पश्चिम बंगाल चुनाव में पहचान पत्र दिखाती महिलाएं
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बीते लोकसभा चुनावों के बाद ही ममता बनर्जी इस इलाके में पार्टी की जड़ें मजबूत करने के लिए लगातार दौरे करती रही हैं। वोटरों का भरोसा जीतने की रणनीति के तहत उन्होंने कुछ दागी नेताओं पर कार्रवाई तो की ही है, कई मंत्रियों व विधायकों के टिकट भी काटे हैं। लेकिन बावजूद इसके इलाके पर भाजपा उसके मुकाबले मजबूत नजर आ रही है।
दार्जिलिंग और कालिम्पोंग की छह सीटों पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और चाय बागान मजदूरों के वोट निर्णायक हैं। जलपाईगुड़ी में भी गोरखा आबादी अच्छी-खासी है। शुरू से ही भाजपा के साथ रहे मोर्चा के दोनों गुट इस बार तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। हालांकि तृणमूल ने विमल गुरुंग गुट के उम्मीदवारों के समर्थन का ही फैसला किया है। दार्जिलिंग की सिलीगुड़ी सीट को सीपीएम का गढ़ माना जाता है। यहां वर्ष 20121 और 2016 में भी सीपीएम के अशोक भट्टाचार्य चुनाव जीत चुके हैं।
जहां तक दक्षिण बंगाल के 32 सीटों की बात है, उत्तर 24-परगना और नदिया जिले की सीटों पर मतुआ और मुसलमान समुदाय के वोट निर्णायक हैं। यही वजह है कि भाजपा ने मतुआ समुदाय के लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह तक इलाके में रैलियां कर चुके हैं।
पार्टी ने सत्ता में आने पर इस समुदाय को सीएए के तहत नागरिकता देने का भी वादा किया है। जिन इलाकों में 17 और 22 अप्रैल को वोटिंग हैं, उनमें मतुआ समुदाय के वोट निर्णायक हैं। हाल में बांग्लादेश की आजादी के स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होने के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समुदाय के वोटरों को लुभाने की कोशिश की थी।
तृणमूल कांग्रेस मोदी के भाषण को चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए आयोग से शिकायत भी कर चुकी है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 1.84 करोड़ है और इसमें 50 फीसदी मतुआ समुदाय के लोग हैं। करीब 70 विधानसभा सीटों पर यह समुदाय जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाता है। नमोशूद्र समाज के लोग भी मतुआ समुदाय को मानते हैं। ऐसे में, राज्य में मतुआ समुदाय को मानने वालों की आबादी लगभग तीन करोड़ है।
पांचवें चरण में उत्तर-24 परगना की 16 सीटों पर मतदान होना है। इन इलाकों में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 40 फीसदी है। तृणमूल कांग्रेस को अपने इस वोट बैंक के सहारे बेहतर प्रदर्शन का भरोसा है। हालांकि कुछ इलाकों में उसे भाजपा से कड़ी टक्कर मिल रही है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तृणमूल के इस गढ़ में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की थी। तब उसने जिले की लोकसभा की पांच में से मतुआ बहुल इलाके की दो सीटें जीती थीं। उन इलाकों में अल्पसंख्यकों की आबादी कम थी। बाकी तीन सीटें तृणमूल ने जीती थीं। इसलिए इस बार मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
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