केदारनाथ की धारण क्षमता से अत्यधिक अधिक होने से आपदा का एक कारण बन रहा है।
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आस्था की बाढ़ भी संकट का एक कारण
एक स्वेच्छिक संगठन की याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने 2018 में केदारनाथ की बेहद सीमित धारण क्षमता को अनुभव करते हुए वहां प्रतिदिन 5000 से कम यात्रियों को जाने की सीमा तय की थी। लेकिन यात्रियों के भारी दबाव को देखते हुए राज्य सरकार ने 2022 में बदरीनाथ के लिए 16 हजार, केदारनाथ के लिए 13 हजार, गंगोत्री के लिए 8 हजार और यमुनोत्री के लिए 5 हजार तय की।
सरकार पर यात्रियों से ज्यादा हितधारकों और राजनीतिक दबावों के चलते इस साल सीमा को बढ़ाकर बदरीनाथ के लिए प्रतिदिन 20 हजार, केदारनाथ 18 हजार, गंगोत्री 11 हजार और यमुनोत्री के लिए 9 हजार यात्री कर दिया गया। इससे भी दबाव कम नहीं हुआ तो सरकार ने जून में सारी सीमाएं हटा दीं। उसका नतीजा यह हुआ कि 4 अगस्त 2024 तक केदारनाथ जाने वाले यात्रियों की संख्या 10,91,316 तक और बदरीनाथ जाने वालों की संख्या 8,88,494 तक पहुंच गई, गौर करने वाली बात यह है कि पहले सदैव बदरीनाथ जाने वाले यात्रियों की संख्या केदारनाथ से बहुत अधिक रहती थी। बदरीनाथ के लिए सीधे वाहनों से जाया जाता है जबकि केदारनाथ के लिए लगभग 21 किमी की कठिन पैदल यात्रा भी है। लेकिन अब केदारनाथ में बदरीनाथ से अधिक भीड़ जा रही है।
उत्तराखण्ड राज्य गठन से पूर्व पूरे सीजन में केदारनाथ के यात्रियों की संख्या औसतन 1 लाख तक और बदरीनाथ जाने वालों की संख्या 9 लाख तक होती थी। पिछले साल केदारनाथ में 19,61,277 तक तीर्थ यात्री पहुंच चुके थे।
दरअसल, 2013 की आपदा को अवसर में बदलने की रणनीति का ही नतीजा यात्रियों का यह सैलाब है जो कि केदारनाथ की धारण क्षमता से अत्यधिक अधिक होने से आपदा का एक कारण बन रहा है। यही नहीं बहुत संवेदनशील पारितंत्र वाले इन धामों में वाहनों की बाढ़ झौंकी जा रही है।
केदारनाथ की जड़ में इस साल 4 अगस्त तक 1,69,575 और सीधे बदरीनाथ तक 1,01,002 वाहन पहुंच चुके थे। यही नहीं अति संवेदनशील गोमुख तक भी इस साल अब तक 6,309 यात्री पहुंच गए जिनमें ज्यादातर कांवड़िए ही थे। प्रकृति के साथ अगर ऐसी ज्यातियां होती रहेंगी तो मानवीय संकट का टाला नहीं जा सकेगा।
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