अब आगे-
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो हर विचार महत्वपूर्ण होता है। उसके जन्म के पीछे भी कुछ ठोस कारण होते हैं। अपने शुद्ध रूप में विचार शायद ही कभी मरता है लेकिन अगर उसका राजनीतिक-सामाजिक एप्लीकेशन विफल हो जाए तो विचार महज कतिपय लोगों की बौद्धिक जुगाली भर रह जाता है। विचारों के इस संघर्ष को क्रिकेट की भाषा में समझें तो दो विचारों के मुकाबले में व्यावहारिकता की भूमिका अंपायर की होती है। दूसरे, मूल विचार यदि समय के साथ कदमताल नहीं कर पाए तो वह हाशिए पर चला जाता है, भले ही उसके अनुयायी इसे स्वीकार करें या न करें।
कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में वैध रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियां हैं, उन पर कभी सरकार ने प्रतिबंध नहीं लगाया। लेकिन उनके अनुषांगिक संगठनों जैसे कि सीपीआई (मार्क्सवादी), सीपीआई ( मार्क्सवादी लेनिनवादी) पीपुल्स वॉर तथा माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर पर प्रतिबंधित किया गया है। ये सभी सशस्त्र विद्रोह के समर्थक हैं। उनका विश्वास संवैधानिक लोकतंत्र में नहीं है। जबकि आरएसएस पर उसकी स्थापना से लेकर अब तक तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। लेकिन हर प्रतिबंध के बाद आरएसएस की ताकत बढ़ती गई।
संघ और वामपंथ
संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा और वामपंथियों की जनवादी विचारधारा की तुलना करते समय हमे इन घटकों का खास ध्यान रखना होगा। ये हैं- विचार की प्रासंगिकता, सामयिक सकारात्मक बदलाव और राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से उसकी व्यावहारिकता और लोकस्वीकार। संघी और वामी विचारों में में प्रतिबद्धता की कमी नहीं है, वैचारिक और लक्ष्यगत स्पष्टता है, सुगठित संगठन और कैडर भी है।
एक का कार्यकर्ता स्वयंसेवक है तो दूसरे का कॉमरेड। हालांकि आरंभ में दोनों का लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास नहीं था, लेकिन आजादी के बाद दोनो ने बहुदलीय लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को स्वीकार किया और इसी दायरे में अपना मार्च शुरू किया।
वामपंथियों की सफलता यह रही कि उन्होंने गरीबों, मजदूरों और किसानों को अपनी राजनीति और क्रांति के आग्रहों के केन्द्र में रखा। उस हिसाब से नीतियां बनाने का दबाव बनाया। जबकि आरएसएस जो आरंभ में केवल हिंदुओं को सांस्कृतिक, सैनिक आधार पर संगठित करने का पैरोकार था, उसने भी अपनी राजनीतिक शाखा जनसंघ स्थापित की और तत्कालीन धर्मनिरपेक्ष और कदाचित धर्म को हिकारत के भाव से देखने के आग्रह के खिलाफ बहुसंख्यकों को संगठित करना शुरू किया। हालांकि इसमें कुछ खतरे भी हैं।
संघर्ष और परिवर्तन के सौ साल
अब जबकि दोनों अपने संघर्ष और परिवर्तनों के सौ साल पूरे कर रहे हैं तो यह तुलना अस्वाभाविक नहीं है कि यह देखें कि कौन कहां खड़ा है? हालांकि यह कोई मेडल जीतने की रेस नहीं है, और न ही इसमें कोई अंतिम फैसला दिया जा सकता है, फिर भी समीक्षक दृष्टि यह मांग करती है कि विचारों का धरातल पर सफलता का परिमाण क्या है, आज स्टैंडिंग क्या है और कल उनका भविष्य क्या है?
सवाल यह भी है कि एक वैकल्पिक व्यवस्था और जन केन्द्रित शासन प्रणाली का विचार लेकर बढ़ रहे कम्युनिस्ट अस्सीवें साल तक आते-आते हाािए पर क्यों चले गए? ‘जन’ ने ही उन्हें ज्यादा तवज्जो क्यों नहीं दी? उनका जन केंद्रित विचार-आचार भारतीय जन में ही क्यों गहरी पैठ ( यहां बात सीपीएम की नहीं है) नहीं बना पाया?
क्या वामपंथी भारतीयों के मानस और उसकी गढ़न को ठीक से समझ नहीं पाए या फिर जनता से उसे अपने अनुकूल नहीं पाया? दूसरे, बौद्धिक तर्क-वितर्क आम जनता के गले तब तक नहीं उतरते, जब तक आप उसे उसकी भाषा, मान्यताओं और आग्रहों के अनुरूप नहीं समझा पाते तथा जनता खुद उसे अपने हित में नहीं मानती। अन्यथा वो विचार एक व्यापक और सर्व समावेशी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आंदोलन में नहीं बदल सकता। इसके लिए विचार की सरलता और बोध गम्यता भी जरूरी है।
वामंपथी विचारधारा इस मोर्चे पर व्यावहारिक दृष्टि से जड़ लगती है। वामपंथ में प्रतिबद्धता पर बहुत ज्यादा जोर है, वह ठीक भी है, लेकिन विचार अगर व्यावहारिता से संगति नहीं बिठा पाता तो वह जड़ता के स्पैम बॉक्स में चला जाता है। यूं वामपंथी संघियों की ‘अबौद्धिक’ कहकर आलोचना करते हैं, लेकिन तुलनात्मक रूप से देखें तो संघियों की कथित ‘अबौद्धिकता’ में भी व्यावहारिकता और सहज बोध का भाव ज्यादा है। इसी कारण उनकी पहुंच और स्वीकार्यता लोगों के बीच लगातार बढ़ती रही है।
दरअसल देश में जातिवादी और सम्प्रदायवादी राजनीति के उभार और बदलती वैश्विक व्यवस्था ने भी कम्युनिस्टों को दुविधा में डाला है, क्योंकि इससे उनकी ‘अंतरराष्ट्रीय भाईचारे’ की राजनीति भी मुश्किल में पड़ गई है। ऐसा ही मामला सोशल इंजीनियरिंग का भी है। इसकी तुलना संघ से करें तो संघ के सर्वोच्च पद सरसंघचालक पर भी सवर्ण और खासकर ब्राह्मण ही रहे हैं।
संघ में कभी कोई दलित भी सरसंघचालक बनेगा, यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन संघ ने जातीय उत्थान के प्रयोग अपनी राजनीतिक शाखा भाजपा में बड़े पैमाने पर शुरू कर दिए हैं। यही कारण है कि अगड़ों के अलावा पिछड़ों और अब दलितों और आदिवासियों में भी संघ विचारधारा की स्वीकार्यता पहले से बढ़ी है। जबकि जिन राज्यों में कम्युनिस्ट कभी बहुत ताकतवर थे, वहां भी उनकी चादर सिकुड़ती जा रही है।
वो इस सच्चाई को स्वीकार करने अभी भी तैयार नहीं हैं कि भारतीय जीवन शैली में धर्म की महत्ता सनातन है। उसका उपयोग राजनीतिक दृष्टि से किया जाए या नहीं, अथवा कितना किया जाए, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन उसे खारिज तो कदापि नहीं किया जा सकता। संघ ने अपनी नाव उसी दरिया में उतार दी है, जिसे कम्युनिस्टों ने प्रतिगामी और समाज के लिए अफीम निरूपित किया था। हालांकि माकपा घुमाफिराकर इसे मंजूर कर रही है।
वामपंथियों द्वारा किसान-मजदूरों के शोषण का विरोध बिल्कुल जायज है। लेकिन इसके लिए पूंजी और पूंजीपतियों का अंध विरोध बेतुका है। इसी तरह सभी संसाधनों पर सरकार के नियंत्रण का आग्रह भारत में इसलिए फेल हो गया, क्योंकि सरकारी तंत्र में कार्यसंस्कृति, जवाबदेही और बुनियादी ईमानदारी का अभाव है। कार्यसंस्कृति विहीन कोई भी देश सफल नहीं हो पाया है।
जिन देशों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कम्युनिज्म को अपनाया, उन्होंने भी धीरे-धीरे उससे पल्ला छुड़ा लिया और जिन गिने-चुने देशो में अभी भी साम्यवाद सत्ता में है, वह असल में साम्यवाद, पूंजीवाद, राष्ट्रवाद और नस्लवाद का अजब प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष घालमेल है, जिसे ज्यादा से ज्यादा ‘सत्तावाद’ ही कहा जा सकता है।