भले ही केंद्र मजबूत स्थिति में हो, लेकिन कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति लालबत्ती की चेतावनी दे रही है। वित्त मंत्री ने राज्यों को करों में 41 प्रतिशत की हिस्सेदारी जारी रखी है और 2 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त ऋण दिया है, लेकिन कुछ राज्यों के लिए यह मरहम नाकाफी साबित हो रहा है। पंजाब और केरल जैसे राज्यों का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात क्रमशः 45 प्रतिशत और 37 प्रतिशत के खतरनाक स्तर को छू रहा है।
इसका सीधा मतलब यह है कि ये राज्य अपनी कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों के बजाय पुराने कर्जों का केवल ब्याज चुकाने में खर्च कर रहे हैं। इस मामले में पश्चिम बंगाल (34 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (32 प्रतिशत) भी इस सूची में पीछे नहीं हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश ने अपने खर्च का बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर मोड़ा है।
विपक्ष का आरोप है कि वित्तमंत्री राज्यों की बदहाली पर मौन हैं, लेकिन बजट के प्रावधान एक मौन सुधार की ओर इशारा करते हैं। केंद्र ने राज्यों के लिए उधारी की सीमा को बिजली क्षेत्र में सुधार और पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) से जोड़ दिया है। सरल शब्दों में, केंद्र अब राज्यों को रेवड़ियां बांटने के लिए पैसा नहीं देगा, बल्कि स्कूल, अस्पताल और सड़कों जैसी संपत्ति बनाने के लिए निवेश उपलब्ध कराएगा।
बजट 2026 का स्पष्ट संदेश है कि कर्ज लेना बुरा नहीं है। बशर्ते वह उपभोग के बजाय उत्पादन के लिए हो। भारत के श्रीलंका बनने का खतरा नहीं है, क्योंकि हमारे पास विदेशी मुद्रा का भंडार और राजकोषीय अनुशासन की नीतियां हैं, लेकिन राज्यों के लिए यह वेक-अप कॉल है। यदि उन्होंने समय रहते मुफ्त योजनाओं की राजनीति और कर्ज के बढ़ते बोझ के बीच संतुलन नहीं बनाया तो विकास की रफ्तार कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।
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