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The 3rd Voice of Global South Summit 2024: भविष्य के लिए ग्लोबल साउथ को सशक्त बनाना

सार

वैश्विक दक्षिण के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि वह बुनियादी बातों पर वापस जाए और विकास के उस विचार पर फिर से गौर करे जो वैश्विक नीति परिदृश्य से गायब हो गए हैं।
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वॉयस ऑफ ग्लोबल समिट में पीएम मोदी और अन्य देशों के शीर्ष नेता - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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तीसरे वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट (वोग्स) के उद्घाटन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नए वैचारिक ढांचे के साथ दक्षिण के देशों के आपसी संबंधो की शर्तों को पुनः संतुलित करने का प्रयास किया है। जिसे उन्होंने "डेवलपमेंट कॉम्पैक्ट" के रूप में वर्णित किया। इस अवधारणा के पीछे का विचार एक सामंजस्यपूर्ण तरीके से आपसी जुड़ाव के पांच अलग-अलग तौर-तरीकों का समान लाभ होना है। ये हैं क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी साझाकरण, विकास के लिए व्यापार, अनुदान और सबसे महत्वपूर्ण, रियायती वित्त। यदि अच्छी तरह से कार्यान्वित किया जाता है, तो भारत की विकास में साझेदारी के साथ व्यापक जुड़ाव के लिए एक नई आधार रेखा स्थापित करेगा।

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विकास के आपसी संबंधों की विडम्बना ऐसी है कि मदद के नाम पर सिर्फ कर्जा ही बढ़ा है। अंकटाड (2023) के आंकड़े कहते हैं 2023 में विकासशील देशों का सार्वजनिक ऋण 29 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर था। 2023 में विकासशील देशों के सार्वजनिक ऋण पर शुद्ध ब्याज भुगतान 847 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। 54 विकासशील देश अपने राजस्व का 10 प्रतिशत से अधिक शुद्ध ब्याज भुगतान पर खर्च करते हैं। इस कर्जे का एक बड़ा कारण विकास के नए मार्गों की चिंता नहीं करना था। यहां, यह भी याद रखना आवश्यक है कि जीएनपी का 0.7 प्रतिशत प्रदान करने के वैश्विक स्तर पर सहमत संयुक्त राष्ट्र के 1970 के लक्ष्य को पूरा करने में भी ओईसीडी देशों की लगातार विफलता के कारण ऋण संकट और बढ़ गया है। ओडीए, जो कभी साकार नहीं हो सका। जलवायु परिवर्तन पर उनकी 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता के साथ भी यही हुआ। चीन जैसे देशों ने कर्जे की मार को और बढाया ही है।
 

वैश्विक दक्षिण के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि वह बुनियादी बातों पर वापस जाए और विकास के उस विचार पर फिर से गौर करे जो वैश्विक नीति परिदृश्य से गायब हो गए हैं। रीगनवाद और थैचरवाद के नेतृत्व में वित्त संचालित वैश्वीकरण और व्यापार डब्ल्यूटीओ में पुनः व्यवस्थित करने के एक परिवर्तन ने विकासशील देशों के लिए नीतिगत स्थान को पूरी तरह से छीन लिया। इसने एक तरह से उन आशंकाओं को पुष्ट किया जो राउल प्रीबिश और अन्य लोगों के केंद्र-परिधि सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया था। वाशिंगटन विकास मॉडल के पतन के बाद से, वोग्स ने आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने के लिए अपने नए अवतार में विकास पर चर्चा करने की नई आशा दी है।

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इस संबंध में, विकास के अनुभवों और नीति निर्माण पर अंतर्दृष्टि का पारस्परिक आदान-प्रदान नए विकल्प विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस वर्ष के थीम "सतत भविष्य के लिए वैश्विक दक्षिण को सशक्त बनाना" के साथ, शिखर सम्मेलन ने वैकल्पिक विकास प्रतिमान विकसित करने के लिए एक-दूसरे के अनुभवों, अंतर्दृष्टि और संभावनाओं को साझा करने पर ध्यान केंद्रित किया है। विचार यह है कि इस विकास कथा को दक्षिणी अनुभवों और दृष्टिकोणों पर आधारित किया जाए, दक्षिणी आशाओं और आकांक्षाओं को संबोधित किया जाए।

भारत में हाल की विकास पहलों से पांच व्यापक संभावनाएं हैं जिन्हें वैश्विक दक्षिण में स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर प्रासंगिक स्वरूप दिया जा सकता है। पहला सतत विकास के दायरे में है, जिसमें पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली (LIFE), पिछड़ रहे विकास के सतत लक्ष्यों को फिर से सक्रिय करने और छत पर सौर पैनलों और सौर फार्मों के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। दूसरा क्षेत्र स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देने का है जहां भारत के लिए प्रेरणा शक्ति 'एक विश्व एक स्वास्थ्य' की अवधारणा है। 

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वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन में संबोधित करते एस. जयशंकर - फोटो : PTI
यहां आरोग्य मैत्रेय के लिए भारत के योगदान को सार्थक किया जा सकता है। भारत ने अफ्रीका और प्रशांत द्वीप देशों को अस्पताल और जन औषधि केंद्र बनाकर जो सहायता प्रदान की है, वह महत्वपूर्ण है। तीसरा, पापुआ न्यू गिनी, केन्या, गाजा और यूक्रेन जैसे मानवीय संकटों के दौरान भारत तुरंत सहायता के स्त्रोत के रूप में उभरा है। यह उस प्रयास को उजागर करता है जो भारत अन्य देशों को आपदा लचीलापन और त्वरित, प्रभावी और कुशल प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक संस्थागत तंत्र लाने के लिए तैयार करने के लिए कर रहा है। चौथा वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और यूपीआई और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अंतिम मील कनेक्टिविटी हासिल करने से संबंधित है। डीपीआई को बढ़ावा देने के लिए भारत पहले ही 12 देशों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है। पांचवां, शिक्षा, कौशल और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में अंतर्संबंधों को मजबूत करने की आवश्यकता है।

भारत के विकास के अनुभव को साझा करने के लिए, संस्थागत ढांचे विभिन्न संस्थाओं और लोगों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वोग्स में, प्रधानमंत्री ने भारत द्वारा ज्ञान संवर्धन, अनुभव साझा करने और कौशल और क्षमता निर्माण के लिए विकसित कार्यक्रमों के लिए दक्षिण नामक वैश्विक दक्षिण सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की शुरुआत को याद किया। ऐसे संस्थानों की भूमिका ज्ञान और अनुभवों के दोतरफा प्रवाह को बढ़ावा दे सकती है। ये संस्थान ज्ञान के सह-सृजन की पहल भी कर सकते हैं।
 
'विकास समझौते' के अलावा, कुछ अन्य घोषणाएं भी महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक दक्षिण की विकास यात्रा में नीति आंकलन और व्यापार में हिस्सेदारी कमजोर कड़ी रहे हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, क्षमता निर्माण के लिए 2.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर और व्यापार नीति निर्माण में प्रशिक्षण के लिए 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर के एक विशेष फंड की घोषणा की गई है। भारत ने 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर के प्रारंभिक योगदान के साथ एक सामाजिक प्रभाव कोष की स्थापना की भी घोषणा की। आरआईएस के एक अध्ययन के अनुसार, भारत वर्तमान में वैश्विक दक्षिण में विभिन्न साझेदार देशों को सालाना लगभग 7.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान देता है।

प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक दक्षिण पर अपनी आम चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक साथ आने और वैश्विक समाधान के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण लाने पर जोर देना एक बड़ा कदम है। विकास के लिए संघर्ष कर रहे सभी राष्ट्रों को इसे गंभीरता से सुनना चाहिए। इनमें से कुछ मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक मंच के रूप में वोग्स महत्वपूर्ण पहल है। ये और भी महत्वपूर्ण है जब लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों के लिए अनिश्चितता और असुरक्षा कई गुना बढ़ गई है। आतंकवाद के माध्यम से अलगाववादी ताकतों और वर्गीय हिंसा को बढ़ावा देने वालों की भूमिका पर भी गौर करने की आवश्यकता है। बांग्लादेश में हाल की घटनाओं को देखते हुए बहुत महत्व रखता है। अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने भी इस सम्मेलन में हिस्सेदारी की।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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