बीते करीब 34 महीने से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच जारी जातीय हिंसा से जूझ रहे पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद नए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार बहाल हो गई है। लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या इससे जमीनी परिस्थिति में कोई खास सुधार आएगा? सरकार के गठन के बाद बदलते घटनाक्रम से तो यह उम्मीद बेईमानी ही लगती है।
केंद्र और मणिपुर के विभिन्न समुदाय के विधायकों और नेताओं के बीच दिल्ली में कई दफे की बैठक के बाद पूर्व विधानसभा युमनाम खेमचंद सिंह को विधायक दल का नेता चुना गया था।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सत्ता का संतुलन साधने की कवायद में कुकी और नागा समुदाय के एक विधायक को उप-मुख्यमंत्री के तौर पर सरकार में शामिल करने का फैसला किया था। लेकिन राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के तौर पर कुकी समुदाय की विधायक नेम्चा किपगेन ने जिस तरह दिल्ली के मणिपुर भवन से ही वर्चुअल तरीके से शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया उससे इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं है।
आखिर वही हुआ जिसका डर था। कुकी-जो समुदाय ने अगले दिन से ही इसका विरोध शुरू कर दिया। राज्य के कई इलाकों में नए सिरे से हिंसा हुई और कुकी संगठनों ने बंद बुलाया। हालांकि नेम्चा किपगेन ने तमाम समस्याओं को बातचीत के जरिए सुलझाने की जरूरत पर जोर दिया है। लेकिन कुकी समुदाय अपने इलाके में स्वायत्त प्रशासन की पुरानी मांग पर अड़ा है।
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि तीन मई, 2023 से ही राज्य में दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से जारी हिंसा में ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों बेघर हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 60 हजार से ज्यादा लोग अब भी विभिन्न राहत शिविरों में रह रहे हैं।
अब नई सरकार की सबसे बड़ी चुनौती मैतेई और कुकी समुदाय के बीच आपसी भरोसा बहाल करना और राहत शिविरों में रहने वालों को उनके घरों तक लौटाना है। लेकिन कुकी संगठनों के रवैए को देखते हुए सरकार की राह आसान नहीं लगती। राज्य की 60-सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के 37 विधायक हैं।
इनमें से सात कुकी समुदाय के हैं। कुकी समुदाय के कुल 10 विधायक हैं। यह राज्य घाटी और पर्वतीय इलाके में बंटा है। मणिपुर घाटी में विधानसभा की 40 सीटें हैं और कुकी-नागा बहुल पर्वतीय इलाके में बीस सीटें।
दरअसल, राज्य में सरकार की बहाली भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और केंद्र सरकार के लिए मजबूरी थी। पहली बात यह थी कि अगले सप्ताह राष्ट्रपति शासन को एक साल पूरे होने वाले थे। उसे और बढ़ाने के लिए संसद में संविधान संशोधन कानून पारित करना पड़ता।
इसके अलावा अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। राष्ट्रपति शासन में चुनाव होने की स्थिति में भाजपा के हाथों से सत्ता निकलने का खतरा था। एनडीए के विधायक बीते दो महीने से केंद्र पर राज्य सरकार को बहाल करने के लिए दबाव बना रहे थे। उनकी दलील थी कि राज्य की परिस्थिति के कारण ही लोकसभा में पार्टी को दोनों सीटें गंवानी पड़ी थी। बीते महीने से ही राज्य के विभिन्न इलाकों में 'सेव मणिपुर' रैलियों का आयोजन किया जा रहा था।
विपक्षी कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा ने अपने सियासी हितों को ध्यान में रखते हुए राज्य में सरकार तो बहाल कर दी है। लेकिन कुकी समुदाय को भरोसा में लिए बिना की गई इस कवायद ने समस्या को और उलझा दिया है। नतीजा सामने हैं। शपथ ग्रहण के अगले दिन से ही महिला उप-मुख्यमंत्री के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकारी बहाली की कवायद में कुकी समुदाय की अलग स्वायत्त या केंद्रशासित प्रदेश की मांग पर न तो कोई चर्चा की गई और न ही कुकी संगठनों से इस पर बातचीत की गई। उनके मुताबिक, केंद्र को इस मुद्दे पर कुकी संगठनों को साथ लेकर ही आगे बढ़ना चाहिए था।
विश्लेषकों की राय में राज्य में हिंसा में भले कुछ कमी आई है, जमीनी तस्वीर में खास बदलाव नहीं आया है। अब भी मैतेई और कुकी समुदाय के लोग एक-दूसरे के इलाके में जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। इस खाई को पाटने के साथ ही लोगों में भरोसा पैदा किए बिना राज्य में सामान्य स्थिति की बहाली दूर की कौड़ी ही लगती है।
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