जंगलों के अंधाधुंध कटाई से वहां रहने वाले वन्य-जीवों का अस्तित्व खतरे में है।
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हाल के वर्षों को देखें तो पाएंगे कि वर्ष 2018 में यह दिवस खिसक कर 01 अगस्त हो गया, अर्थात् हमने सभी प्राकृतिक संसाधनों का वर्ष के मात्र 7 माह में ही उपयोग कर लिया अर्थात् अब इसके बाद हम जो भी प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करेंगे, वह प्रकृति द्वारा मानव-जाति को दिया हुआ ऋण है। वर्ष 2019 में अमेज़न जंगलों में लगी आग के कारण पृथ्वी की जैविक-क्षमता एलजीबीएचजी आधी हो जीआई थी इस कारण वर्ष 2019 में यह दिन 29 जुलाई को आया था और अब यह ऋण 2020 में यह सुधरकर 22 अगस्त पर आ गया था।
ये सुधार जब से यह ओवरशूट डे प्रारम्भ हुआ है, पहली बार हुआ है और इसका मुख्य कारण पूरे विश्व में कोरोना से हुए लॉक डाउन के कारण संभव हुआ है, लेकिन यह एक अस्थायी सुधार है जो अगले वर्ष फिर खिसक कर पीछे चला जाएगा। वर्ष 2021 में यह फिर से पीछे की और खिसक कर 29 जुलाई को आया है।
‘ग्लोबल फूट प्रिंट’ के एक अनुमान के अनुसार-
इस समय मानव प्राकृतिक परिस्थिति-तंत्र की तुलना में पृथ्वी के संसाधनों का 1.7 बार तीव्र दोहन कर रही है” इसके लिए उन्होंने 4 बड़े क्षेत्रों- शहर, ऊर्जा, खाद्य और जनसंख्या को इस समस्या के समाधान के आधार पर चुना है। इसी तीव्र गति से यदि मानव पृथ्वी का दोहन और शोषण करता रहेगा तो मानव को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक और धरती अथवा एक और ग्रह की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे में पृथ्वी के अस्तित्व पर गहरा संकट दिखाई दे रहा है।
अधिकांश पहाड़,पर्वत जंगल मानव-जाति की बसाहट के कारण नदारद हो गए हैं। नदिया सिकुड़ गई हैं। जंगलों के अंधाधुंध कटाई से वहां रहने वाले वन्य-जीवों का अस्तित्व खतरे में है। पानी के लिए अत्यधिक मात्रा में बोरिंग कर के भूमि का जल-स्तर कम हो चुका है, और कितना दोहन करेंगे हम पृथ्वी का? और उसके बदले हम क्या देते हैं उसे? न वृक्षारोपण ,न उसकी सुरक्षा, हम बस लेना ही जानते हैं?
पृथ्वी ओवर शूट दिवस को पहले Ecological Debt Day के नाम से जाना जाता था।
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Ecological Debt Day और पृथ्वी ओवर शूट दिवस
पृथ्वी ओवर शूट दिवस को पहले Ecological Debt Day के नाम से जाना जाता था। दुनिया का समस्त पारिस्थितिक पद चिन्ह का लगभग 60% भाग कार्बन के उत्सर्जन से निर्मित है। जिसे ‘विश्व पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते’ के आधार पर रोकने का पूर्ण प्रयास किया जा रहा है। यह एक छोटा ही सही पर एक अच्छा प्रयास है,लेकिन इस कार्बन उत्सर्जन को घटा कर इसके निम्नतम बिन्दु पर लाना होगा। इससे हमारे पृथ्वी के दोहन में कुछ हद तक रोक लग सकती है। आवश्यकता से अधिक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की मार सीधे मानव सभ्यता पर ही पड़ती है।
खाद्य पदार्थों का अपव्यय, वनों पर अधिक निर्भरता, ईंधन का अंधाधुंध उपयोग, पृथ्वी की गहराई से जल दोहन, वर्षा के जल का ठीक से प्रबंधन न करना, वृक्षारोपन की कमी, आदि ऐसे कई कारण है, जो पृथ्वी ओवर शूट के समय को कम करते जा रहे हैं।
परिणाम भी हमारे सामने है हर वर्ष बाढ़, अकाल, भूस्खलन, फसलों की उपजता में कमी, मानव का गिरता स्वास्थ्य और भी कई कारण है जो पृथ्वी के अस्तित्व पर ही नहीं अपितु मानव जीवन के अस्तित्व पर भी खतरे की तरह मंडरा रहें है।
अब भी समय है, बहुत देर नहीं हुई है। मानव सभ्यता को बचाने के लिए हमें पुनर्जागरण की आवश्यकता है। पुनर्विचार करें हम उस मूक पृथ्वी के अस्तित्व पर, जो हमें केवल देती ही रहती है और हम केवल लेते ही रहते है।
अब समय है उस निस्वार्थ पृथ्वी का कर्ज़ उतारने का। हमारे कुछ संतुलित जीवनयापन के प्रयास से हो सकता है यह ‘पृथ्वी शूट आउट दिवस’ और अधिक लंबा चले और आने वाले समय में हम पृथ्वी को उससे भी अधिक लौटाएं ,जितना वह हमें देती है।
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