सिडकुल से उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार तो मिला नहीं ,ऊपर से पंतनगर यूनिवर्सिटी की हजारों एकड़ की खेती वाली भूमि भी बेकार हो गई।
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प्रदेशवासियों के रोजगार की उम्मीद पंतनगर सिडकुल के हालात
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की वजह से पंतनगर में सिडकुल की स्थापना हुई थी। शुरू में दी गई सब्सिडी की वजह से बहुत सी कंपनियों ने सिडकुल में अपना डेरा डाल था, पर अब कोरोना की वजह और सब्सिडी समाप्त होने के बाद से बहुत सी कंपनियां या तो वापस चली गई हैं या उन्होंने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है। जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनी एचपी इंडिया द्वारा अपना प्लांट अचानक बंद कर दिया गया था।
रुद्रपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार रूपेश कुमार बताते हैं-
सिडकुल के शुरुआती दौर में लगभग 450 कम्पनी रजिस्टर थीं पर उसमें से लगभग 30 प्रतिशत के प्लॉट अब भी खाली हैं। अभी मात्र 150 प्लांटों में काम चल रहा है, उनमें भी अधिकतर कंपनियां बड़ी कम्पनियों की वेंडर हैं। सिडकुल से उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार तो मिला नहीं ,ऊपर से पंतनगर यूनिवर्सिटी की हजारों एकड़ की खेती वाली भूमि भी बेकार हो गई।
अल्मोड़ा निवासी ललित नैनवाल कहते हैं-
मेरा वोट उस पार्टी के लिए है, जो उत्तराखंड से पलायन को रोक सके और कम कर सके। जो युवा पीढ़ी के दर्द को पहचान सके। उत्तराखंड में रोजगार के लिए सिडकुल और कम्पनियां बहुत हैं पर फिर भी पलायन क्यों कम नही हो पा रहा है? अपने राज्य में रोजगार होने के बावजूद भी उत्तराखंड का युवा वर्ग यहां काम नहीं करना चाहता है क्योंकि यहां कम्पनियों का मानदेय 8 से 10 हजार रुपये है, इतनी कम सैलरी में क्या हो पाता है।
आज भी उत्तराखंड के युवा वर्ग को 18-20 हजार कमाने के लिए दूसरे राज्यों को पलायन करना पड़ता है, ऐसा क्यों? क्या यहां की सरकारें यहां की कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला मानदेय तय नहीं कर सकती हैं? अगर उत्तराखंड के सिडकुलों में 18 से 20 हजार रुपये मानदेय सरकार तय कर देती है तो उत्तराखंड से पलायन खुद कम होना शुरू हो जाएगा, आने वाली सरकार इस बारे में सोचे।
क्या है समाधान?
उत्तराखंड में बेरोजगारी के सवाल पर फिल्म और पत्रकारिता जगत से जुड़े पौड़ी निवासी गौरव नौडियाल कहते हैं-
सरकार ने रोजगार की जगह पुल बनाने और सड़कें चमकाने को प्राथमिकता में रखा। प्रदेश के सारे बजट को कंस्ट्रक्शन में डाल दिया गया। इको-टूरिज्म से प्रदेश में नौकरियां लाई जा सकती थी पर उसके लिए योजनाएं बनानी होंगी, मूलभूत ढांचे तैयार करने होंगे, वर्कशॉप के जरिए स्किल्ड लोग तैयार करने होंगे।
उत्तराखंड के केबर्स गांव में कोरोना के बाद बिगड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था के चलते गांव के 18 से 25 साल तक के करीब 55 लड़के घर पर हैं। इनमें से कई लॉकडाउन से पहले शहरों में काम करते थे, लेकिन अब वो खाली हैं।
ग्राम प्रधान कैलाश सिंह रावत पास गांव में रोजगार पैदा करने के कुछ उपाय हैं जो रोजगार को लेकर शोर मचाने वालों को ध्यान से सुनने चाहिए।
वह कहते हैं कि,
- -गांव के खाली पड़े हुए घरों को रहने लायक बनाकर 'विलेज टूरिज्म' की दिशा में बढ़ा जा सकता है।
- -साइटसीइंग, बर्ड वॉचिंग और फॉरेस्ट वॉक के साथ ही परफॉर्मिंग आर्ट को आय के साधन के रूप में विकसित कर सकते हैं।
- -इकॉनमी का सस्टेनेबल मॉडल तैयार करना होगा, जिससे गांव में ही रोजगार सृजित हो सके।
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