सभी क्षेत्रों में अपना ही वर्चस्व बना रखा था पर महिलाओँ ने भी इस क्षेत्र में कदम रखकर यह बता दिया है कि उनमें योग्यता व क्षमता कहीं भी कम नहीं है।

दरअसल, यह महिलाओं की अप्रतिम योग्यता ही है कि वह अपने घर तथा अपने वैज्ञानिक स्वरूप दोनों को मैनेज कर रहीं हैं। विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के रोल को पहचानने में देर तो लगी पर आखिर इसे पहचान ही लिया गया। इसरो के इस योगदान की सराहना की जानी चाहिए। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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