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स्मृति शेष: देहाती पौरुष के प्रहार ने उस परिंदे को विश्वनाथ से नाना बना दिया

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- फोटो : Amar Ujala Graphics
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कुछ ख्वाहिशें अधूरी ही रह जाती हैं। बहुत पास होकर भी हम चीजों को छू नहीं पाते। जब लगता है कि ये तो हो ही जाएगा और वो नहीं होता तो प्रतिक्रिया भी सुन्न पड़ जाती है। जैसे ऊंचाई से ज़ोर से गिरा कांच का मर्तबान, जो गिरता और टूटता हुआ दिख रहा है पर उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही। अवचेतन में बस एक विचार कौंध रहा है कि – अरे! ये कैसे हो गया? 

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गुरुवार आठ अक्टूबर की सुबह भी ऐसी ही मनहूसियत लेकर आई। नाना पाटेकर के जाने की खबर ऐसी है, जैसे बहुत पास से उठकर कोई चला गया। उनसे मिलने और बतियाने की तमाम इच्छाएं अब सदमे में हैं। दो तीन अवसर ऐसे थे, जिनमें ये तय था कि उनसे मिलना ही है... पर वो नहीं हुआ। और अब कभी नहीं होगा। 

नाना काफी समय से फिल्मों में सक्रिय नहीं थे। जो प्रोजेक्ट उन्हें पसंद आते थे, उसी पर काम करते थे। जब फिल्मों में सक्रिय थे, तब भी वो ऐसे ही रहे। अपनी मर्जी के मालिक!! नाना के परदे के चरित्र जितने चर्चित और प्रभावी रहे, उससे कहीं ज्यादा उनके परदे के परे के जीवन ने लोगों को आकर्षित किया। उनके व्यक्तित्व में एक अलग तरह का रहस्य और रोमांच था। एकदम खांटी देहातीपन, जिसमें खेत की महक थी और व्यवहार में ऐसा पौरुष जो मजबूती, दबंगई, सनक, ज़िंदादिली और अभिमान का अनोखा सम्मिश्रण था।
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इसी देहातीपन और पौरुष के घोल ने वो इस्पात गढ़ा, जिसने महाराष्ट्र के रायगढ़ से निकले विश्वनाथ को लोकमानस का नाना बना दिया। गमन से फिल्मी परदे पर आगमन करने वाले नाना का अभिनय इतना प्रभावी था कि सितारों से सजे बॉलीवुड में उन्होंने अपने लिए एक अलग जगह बनाई। ठीक वैसे ही, जैसे शेर पंजे मार कर अपना इलाका तय कर देता है। नाना ने स्टारडम और चरित्र अभिनेताओं के बीच में एक बड़े निर्वात को भरा, जो अभी तक दिखाई नहीं दे रहा था। अमिताभ, आमिर, सलमान और शाहरुख की एक समानान्तर रेखा। इनके साथ एक रेखा नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, अमोल पालेकर और फारुख शेख की, जिनमें आगे नाम जुड़ते गए। इन दोनों के बीच एक अलग मुकाम। 

1989 में परिंदा से अभिनय की जो उड़ान नाना ने भरी, तो फिर बॉलीवुड के आकाश में उनके प्रहार से ऐसा क्रांतिवीर तैयार हुआ, जिस पर कोई अंकुश नहीं लगा पाया। नाना के अभिनय से लोग अपने आप को बहुत करीब से इसलिए जोड़ पाते हैं क्योंकि उनके भीतर की बेचैनी और खदबदाहट केवल परदे तक सीमित नहीं रही। जब वो डिम्पल को कलम वाली बाई कहते हैं और हथेली पर खून रगड़ कर लोगों को आंदोलित करते हैं, तो वो खुद भी गाँव गोद लेते हैं और खेती करते हैं। जब वो प्रहार में कमांडो तैयार करते हैं, तो खुद भी कारगिल के मोर्चे पर जा डटते हैं। जब वो तिरंगा में समाज से क्रान्ति का आह्वान करते हैं, तो फिर किसान आंदोलन पर भी मुखर होकर अपनी बात रखते हैं। 

बॉलीवुड की तय परिपाटी के विपरीत नाना पाटेकर ऐसा चेहरा नहीं थे, जो मेकअप लगाकर रटी हुई लाइनें बोलता है और फिर उस मेकअप को उतार कर महंगी गाड़ियों, आलीशान बंगलों और देर रात की पार्टियों में वहाँ गुम हो जाता है, जहां उसे अपने पर्दे के किरदार से कोई मतलब ही नहीं हो। नाना के भीतर अपने निभाए किरदारों को लेकर एक अजीब तरह की ईमानदारी दिखाई देती थी, चाहे वो कोई भी भूमिका हो। बाद में उन्होंने हास्य फिल्मों में भी काम किया। पर वहाँ भी वही ईमानदारी झलकती थी। वो रचे हुई नहीं, बल्कि सचमुच के “एंग्री यंग मैन” नज़र आए। बिंदास, बेलौस, बेखौफ। 

अभी इस लेख को लिखते समय ही उनका एक वीडियो सामने आया, जिसमें वो अपनी मौत को लेकर भी एकदम सहज रूप में बात कर रहे हैं। कह रहे हैं – ''सबको जाना है, मैं भी चला जाऊंगा। सबको 12 मन लकड़ी लगती है। मुझे भी लगेगी। मैंने तो पहले ही जमा कर रखी है। वो भी सूखी हुई। गीली लकड़ी नहीं चाहिए। उससे धुआं उठता है। सब दोस्त आएंगे, मिलने वाले आएंगे। गीली लकड़ी के धुएं से उनके आंसू निकलेंगे। कम से कम मरने के बाद तो ये भ्रम नहीं होना चाहिए! कि मेरे लिए रो रहे हैं!'' 



यही वो सीधी स्पष्ट ईमानदारी है, जिसकी मैं बात कर रहा था। बेलाग। तो ऐसा नहीं था कि पर्दे पर लड़ रहे हैं पर जीवन में नहीं। इसीलिए वो सुपर सितारा ना होकर भी दिलों में बसते हैं। एक अलग तरह की आश्वस्ति देते हैं। अपने से लगते हैं। डराते भी हैं। वेलकम में हंसाते भी हैं। व्यक्तित्व का रौब ऐसा कि उनकी हंसी में भी अजीब सा भय होता है। वो कभी शंभर एक, कभी शंभर टू करते हुए डांस भी करते नज़र आते हैं और एक अलग तरह का रोमांच पैदा करते हैं। जब मन करता था, तो वो इंदौर के पास महू में शूटिंग रेंज में भी पहुंच जाते थे।
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नाना 75 के थे पर सक्रिय थे और उनमें बहुत अभिनय बाकी था। मुझे लगता रहा कि कोई फड़फड़ाती सी स्क्रिप्ट उनका इंतज़ार कर रही थी.... पर वो चले गए। उनका अभिनय और उनके संवाद याद रहेंगे। और कुछ रहे ना रहे... आज के इस सोशल मीडिया के जमाने में तमाम रील्स और मीम्स में हाथ में कॉफी का मग लिए उनकी वो उन्मुक्त हंसी हर वायरल वीडियो के साथ हम तक पहुंचती रहेगी। 

विनम्र श्रद्धांजलि...। 

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