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पुण्यतिथि विशेषः जब नीरज के इस गीत पर राज कपूर और शंकर-जयकिशन कर उठे वाह-वाह

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गोपालदास नीरज के गीतों ने एक पीढ़ी को प्रभावित किया। - फोटो : अमर उजाला
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प्रेम और विरह के यशस्वी गीतकार गोपालदास नीरज के गीतों के श्रृंगार ने कभी हमारे युवा सपनों को आसमान और परवाज़ बख़्शा था। उनके गीतों में खामोशी से चीखती विगत् प्रेम की वेदना ने हमारी नम आंखों को रुमाल और आंसुओं को तकिया मुहैय्या कराया था।

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हमारी पीढ़ी के लोग उनके शब्दों में मुखर श्रृंगार और उदासियों की पीड़ा के साथ ही जवान और बूढ़े हुए। अपनी बेपनाह रुमानियत से नीरज जी ने हिंदी गीतों और ग़ज़लों को समृद्ध किया है। यह और बात है कि हिंदी की पूर्वग्रहग्रस्त आलोचना ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे।

गीतों से फिल्मी दुनिया का सफर 
साहित्य के अलावा हिंदी फ़िल्मी गीतों को नया तेवर, कोमलता और संस्कार देने के लिए भी उन्हें जाना जाता है। गीतकार के तौर पर उनकी पहली फिल्म थी संगीतकार रोशन के साथ 'नई उमर की नई फसल' जिसके गीतों - 'कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे', 'देखती ही रहो आज दर्पण न तुम' और 'आज की रात बड़ी शोख बड़ी नटखट है' ने अपने दौर में धूम मचा दी थी।
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उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं - मेरा नाम जोकर, गैम्बलर, तेरे मेरे सपने, पहचान, पतंगा, चा चा चा, दुनिया, शर्मीली, प्रेम पुजारी, कल आज और कल, चंदा और बिजली, फरेब, लाल पत्थर और कन्यादान।

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गोपालदास नीरज जी को उनके छंदबद्ध गीतों, गीतिकाओं के सौन्दर्य के लिए जाना जाता है। - फोटो : फाइल फोटो

साहित्य में रचा गीतों का सौंदर्य 
गोपालदास नीरज जी को उनके छंदबद्ध गीतों, गीतिकाओं के सौन्दर्य के लिए जाना जाता है, लेकिन एक विचित्र तथ्य यह भी है कि हिंदी सिनेमा में छंदमुक्त गीतों के प्रवर्तक भी वही थे। वह पहला छंदमुक्त गीत था राज कपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' का।

राज कपूर को सर्कस के विदूषक की अपनी भूमिका में गाने के लिए लीक से हटकर कोई एक गीत चाहिए था। ऐसे किसी गीत की रचना के लिए उनके यहां एक बैठक हुई जिसमें नीरज जी के अलावा संगीतकार शंकर जयकिशन शामिल हुए। कई-कई विकल्पों पर बात चली, लेकिन राज जी को संतोष नहीं हुआ। उन्हें अपने हर काम में परफेक्शन चाहिए था। कुछ अलग और भव्य। देर रात बिना नतीजे के गोष्ठी विसर्जित हो गई।

यह सिलसिला लगातार चार रातों तक चला। पांचवीं रात नीरज जी ने गीत में कुछ नया प्रयोग करने की अनुमति मांगी। सोचते-सोचते किसी और ही प्रसंग में उनके मुंह से निकल गया - 'ऐ भाई, ज़रा देख के चलो' ! राज जी को गीत के मुखड़े के तौर पर यह पंक्ति पसंद आई तो बात आगे बढ़ी। गीत बनकर तैयार हुआ जिसमें जीवन की विवशता, क्षणभंगुरता और संसार की नश्वरता का दर्शन था।

इधर, गीत सुनकर शंकर जयकिशन ने हाथ खड़े कर दिए - 'इसकी धुन बनाना मेरे लिए मुमकिन नहीं। यह कैसा गीत है जिसमें न मुखड़ा है और न अंतरा। यह है क्या चीज़' ?' राज जी ने कहा - 'कविता तो अच्छी है, लेकिन फिल्म के लिए इसे धुन में बांधना मुश्किल होगा।' नीरज जी ने उन्हें समझाया - 'इस फिल्म का केन्द्रीय पात्र जोकर है। वह अपनी बात परिष्कृत नहीं, थोड़े व्यंग्यात्मक और थोड़े विचित्र तरीके से ही कहेगा। उससे क्लासिकल अथवा बंधे-बंधाए तरीके से गाने की आप उम्मीद नहीं कर सकते'।

कुछ सोचकर राज कपूर ने नीरज जी से कहा - 'अच्छा, इस गीत को आपको मंच पर गाना हो तो कैसे गाएंगे ?' नीरज जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में इस मुक्त छंद गीत को गाना शुरू कर दिया। शंकर जयकिशन और राजकपूर इस धुन पर 'वाह वाह' कर बैठे।

अंततः नीरज जी की गायन शैली की तर्ज़ पर गीत की धुन तैयार हुई जिसे मन्ना डे ने अपनी गंभीर और दार्शनिक आवाज़ देकर अमर कर दिया। नीरज जी की देखा-देखी बाद में गीतकार आनंद बख्शी ने भी फिल्मों में कई छंदमुक्त गीत लिखे। उनमें से एक गीत 'अच्छा तो हम चलते हैं' बहुत मकबूल हुआ था।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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