दिल्ली के पुलिसकर्मियों की अब पहली मांग अपना संगठन बनाने की है, लेकिन देश की राजधानी में पुलिस को संगठन बनाने की इजाजत दी जायेगी, इस पर संदेह है।
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पिटे पुलिसकर्मियों को क्यों याद आई किरन बेदी?
चोरी के मामले में 16 जनवरी 1988 को दिल्ली पुलिस राजेश अग्निहोत्री नाम के वकील को हथकड़ी डाल कर तीस हजारी कोर्ट में ले गई तो वहां वकीलों ने अपने साथी को हथकड़ी पहनाने पर भारी विरोध किया। यही नहीं उन्होंने अपना विरोध मजिस्ट्रेट के समक्ष भी प्रकट किया तो मजिस्ट्रेट ने भी वकीलों के विरोध को जायज ठहरा कर अभियुक्त वकील को उसी दिन रिहा करने के आदेश दे दिए। अगले दिन 18 जनवरी को वकील पुलिस के खिलाफ हड़ताल पर चले गये।
तत्कालीन डीसीपी किरन बेदी ने 20 जनवरी को प्रेस कान्फ्रेंस कर पुलिस की कार्यवाही को जायज ठहराया तो उनके विरोध में तीस हजारी कोर्ट परिसर स्थित किरन बेदी के कार्यालय के समक्ष वकील प्रदर्शन करने पहुंच गए जिन्हें खदेड़ने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज, वाटर कैनन और आंसू गैस तक का इस्तेमाल किया जिससे कई वकील घायल भी हुयए। इस घटना के विरोध में तथा किरने बेदी के खिलाफ कार्यवाही की मांग को लेकर वकीलों ने ढाइ महीने तक हड़ताल रखी। यही नहीं हाइकोर्ट द्वारा जब सिटिंग जज के नेतृत्व में घटनाक्रम की जांच बैठाई तो जांच कमेटी ने किरन बेदी को दोषी ठहराया और अदालत के आदेश पर किरन बेदी का तबादला कर दिया गया। पुलिस नेतृत्व से निराश लुटे पिटे जवानों को ऐसी स्थिति में किरन बेदी नहीं तो फिर कौन याद आता?
संगठन के बैनरतले एकजुट होना चाहते हैं पुलिसकर्मी
दिल्ली के पुलिसकर्मियों की अब पहली मांग अपना संगठन बनाने की है, लेकिन देश की राजधानी में पुलिस को संगठन बनाने की इजाजत दी जायेगी, इस पर संदेह है। कानून भी बिना सरकार की अनुमति के संगठन बनाने की अनुमति नहीं देता। लेकिन सवाल यह भी उठ सकता है कि जब बिना संगठन के ही दिल्ली पुलिस के जवान और अधीनस्थ कर्मचारी वर्दी समेत अन्य सिविलियन कर्मचारियों की तरह सड़कों पर उतर सकते हैं तो फिर तब क्या होगा, जब इनके ऊपर संगठन की छत्रछाया होगी? देखा जाय तो पुलिस कर्मचारियों को अन्य सिविलियन कर्मचारियों की तरह संठन बनाने के अधिकार की मांग नई नहीं है।
बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कुछ राज्यों में पुलिस एसोसिएशन पहले ही अस्तित्व में हैं। पुलिस फोर्स के लोकतांत्रिक अधिकारों की पैरवी करने वालों का मत है कि अन्य सरकारी कर्मचारियों को संगठन बनाने और आंदोलन में उतरने का अधिकार है तो पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं? इसके विपरीत दूसरा मत यह भी है कि यूनियन ना सही फिर भी यदि इस प्रकार की एसोसिएशन बन गई तो उनका भारी खामियाजा पुलिस विभाग को उठाना पड़ेगा। इसमें अनुशासनहीनता से लेकर विद्रोह की संभावना तक सम्मिलित हैं। इसलिये पुलिसवालों के संगठन के विरोध में मेरठ और मुरादाबाद आदि स्थानों पर हुए साम्प्रदायिक दंगों में पीएसी की भूमिका और अन्य कई स्थानों पर पुलिस की उदंडता का भी हवाला दिया जाता रहा है।
1973 के पीएसी के विद्रोह की यादें हुईं ताजा
सन् 1973 का उत्तर प्रदेश के पीएसी के विद्रोह के पीछे भी लगभग यही कारण थे और और उस समय भी पुलिसकर्मियों ने यूनियन बनाने की मांग की थी। यह विद्रोह 1946 के नोसेना विद्रोह के बाद का दूसरा विद्रोह था। नोसेना का विद्रोह तो ब्रिटिश शासन के खिलाफ था, लेकिन आजादी के बाद हुआ पीएसी की 12वीं बटालियन का विद्रोह अपनी ही सरकार के खिलाफ था। तत्कालीन गृह राज्य मंत्री के.सी. पंत द्वारा 30 मई 1973 को राज्यसभा को दी गई सूचना के अनुसार 22 से 25 मई 1973 तक चले इस विद्रोह को दबाने के लिए की गई सैन्य कार्रवाई के दौरान पीएसी के 22 जवान मारे गये थे तथा 56 अन्य घायल हो गए थे।
इस सैन्य कार्रवाई में सेना ने भी अपने 13 जवान खो दिए थे और 45 अन्य घायल हो गए थे। इस विद्रोह में शामिल पीएसी के सेकड़ों जवान सेवा से बर्खास्त कर दिए गए थे। टाइम्स आफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार सैन्य कार्यवाही में पीएसी और पुलिस के 35 जवान मारे गये थे और 65 अपराधिक मुकदमों में 795 पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हुई थी। गोलीबारी करने वाले 500 पुलिसकर्मी बर्खास्त किए गए थे। इस समाचार को न्यूयार्क टाइम्स जैसे विदेशी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इस विद्रोह का इतना जबरदस्त राजनीति असर हुआ कि 425 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में 280 सीटों वाली कांग्रेस की कमलापति त्रिपाठी सरकार को 12 जून 1973 को सत्ता से हटना पड़ा था। उसके बाद उत्तर प्रदेश में 8 नवम्बर 1973 को हेमवती नन्दन बहुगुणा द्वारा मुख्यमंत्री पद संभालने तक राष्ट्रपति शासन रहा।
सेवा संबंधी विकट परिस्थितियां के कारण अधिकांश पुलिसकर्मी अक्सर तनावग्रस्त रहते हैं।
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निराशा का परिणाम था पीएसी का विद्रोह
सेवा संबंधी विकट परिस्थितियां के कारण अधिकांश पुलिसकर्मी अक्सर तनावग्रस्त रहते हैं। उनकी ड्यूटी अनिश्चित होती है, काम के घंटे तय नहीं होते, सोने-खाने का भी समय तय नहीं होता, अतिरिक्त काम का ओवरटाइम नहीं मिलता, पूरा आराम नहीं मिलता, उन्हें परिवार के साथ रहने और त्योहार मानाने के अवसर कम मिलते हैं। सामान्यतः वे अपनी कुंठाओं को आम लोगों पर उतार लेते हैं। किरन बेदी एक अपवाद ही रहीं जबकि सामान्यतः ऐसी परिस्थितियों में पुलिस अफसर अपने जवानों का साथ देने के बजायवहां खड़े होते हैं, जहां उनके हित सुरक्षित होते हैं। इन्हीं विपरीत परिस्थितियों ने उत्तर प्रदेश में 1973 में पीएसी विद्रोह को जन्म दिया था।
इस विद्रोह को तो सेना ने कुचल दिया लेकिन पुलिस संगठन और लोकतांत्रिक अधिकारों की चाह को सदा के लिए नहीं दबाया जा सका। उत्तर प्रदेश के कुछ जुझारू पुलिसकर्मियों ने 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका (संख्या 5350) दायर की जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि जब हर प्रदेश में आइपीएस समेत सभी अधिकारियों-कर्मचारियों की एसोसिएशन है तो यूपी में इस पर पांबंदी क्यों लगायी जा रही है? इस तर्क को मान कर हाईकोर्ट द्वारा 27 अगस्त 1993 को एसोसिएशन के गठन को मंजूरी का फैसला भी सुनाने के बाद उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मियों ने रजिस्ट्रार फर्म एंड सोसायटी में अपनी एसोसिएशन का पंजीकरण कराया।
संविधान में सशस्त्र बलों के लिये हैं सीमाएं
भारत के संविधान में अनुच्छेद 19 (ग) के तहत प्रत्येक नागरिक को समूह बनाने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। लेकिन इसके साथ कुछ सीमायें भी निर्धारित की गई हैं जो देश की एकता और अखंडता, लोक व्यवस्था तथा सदाचार जैसे कारणों के आधार पर नियत की जाती हैं। लेकिन दूसरी ओर सशस्त्र बलों के लिए और शान्ति-व्यवस्था के कार्यों में लगे पुलिस बलों के लिए संविधान के ही अनुच्छेद 33 में एसोसिएशन बनाने के विषय में कुछ सीमायें भी तय की गई हैं। उसमें यह भी कहा गया है कि इस सम्बन्ध में उचित कानून बना कर समूह को नियंत्रित करने का अधिकार देश की संसद को होगा।
ऐसा इन बलों की विशिष्ठ स्थिति और कार्यों की आवश्यकता के अनुसार किया गया। पुलिस बलों के लिए बाद में भारतीय संसद द्वारा पुलिस फोर्सेस (रेस्ट्रिक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 बनाया गया। इस अधिनियम की धारा 3 के अनुसार पुलिस बल का कोई भी सदस्य बिना केंद्र सरकार (या राज्य सरकार) की अनुमति के किसी ट्रेड यूनियन जैसी यूनियन का सदस्य नहीं बन सकता है। अब कुछ राज्य सरकारों ने कल्याणकारी उद्देश्य वाली एसोसियेशनों के गठन की अनुमति तो दी है मगर बाकायदा टेªड यूनियन के गठन की अनुमति अब भी कहीं नहीं मिली है। यही नहीं अधिकांश राज्यों ने तो समितियों या एसोसियेशनों के गठन की तक अभी अनुमति नहीं दी है।
पुलिस में असंतोष भड़काना दंडनीय अपराध
पुलिस (इनसाईटमेंट टू डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा-3 में जान-बूझ कर पुलिस बल में असंतोष फैलाने, अनुशासनहीनता फैलाने आदि को दंडनीय अपराध निर्धारित किया गया है। लेकिन इसके साथ ही इस अधिनियम की धारा 4 के अनुसार केन्द्र अथवा राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त किसी एसोसियेशन द्वारा पुलिस बल के कल्याणार्थ अथवा उनकी भलाई के लिए उठाये गए कदम किसी प्रकार से अपराध नहीं माने जाते हैं।
अंग्रेज तो गये मगर ढांचा छोड़ गये
सन् 1857 के भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटेन की महारानी के आदेश पर बने शाही जांच आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर जब भारत में पुलिस का ढांचा खड़ा किया गया तो उसका उद्ेश्य जनता की रक्षा करना या लोगों की मदद करना नहीं बल्कि किसी भी जनाक्रोश को दबाना था। इसके लिए पुलिस को खुली छूट मिली और वह ख़ौफ़ और दहशत का पर्याय बन गयी। उसकी ज्यादतियों पर ऐसी हायतौबा मची कि एक और बग़ावत जैसे आसार बनने लगे और 20वीं सदी की शुरूआत में शाही पुलिस आयोग का गठन करना पड़ा। इस आयोग ने पुलिस ढांचे की सुधार करने की सिफ़ारिश पेश की। लेकिन शाही आयोग की सिफ़ारिशें धरातल पर नहीं उतर सकीं। देश आज़ाद हो गया लेकिन गुलामों को काबू में रखने के लिये बनायी गयी पुलिस वही की वही बनी रही। जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन करने वाली वही पुलिस अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिये छपटपटा रही है।
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