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राजस्थान से एमपी और मिजोरम से तेलंगाना तक नये संकट में कांग्रेस, मुश्किल में राहुल.!

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Congress
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कांग्रेस पार्टी के लिए इससे खराब स्थिति और क्या होगी कि जो पार्टी कभी वटवृक्ष की तरह पूरे हिन्दुस्तान में फ़ैली हुई थी वह वक़्त की मार से आज अपने सबसे दुर्बल स्वरूप में है। बिखरे संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं के सूखे ने उसे ऐसे मोड़ पर ला दिया है, जहां से पुराने आकार को हासिल  करना कोई आसान चुनौती नहीं है। पार्टी ने क़रीब दो दशक बादअपनी क़िस्मत की कुंजी नए अध्यक्ष को सौंपी है,जिसकी स्लेट अभी कोरी है। 

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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव आज़ादी केआंदोलन से निकली इस वयोवृद्ध पार्टी का पुनर्जन्म कर सकते हैं। लेकिन इससे पहले विकराल चुनौतियों से पार पाना होगा। यह कोई आसान काम नहीं है। कांग्रेस के लिए यह संक्रमण काल है। तीन राज्यों में बसपा से तालमेल नहीं होने से कांग्रेस को आंशिक नुकसान तो होना ही है। कांग्रेस में एक पार्टी के भीतर अनेक पार्टियां तो  खेमों की शक्ल में हमेशा रहीं हैं। 

राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ - फोटो : Twitter Congress @INCIndia
अभी नहीं तो कभी नहीं 
एक बड़ा नेता अपना अपना खेमा मज़बूत करता रहा और पार्टी की जड़ें कमज़ोर करता रहा। इस बार भी दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस पार्टियां एक बैनर तले एकत्रित हैं। तीन चुनावों में लगातार शिकस्त के बाद हौसला पस्त है। संगठन दरका हुआ है, कार्यकर्ताओं का टोटा है, ख़ज़ाना खाली है और उम्मीदवार आयात किए जा रहे हैं। पार्टी के लिए अभी नहीं तो कभी नही वाली स्थिति है।

राहुल को करना होगा ये करिश्मा 
दरअसल, पहली बार पार्टी में ऐसा पहली बार दिख रहा है,जब प्रदेश में पार्टी के दिग्गज राष्ट्रीय अध्यक्ष को दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी ने पहले पैराशूट प्रत्याशियों को टिकट नहीं देने की घोषणा कर स्थानीय कार्यकर्ताओं में आशा जगाई, मगर प्रादेशिक क्षत्रपों के बीच घमासान को देखते हुए उन्हें इस नीति को ताक में रखना पड़ा। कांग्रेस के सामने 1980 के चुनाव में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी, जब कांग्रेस आई को उम्मीदवार तक नहीं मिल रहे थे। उस चुनाव में मतदाताओं ने सिर्फ़ इंदिरागांधी को देखा था। पार्टी सत्ता में आ गई थी। क्या राहुल गांधी यह करिश्मा कर सकते हैं? 

राहुल गांधी - फोटो : PTI
एमपी में पार्टी की रणनीति 
मध्यप्रदेश चुनाव में पार्टी ने लोहे को लोहे से काटने की नीति अपनाई है। यह एक जोख़िम भरा दांव है, जो काम बीजेपी ने पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ किया था, वही कांग्रेस अब बीजेपी के साथ कर रही है। यानी कांग्रेस के उम्मीदवारों को अपने पाले में लाकर उन्हें टिकट देने का दांव काफी हद तक कामयाब रहा था। इस बार कांग्रेस ने यही काम किया है। इससे बचे-खुचे अनेक कांग्रेसियों ने बग़ावत की राह पकड़ ली है।  हालांकि कांग्रेस के लिए यह राहत की बात है कि मध्यप्रदेश में अभी भी उसका ठोस जनाधार है। सिर्फ़ उसे बचाकर रखने की गंभीर चुनौती है। राजस्थान में कांग्रेस अपेक्षाकृत बेहतर है और चुनौतियों का आकार भी विराट नहीं है। बीस साल से यह प्रदेश हर चुनाव में पार्टी बदल देता है। 

इस परंपरा के नाते इस बार कांग्रेस की बारी है। अलबत्ता पार्टी संगठन के सामने उम्मीदवारों का चुनाव कठिन हो रहा है। पार्टी अशोक गहलोत, सचिन पायलट और कुछ स्थानीय नेताओं के समूहों में विभाजित है। क़रीब-क़रीब सारे पूर्वानुमान इस बार राजस्थान में कांग्रेस के पक्ष में हैं, इसलिए कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षा जाग उठी है। दोनों पार्टियों के बीच वोटों का अंतर बहुत अधिक नहीं है। 

BJP, Congress, TRS
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति 
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लिए हालत उलझन भरी है। पिछले चुनाव में दोनों दलों के बीच एक फ़ीसदी से भी कम वोट का अंतर था, लेकिन बीजेपी ने अंतिम क्षण में बाज़ी मार ली थी। पिछले बार अजित जोगी कांग्रेस में थे। इस बार अपनी पार्टी बनाकर मय कुनबे के विरोध में हैं। बहुजन समाज पार्टी से उनकी पार्टी का तालमेल है। ध्यान देने की बात है कि देश में छत्तीसगढ़ नोटा का इस्तेमाल करने में अव्वल रहा था। तीन फ़ीसदी से भी अधिक  वोट नोटा को मिले थे। अगर नोटा और जोगी-बसपा गठबंधन ने 5 फ़ीसदी वोट भी ले लिए तो सत्ता की तश्तरी कांग्रेस के हाथ आते-आते फिसल जाएगी। पिछले चुनाव में कांग्रेस के अनेक दिग्गज नक्सली हमले में मारे गए थे। पार्टी का वह घाव भी अभी भरा नही है ।

telangana
तेलंगाना में स्थिति 
तेलंगाना में कांग्रेस अपनी खोई ज़मीन तलाशने की कोशिश कर रही है। तेलंगाना में 119 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस 14 विधायकों के साथ दूसरे नंबर पर है। तेलुगुदेशम पार्टी भी तेलंगाना में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। दोनों पार्टियों का गठबंधन यकीनन टीआरएस की चिंताएं बढ़ा सकता है। कभी मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव तेलुगुदेशम और कांग्रेस के साथी रह चुके हैं। इसी कारण उनकी पार्टी ने कांग्रेस- तेलुगुदेशम के वोट बैंक में सेंध लगाई थी। टीआरएस के पास अभी 90 विधायक हैं। यह संख्या 70 -75 तक घटने के पूर्वानुमान लगाए गए हैं, इसलिए चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम,तेलंगाना जन समिति और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का चुनावी तालमेल लाभ की स्थिति में है। अगर यह गठबंधन पचास-साठ सीटों पर कामयाबी हासिल करता है तो कांग्रेस के लिए प्राणवायु बन जाएगा। 
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मिजोरम की स्थिति 
मिजोरम कांग्रेस के लिए संभवतया सबसे कम मुश्किल वाला राज्य है। वहां सत्ता में होते हुए भी उसके लिए बहुत कठिनाई नज़र नही आती।40 सीटों वाली विधानसभा में अभी 34 सीटें कांग्रेस के पास हैं। बीजेपी को अभी वहां खाता खोलना है। बीजेपी ने कांग्रेस के एक दिग्गज और मौजूदा विधानसभा में स्पीकर हिफेई  को चुनाव से ठीक पहले पार्टी में लेकर कांग्रेस को झटका देने की कोशिश की है। 

फिलहाल इस झटके का असर ज़्यादा बड़ा नही है। लेकिन इस बार मिजोरम के मुख्य चुनाव अधिकारी पर खुल्लमखुल्ला पक्षपात और राज्य सरकार का विरोध करने के आरोप लग रहे हैं। इस सिलसिले में उन्हें दिल्ली भी तलब किया गया था। उनके खिलाफ आंदोलन इतना तेज़ था कि मुख्यमंत्री ललथन हावला तक अपने गृहनगर से नामांकन दाखिल नहीं कर पाए। कुल मिलाकर मिजोरम में चुनौती विपक्ष को है, सत्ता पक्ष को नहीं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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