पिछले एक दशक में भारत की कला और संस्कृति की प्रमुख संस्थाओं में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। 2014 से पहले कई संस्थाएं, जैसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), मुख्य रूप से अभिजात वर्ग और विशेष विचारधारा से जुड़े कलाकारों तक सीमित रहीं। दिल्ली के दिल में स्थित होने के बावजूद ये संस्थाएं आम जनमानस से दूर रहीं और इन्हें 'भद्र लोगों का क्लब' कहा जाने लगा था। हालांकि, मोदी सरकार के आने के बाद इन संस्थाओं के कामकाज में समावेशिता, पारदर्शिता और जन-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाया गया, जिससे कला-संस्कृति का लाभ अब समाज के बीच व्यापक स्तर पर पहुंच रहा है।
आईजीएनसीए की आधारशिला 19 नवंबर 1987 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा रखी गई थी और इसे 24 मार्च 1987 को एक स्वायत्त ट्रस्ट के रूप में औपचारिक रूप से स्थापित किया गया। यह संस्था भारतीय कला, संस्कृति, पुरातत्व, नृत्य, संगीत और अन्य कलाओं के अध्ययन, संरक्षण और प्रसार के लिए बनी थी। 2014 से पहले यह मुख्य रूप से विशेषज्ञों और अभिजात कलाकारों का केंद्र बना रहा। आम लोगों का यहां पहुंचना कम था, और कार्यक्रम सीमित दायरे में होते थे।
पद्म पुरस्कारों में भी मोदी सरकार ने एक नई परंपरा स्थापित कर दी। पहले ये पुरस्कार मुख्य रूप से सत्ताधारी विचारधारा या निकटवर्तियों तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब विपक्षी दलों के दिग्गज नेताओं को भी सम्मानित किया गया है, जो राजनीतिक संबद्धता की जगह देश और समाज के लिए व्यक्ति के योगदान के महत्व को प्राथमिकता देता है। मोदी सरकार में हुए इस परिवर्तन को मामूली बदलाव नहीं कहा जा सकता।
• शरद पवार: 2017 में पद्म विभूषण से सम्मानित। वे एनसीपी के प्रमुख हैं और भाजपा के विरोधी रहे हैं।
• मुलायम सिंह यादव: 2023 में मरणोपरांत पद्म विभूषण। समाजवादी पार्टी के संस्थापक और भाजपा के पुराने विरोधी।
• वी.एस. अच्युतानंदन: 2026 में मरणोपरांत पद्म विभूषण। केरल के पूर्व सीएम और सीपीआई(एम) के वरिष्ठ नेता।
• बुद्धदेव भट्टाचार्जी: 2022 में पद्म भूषण (मरणोपरांत), हालांकि उनके परिवार ने इसे अस्वीकार कर दिया।
इससे पहले ऐसे विपक्षी नेताओं को पद्म सम्मान मिलना दुर्लभ था। यह मोदी सरकार की 'सबका साथ' की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है, जहां विरोधी विचारधारा वाले भी सम्मानित होते हैं।
सरकार के दस वर्षों में साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य अकादमी जैसी संस्थाओं के कामकाज में मूलभूत बदलाव नहीं आया, बल्कि ये और अधिक समावेशी बने। प्रकाशन विभाग की 'आजकल' जैसी पत्रिकाएं पहले की तरह प्रकाशित होती रहीं, जिसमें सरकार-विरोधी विचारकों पर विशेषांक निकलते रहे। फेलोशिप और पुरस्कार ऐसे कलाकारों को मिलते रहे जो सरकार की विचारधारा से असहमत हैं। मंत्रालयों के कवि सम्मेलनों से लेकर साहित्यिक आयोजनों तक पुराने कवि और कहानीकार जमे रहे।
उदाहरणस्वरूप, आईजीएनसीए से एक प्रमुख फेलोशिप प्राप्त व्यक्ति ने सार्वजनिक रूप से मोदी और योगी सरकार की आलोचना की। जब उनसे पूछा गया कि इतनी बड़ी फेलोशिप इसी सरकार से मिली है, तो उनका जवाब था- "यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।"
यह घटना दर्शाती है कि सरकार में संस्थाएं विचारधारा से ऊपर उठकर काम कर रही हैं। संगीत नाटक अकादमी ने 2022-23 में 91 कलाकारों को पुरस्कार दिए, जिसमें विविध क्षेत्रों के कलाकार शामिल थे, बिना किसी भेदभाव के। दरअसल सरकार ने कला और संस्कृति मंत्रालय के अधीन आने वाली दर्जनों संस्थाओं में भेदभाव खत्म किया। फेलोशिप, विशेष कार्यक्रम और पुरस्कार अब योग्यता और योगदान के आधार पर दिए जाते हैं, न कि विचारधारा के। आईजीएनसीए जैसे केंद्र अब आम जन के लिए खुले हैं, और पद्म पुरस्कार राजनीतिक समावेशिता का प्रतीक बन गए हैं।
यह बदलाव सिर्फ संस्थागत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का मजबूत प्रदर्शन है। जहां पहले संस्थाएं अभिजात वर्ग तक सीमित थीं, वहीं आज ये 'सबका साथ, सबका विकास' के सिद्धांत पर चल रही हैं। एक दशक से अधिक समय में मंत्री बदले, लेकिन मंत्रालय का जन-उन्मुख दृष्टिकोण मजबूत हुआ है। यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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