लोकपाल विधेयक 2001 में भी संसद में पेश किया गया था लेकिन बाद में वापस ले लिया गया।
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कहीं लोकायुक्त है कहीं तो सदस्य नहीं हैं
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशल की रिपोर्ट के अनुसार 22 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में सभी आवश्यक उपलोकायुक्तों (सदस्य) की नियुक्ति नहीं हुई। आज एक देश एक कानून की बात तो होती है मगर लोकायुक्त कानूनों में एक रूपता नहीं है।
हिमाचल प्रदेश में जहां शिकायत दर्ज करने का शुल्क मात्र 3 रुपये है, वहीं गुजरात और उत्तर प्रदेश में यह शुल्क 2000 रुपये रखा गया है। कुछ राज्यों ने संसद द्वारा पारित लोकायुक्त कानून के मजमून को अपनाने के बजाय अपनी सुविधानुसार कानून बना दिए।
उत्तराखण्ड जैसे राज्य में संसद द्वारा पारित मजमून के अनुसार बने कानून को नहीं माना जा रहा है और अपना अलग कानून बनाने का तर्क देकर मौजूदा कानून के अनुसार लोकायुक्त का गठन नहीं किया जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के निदेर्शाें के बावजूद लोकायुक्त का गठन करने के बजाय राज्य सरकार समान नागरिक संहिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है जबकि केन्द्र सरकार स्वयं समान नागरिक संहिता बनाने जा रही है। अगर केन्द्र का कानून बनता है तो अनुच्छेद 254-क के अनुसार उत्तराखण्ड के कानून का अस्तित्व नहीं रह जाता है।
सन् 60 के दशक से चल रही थी लोकपाल की मुहिम
शासन-प्रशासन में सुचिता और सुशासन के लिए एक सशक्त भ्रष्टाचार विरोधी संस्था की वकालत सन् 1960 के दशक से शुरू हो गई थी। इस तरह की एक संस्था की कल्पना सबसे पहले 1963 में विख्यात न्यायविद डॉ. एल.एम. सिघ्वी ने की थी। सन् 1967 में मोरारजी देसाई प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के आधार पर अगस्त 1968 में लोकपाल विधेयक संसद में पेश हुआ जो पारित नहीं हुआ।
लोकपाल विधेयक 2001 में भी संसद में पेश किया गया था लेकिन बाद में वापस ले लिया गया। तीसरा लोकपाल विधेयक 2011 में संसद में पेश किया गया था।
इस विधेयक पर महत्वपूर्ण बहस और चर्चा हुई लेकिन पारित नहीं किया जा सका। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013, विधेयक का अंतिम संस्करण था जो अंततः कानून बन गया। संसद द्वारा पारित इस विधेयक को 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई।
उड़ीसा ने सबसे पहले बनाया लोकपाल कानून
केन्द्र में लोकपाल-लोकायुक्त कानून आने के बाद उड़ीसा पहला राज्य था जहां 14 फरवरी 2014 को संसद द्वारा पारित कानून के मुताबिक लोकायुक्त कानून बना था और उसके बाद उत्तराखण्ड दूसरा राज्य था जिसका लोकायुक्त कानून 26 फरवरी 2014 को अस्तित्व में आया था। लेकिन इतने साल बाद भी उस कानून के अनुसार उत्तराखण्ड को एक अदद लोकायुक्त नहीं मिल सका।
सन् 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद मौजूदा कानून को नकार कर 100 दिन के अंदर एक नया मजबूत लोकायुक्त कानून लाने के साथ ही लोकायुक्त के गठन का वादा किया गया था, लेकिन न तो नया कानून आया और ना ही सौ दिन के बजाए 6 साल गुजरने पर भी नया लोकायुक्त अस्तित्व में आया।
राज्य में जो कानून 2014 में पारित हुआ था उसका अभी तक निरसन नहीं हुआ। इसका मतलब है कि उत्तराखण्ड में अपना कानून मौजूद है जिसे संसद की स्वीकृति तक हासिल है, फिर भी लोकायुक्त के गठन को टालने के लिए बहाने बनाए जा रहा हैं। सन् 2017 में तत्कालीन सरकार लोकायुक्त पर जो कानून बनाना चाहती थी उसका विधेयक ही कालातीत हो गया। इसलिए फिलहाल 2014 का कानून ही अस्तित्व में है।
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