प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने 11वें भाषण में इस बार सेक्युलर सिविल कोड (धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता संक्षेप में कहें तो धनासं) का नया शिगूफा छेड़कर देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के भाजपा के एजेंडे को नई धार दे दी है। उन्होंने भाषण में कहा कि आज देश को कम्युनल ( साम्प्रदायिक) की जगह सेक्युलर सिविल कोड की जरूरत है।
खास बात यह है कि अमूमन सेक्युलर शब्द से ही भड़कने वाली भाजपा के ही शीर्ष नेता ने अपने मुंह से अब समान नागरिक संहिता को सेक्युलर सिविल कोड का नया नाम देकर गेंद सेक्युलर पार्टियों के पाले में सरका दी है।
हाॅकी की शब्दावली में कहें तो यह मोदी की विपक्षी पाले में सर्कल एंट्री है, हालांकि कुछ लोग इसे मोदी का नया गेम चेंजर दांव भी बता रहे हैं। इसकी सत्यता अभी अभी प्रमाणित होनी है, लेकिन इतना तय है कि इस दांव ने सेक्युलर पार्टियों में खलबली तो मचा दी है। वो अब इसका विरोध यह कहकर कर रही हैं कि मोदी द्वारा संविधान में उल्लेखित ‘काॅमन सिविल कोड’ को ‘कम्युनल’ बताना संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर के काॅमन सिविल कोड का अपमान है।
हालांकि यह तथ्य नहीं है, बाबा साहब ने जिस संविधान के प्रारूप को तैयार किया था, उसके भाग 4 में राज्यों के नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का मात्र एक वाक्य में उल्लेख है- ‘राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।‘ इससे अधिक संविधान में कुछ भी नहीं है।
यानी कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) कैसी होगी, किन पर लागू होगी, कब तक लागू होगी आदि पर मौन है। वैसे भी नीति निदेशक तत्व सुझावात्मक हैं, आदेशात्मक नहीं।
संविधान ने राज्य से यूसीसी बनाकर उसे पूरे देश में लागू करने की अपेक्षा की है, इसे अनिवार्य नहीं किया है। संविधान सभा में भी इस मुद्दे पर काफी बहस हुई थी। इसमें मुख्यत: विरोध उन मुस्लिम सदस्यों की तरफ से हुआ, जो मानते थे कि यूसीसी मुस्लिम पर्सनल लाॅ के खिलाफ है। लिहाजा यह मामला 74 साल से टलता आ रहा है।
भाजपा को छोड़ ज्यादातर पार्टियों की राय रही है कि जब तक देश में यूसीसी पर आम सहमति नहीं हो जाती, इसे लागू करना टाला जाए, क्योंकि सेक्युलर कहलाने वाली कोई भी पार्टी अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों की नाराजी गंवारा नहीं कर सकती। इसका दूसरा अर्थ यह हो गया कि जिन पार्टियों को अल्पसंख्यक मुसलमानों के वोट ज्यादा मिलते हैं, वो ‘सेक्युलर’ हैं और बहुसंख्यक वोट पाने वाली पार्टी ‘कम्युनल’ है। यहां अल्पसंख्यक की परिभाषा भी उन्हीं राज्यों तक सीमित मानी जाती है, जिनमें हिंदू बहुसंख्यक हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एनडीए सरकार का मुखिया होते हुए भी यह साफ संकेत दे दिया है कि उनकी पार्टी भाजपा के पास केन्द्र में अपने दम पर बहुमत न होने के बाद भी वो अपने मूल एजेंडे से डिगेंगे नहीं। इसीलिए सेक्युलर सिविल कोड का नया पत्ता फेंका गया है।
अपने भाषण में मोदी ने यह भी कहा कि संविधान निर्माताओं का सपना पूरा करना हमारा दायित्व है। धर्म के आधार पर समाज को बांटने वाले कानून आधुनिक समाज स्थापित नहीं कर सकते। भाजपा का मानना है कि नाम बदलने से सेक्युलर पार्टियों को यूसीसी विरोध की अपनी पुरानी रणनीति बदलनी पड़ेगी। जो खुद को रात दिन सेक्युलर कहाती नहीं थकती, वो एक सेक्युलर कोड की पैरवी की मुखालिफत कैसे करेंगी?
यूसीसी की विरोधी रही पार्टियों में चुप्पी
यह बात भी सही है कि यूसीसी की विरोधी रही पार्टियों ने बहुत तीखा विरोध नहीं किया है। इसका कारण शायद यह भी है कि वो यूसीसी विरोध में निहित वोटों की लामबंदी का सही अंदाजा नहीं लगा पाई हैं। मुस्लिम संगठन इसका पहले भी यह कहकर विरोध यह कहकर कर रहे थे कि शरिया कानून को बदला नहीं जा सकता। मुसलमान इसकी जगह कोई दूसरा कानून कतई स्वीकार नहीं करेंगे। इससे उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और अस्मिता का हनन होगा।
यूसीसी विरोधियों का तर्क है कि चूंकि संविधान अनुच्छेद 25 के तहत सभी नागरिकों को लोगों को अपने-अपने धर्म के मुताबिक जीने की आजादी देता है, ऐसे में यूसीसी लागू करने का अर्थ इस आजादी को नकारने जैसा है।
जबकि यूसीसी से तात्पर्य देश में रहने वाले हर धर्म, जाति, संप्रदाय और वर्ग के लिए हर मुद्दे पर एक समान नियम-कानून लागू करना है। जिसमें सभी धर्म वालों के लिए विरासत, शादी, तलाक और गोद लेने के नियम एक ही होंगे।