भारतीय जनता पार्टी काफी समय से यह दावा करती आ रही है कि 'एक देश एक चुनाव' चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। लिहाजा भाजपा की केन्द्र सरकार ने सितंबर 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में 'एक देश, एक चुनाव' की संभावनाएं तलाशने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। जिसने 191 दिनों के मंथन के बाद मार्च 2024 में राष्ट्रपति को एक रिपोर्ट सौंपा।
रिपोर्ट में कहा गया कि 15 दलों को छोड़कर बाकी 32 दलों ने साथ-साथ चुनाव कराने का समर्थन किया और कहा कि ये तरीका संसाधनों की बचत, सामाजिक तालमेल बनाए रखने और आर्थिक विकास को तेजी देने में मदद करेगा। लेकिन इस प्रस्ताव के खिलाफ भी कई तर्क हैं।
इनमें दो तर्क बहुत महत्वपूर्ण हैं, पहला, नियमित चुनावों होने से,सरकार लोगों की इच्छा को सुनने के लिए बाध्य होती है, जबकि एक साथ चुनाव होने से सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही में कमी आएगी मैंने इस तर्क को खंगालने की कोशिश की, क्या एक साथ चुनाव होने की व्यवस्था से सरकार निरंकुश हो सकती हैं? कार्यकाल पूरा होने से पहले सरकार गिरती है तो एक देश एक चुनाव का क्या होगा?
'एक देश, एक चुनाव' के खिलाफ दूसरा महत्वपूर्ण तर्क है कि लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय हित के मुद्दे प्राथमिकता में होते है, जबकि राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होते हैं। ऐसे में एक साथ चुनावों के कारण, राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के मुद्दों पर हावी हो सकते है। इस तर्क में भी दम है, इसलिए सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में जनता कैसे जवाबदेह सरकार या जनप्रतिनिधि का चुनाव करेगी?
इन दोनों तर्कों के पड़ताल में मैंने ये पाया कि असल में एक देश एक चुनाव का विरोध सिर्फ इसलिए है क्योंकि राजनीतिक दल जनता को मूर्ख समझते हैं और ये मानकर चलते हैं कि सरकारी तंत्र जनता को प्रभावित करता है।
'एक देश, एक चुनाव' की व्यवस्था के खिलाफ इन तर्कों का और गहराई से पड़ताल करें तो हम सभी जानते हैं कि कैसे चुनावों में मतदान और मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है। जातीय समीकरण, स्थानीय समीकरण, हाल के वर्षों में फ्री बीज कल्चर, दक्षिण में आरक्षण का वादा।
इन सबके अतिरिक्त बहुत स्थानीय स्तर पर थाना, कचहरी की राजनीति से जनता के मत को प्रभावित किया जाता रहा है। फिर जवाबदेही और राष्ट्रीय व राज्य के मुद्दों का तर्क बेमानी है। फिर भी इसे तथ्यों और आंकड़ों के जरिए समझने के लिए हम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के विश्लेषण को आधार मान लेते हैं जो चुनाव आयोग के आंकड़ों के हवाले से रिपोर्ट तैयार करता है।
एडीआर अपनी रिपोर्ट में एक डिस्क्लेमर देता है कि इस तरह की जानकारी का उद्देश्य के वल हमारी चुनावी और राजनीतिक प्रक्रिया में धन के बढ़ते उपयोग को उजागर करना है ताकि पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन की प्रणाली को सुगम बनाया जा सके और मतदाताओं को एक सूचित विकल्प बना ने में सक्षम बनाया जा सके ।
जाहिर है, 'एक देश, एक चुनाव' का पूरा कॉन्सेप्ट ही चुनावी खर्चों में कटौती का है। ऐसे में एडीआर की रिपोर्ट यह समझने के लिए काफी है कि घोषित चुनावी खर्च से जनता को कैसे प्रभावित किया जाता है।
एडीआर ने 2024 के लोकसभा चुनाव में हुए खर्च का विश्लेषण किया। और पाया कि 32 में से 5 राष्ट्रीय और 27 क्षेत्रीय दलों ने 16 मार्च से छह जून, 2024 के बीच 3,352.81 करोड़ रुपये खर्च किए। यह खर्च लोकसभा चुनावों के साथ-साथ हुए आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उडीसा और सिक्किम विधानसभा चुनावों के दौरान का है।
इस खर्च में राष्ट्रीय दलों का योगदान 2,204 करोड़ रुपये यानी 65.75 फीसदी रहा। भाजपा ने लगभग 1,494 करोड़ रुपये खर्च किए, जो कुल चुनावी व्यय का 44.56 फीसदी था। कांग्रेस ने 18.5 प्रतिशत यानी 620 करोड़ रुपये खर्च किए।
दिलचस्प यह है कि कुल चुनावी खर्च में केवल प्रचार पर ही 2,008 करोड़ रुपये खर्च किए गए जो सबसे ज्यादा खर्च है। इसमें भी 1,511.30 करोड़ रुपये राष्ट्रीय दलों ने और 496.99 करोड़ रुपये क्षेत्रीय दलों ने खर्च किए।
अब इन आंकड़ों से दो बातें निकलकर सामने आती हैं। पहला, ये वो आंकड़े हैं जो चुनाव आयोग की वेबसाइट पर हैं। जाहिर है असल खर्च के आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हुए होंगे।
दूसरा लोकसभा चुनाव के साथ आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश,उड़ीसा और सिक्किम विधानसभाओं के चुनाव भी संपन्न हुए। इसमें बहुत से दलों ने लोकसभा विधानसभा के खर्चे एक साथ दिखाए हैं, जिससे पता चलता है कि एक साथ चुनाव होने से संसाधनों की बचत हुई है। और इससे क्षेत्रीय दलों के चुनाव प्रचार पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।
पांच राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस और भाजपा ने लोकसभा और चार विधानसभाओं का चुनाव एक साथ लड़ा। बसपा ने लोकसभा के साथ तीन राज्य विधानसभाओं का चुनाव लड़ा।सीपीएम ने भी लोकसभा के साथ तीन राज्य विधानसभाओं का चुनाव लड़ा। जबकि आम आदमी पार्टी ने लोकसभा के साथ उड़ीसा विधानसभा का चुनाव लड़ा।
इन सभी दलों को एक ही खर्च पर चुनाव प्रचार करने को मिला। साथ ही आंध्र प्रदेश की दो बड़े दल तेलगू देशम और वाईएसआर कांग्रेस को राज्य विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव का प्रचार भी करना कम खर्चीला ही लगा होगा। उड़ीसा विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल को राज्य विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव लड़ा। जिससे प्रचार के खर्च कम तो जरूर हुए होंगे।
अब नतीजों के साथ जवाबदेही और मुद्दों का विश्लेषण कर लीजिए। आंध्र प्रदेश में 175 विधानसभा सीटें हैं। तेलगू देशम ने 135 सीटें जीती जबकि पूर्ववर्ती सरकार वाईएसआर कांग्रेस को 11 सीटें हासिल हुई। हालांकि वाईएसआर कांग्रेस 2019 के चुनाव में 151 सीटें मिली थी।
ऐसे में स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों का कोई प्रभाव नहीं था स्थानीय मुद्दों पर वाईएसआर कांग्रेस को करारी हार मिली। दूसरी तरफ उड़ीसा में बीजू जनता दल 24 वर्षो से सत्ता में थी। बावजूद इसके भाजपा उड़ीसा विधानसभा में 78 सीट ही जीत सकी, बहुमत से 4 सीट ज्यादा।
यदि हम यह मान भी लेते है कि 24 साल के शासन से जनता में एक एंटी इंकबेंसी होता है। तो भी भाजपा की जीत औसत रही और खुद उसके प्रदेश अध्यक्ष चुनाव हार गए। यदि राष्ट्रीय मुद्दे राज्य के मुद्दों पर हावी थे तो उड़ीसा विधानसभा चुनाव के नतीजे कुछ और होते। तीसरा प्वाइंट महत्वपूर्ण है। मान लीजिए 'एक देश, एक चुनाव' लागू रहता तो लोकसभा चुनाव के साथ दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी होता।
दिल्ली में लोकसभा चुनाव छठे चरण में 25 मई 2024 को हुआ और आठ महीने बाद 8 फरवरी 2025 को दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा ने 2014 और 2019, दोनों लोकसभा चुनावों में दिल्ली की सभी सातों सीटें जीती थीं। 2024 में भी भाजपा ने सभी सात सीटें जीती। लेकिन 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को अप्रत्याशित जीत मिली थी, लेकिन 2025 में भाजपा दिल्ली में सरकार बनाने में कामयाब रही। यानी यहां अलग अलग चुनाव होने से भी राष्ट्रीय मुद्दे और स्थानीय मुद्दों का घालमेल नहीं हुआ।
रहा सवाल जनता के प्रति जवाबदेही की तो जब प्रचार से जनता प्रभावित नहीं हुई, तो सत्ता को सवाल का जवाब देना ही पड़ेगा। अब आइए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी और भाजपा के चुनावी खर्चों का विश्लेषण करते हैं जिससे पता चला है कि 69 में 31 विधायकों ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में तय सीमा के 50 प्रतिशत से कम चुनाव राशि खर्च की घोषणा की है।
अगर घोषित खर्चों को सही मान लेते हैं तब भी दिल्ली विधानसभा का चुनाव यदि लोकसभा चुनाव के साथ होता तो चुनावी नतीजों में कोई खास अंतर नहीं मिलता। मसलन आम आदमी पार्टी के विजयी विधायक आले मोहम्मद खान सबसे ज्यादा मत पाने वाले उम्मीदवार रहे जबकि उन्होंने चुनाव प्रचार में सबसे कम खर्च किया।
चुनाव आयोग को अपने खर्चे का जो ब्यौरा आम आदमी पार्टी ने दिया है उसके मुताबिक पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में प्रचार पर 14.51 करोड़ रुपए खर्च किए जबकि लोकसभा चुनाव में उसने आठ करोड़ छत्तीस लाख रुपए खर्च किए थे।
जाहिर है दिल्ली के दोनों चुनाव साथ साथ होते तो जनता के प्रति जवाबदेही और मुद्दों का कोई घालमेल नहीं होता। अब आप खुद आंकलन करें कि एक देश एक चुनाव किस आधार पर संघीय ढांचे के खिलाफ है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एक साथ चुनाव कराना बहुत ही चुनौती पूर्ण होगा।
पहली बार तो लोकसभा और संबंधित राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को संशोधित करके सभी चुनाव, एक साथ कराए जा सकते हैं। लेकिन ऐसी स्थिति को लंबे समय तक बनाए रखना चुनौती पूर्ण होगा, क्योंकि, जैसे ही कोई सरकार अपनी विधानसभा में विश्वास खो देती है, यह व्यवस्था फिर से अस्त-व्यस्त हो जाएगी। लेकिन इसका कतई मतलब नहीं कि आप सुधार प्रक्रिया को रोके, सुधार निरंतर होने वाली प्रक्रिया है ये गणित का फ़ार्मुला नहीं है कि दो दूनी चार ही होगा।
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