फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आप भी इंग्लिश बोलते हैं तो जरूर पढ़ें ये रिपोर्ट, हिंदी पर हैरान कर देगी ये स्टडी

Tue, 06 Nov 2018 01:36 PM IST
श्रीवर मुंशी
विज्ञापन
हिंदी - फोटो : Pixabay
विज्ञापन

एक अध्ययन के अनुसार अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति के लिए मानव मस्तिष्क में 100000 से लेकर 350000 शब्दों का विशाल भंडार होता है। हां, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि वो भाषा कब की और कहां की है। उस भाषा की विकास यात्रा कितनी पुरानी है और उस भाषा का मूल स्रोत कहां निहित है। किसी भी भाषा के समृद्ध होने के मूल कारकों में सबसे महत्वपूर्ण कारक है उस भाषा की निरंतरता और उस भौगोलिक क्षेत्र की विविधताएं एवं सांस्कृतिक विकासक्रम-काल।

विज्ञापन

अंग्रेजी भाषा - फोटो : Pixabay
तीन भागों में बंटी होती है भाषा 
भाषा वैज्ञानिकों के मतानुसार भाषाओं को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। जीवित, मृत और लुप्त भाषाएं। जीवित भाषा वो सारी भाषाएं हैं जो बोलचाल और संवाद स्थापित करने के लिए उपयोग में हैं। ऐसी लगभग 19700 भाषाएं सिर्फ भारतवर्ष में ही हैं। ऐसी सारी भाषाएं जो व्याकरण के कठोर अनुशासन से मुक्त हैं और समय और स्थान के साथ अपना स्वरूप बदलती रहती हैं, वो जीवित भाषा की श्रेणी में आती हैं। लुप्त भाषाएं जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैं वो सारी ज्ञात-अज्ञात, पठित-अपठित भाषाएं, जो विलुप्तप्राय हो चुकी है और दुनिया के किसी भी समूह द्वारा वर्तमान में प्रयोग नही हो रही हैं।

क्या है भारतीय भाषाओं की स्थिति 
भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक आबादी, (लगभग 47 करोड़) द्वारा उपयुक्त खड़ीबोली जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जिसे मगही, अवधि, बुंदेलखण्डी, भोजपुरी इत्यादि भाषाओं का सामूहिक प्रतिनिधित्व और संविधान में राजभाषा की प्रतिष्ठा प्राप्त है। लेकिन जैसा कि हिंदी की अपनी पूर्णतः स्थापित व्याकरण है और हर लिखे और बोले जाने वाले वाक्य का व्याकरण की कसौटी पर जांच की जा सकती है।

इस शर्त के कारण हिंदी राजभाषा, जो देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और जिसका अपना पूर्णतः परिभाषित व्याकरण है, मातृभाषा की श्रेणी में आती है। परिणाम स्वरूप यह अपरिहार्य है कि हिंदी के शब्दों (कभी-कभी तत्सम शब्दों) के लिए आग्रह भी स्वयमेव उपस्थित हो जाता है। ऐसे में राजभाषा के रूप में हिंदी के स्थापित होने के राह में एक मुख्य अड़चन यह आती है कि उपयुक्त शब्द ज्ञान के अभाव में हम हिंदवी (पारसी, अरबी) और ज्यादातर अवसरों पर अंग्रेजी शब्दों का सहारा लेने लगते हैं।

हालांकि, हिंदी शब्द कोष, संस्कृत सूत्र के कारण दुनिया का सबसे समृद्ध शब्द कोष हैं। लेकिन सबसे त्रासदपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हम अपने भाषा दारिद्रय को छुपाने के लिए एक ऐसी भाषा का सहारा लेते हैं जिसमे हमारी बहुसंख्यक आबादी लगभग अपढ़ है। जी हां, हम एक ऐसी भाषा का चादर ओढ़ लेते हैं जो मूल रूप से अपरिभाषित और दरिद्र है। वो भाषा है अंग्रेजी, जिसके पास अपना शब्दकोश इतना छोटा है कि इसका वाक्य-विन्यास बिना सहायक और पूरक शब्दों के संभव ही नही हो सकता। 
विज्ञापन

अंग्रेजी भाषा - फोटो : Pixabay
क्या कहती है अंग्रेजी और हिंदी की शोध 
तमाम शोधों से यह साबित हो चुका है कि किसी को अपने मातृभाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में  बोलने के लिए उसके पास मात्र 800 से 1000 शब्द ही होते हैं जिन्हें वह तोड़-मरोड़ कर अपनी बात कहता है। दूसरी भाषा में लिखने वाले ज्यादातर लोग अधिकतम 5000 शब्दों का ज्ञान रखते हैं। कुछ मामलों में 300 से 500 अतिरिक्त शब्द भंडार उस व्यक्ति के पास तब होता है, जब वह इंसान किसी खास क्षेत्र में अध्ययन किया हो। उदाहरण के लिए एक चिकित्सक या रसायनशास्त्री या अर्थशास्त्री अपने अध्ययन क्षेत्र के कुछ अतिरिक्त शब्दों का धनी हो सकता है।

अन्य भाषा में बोलने और लिखने के प्रति उसके प्रयास के पीछे अपने अतिरिक्त ज्ञान का बखान करने और दूसरे को नीचा दिखाने की हिंसक प्रवृति काम करती है। हर समाज में एक ऐसा वर्ग होता है, जो इस मानसिक विकृति का शिकार होता है जो अपने आपको प्रबुद्ध और अभिजात्य वर्ग का समझता है। जैसे ब्रिटेन का अभिजात्य वर्ग फ्रेंच भाषा में बोलना अपनी शान समझता है वैसे ही हिंदुस्तान में टूटी-फूटी अंग्रेजी में लिखने और बोलने का प्रयास करता हुआ एक बड़ा वर्ग मिल जाएगा। ऐसा व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति की विफलता पर शर्मिंदा होने से बचने के लिए हमेशा कुछ क्लिष्ट शब्दों की तलाश में रहता है।

हाल ही में एक नई प्रवृति देखने को मिली है कि जब नये शब्दों के सृजन और प्रयोग प्रचलन में आया है। किंतु इनमे ज्यादातर शब्द या तो प्रतिक्रियात्मक, भड़काऊ और  अपमानजनक पाये गए हैं। ये शब्द भी मूल शब्द नहीं होते और मात्र शब्द-संग्रह होते हैं जो भाषायिक-शब्द परिभाषा के परिधि में नहीं आते। राजभाषा दिवस के इस राष्ट्रीय पर्व पर हमारी तरफ से उन सभी राष्ट्रवादियों को शुभकामनाएं जो राजभाषा को राष्ट्र निर्माण का सूत्र मानते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें