आभासी दुनिया और खत्म होते रिश्ते
क्या हम पूरे जीवन में ऐसे चार लोग भी नहीं बना सकते जो हमसे कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहें और अंत में कांधा दे सकें? वास्तविक जिंदगी में जो अपनत्व और विश्वास की नींव बनती है, वह अटूट होती है लेकिन आज सोशल मीडिया व आभासी दुनिया के रिश्तों में, हम सभी चैटिंग, फोटो शेयरिंग और कमेंट्स में सुकून खोज रहे हैं।
हम सबकी पीड़ा यह है कि हमारे पास चार सच्चे दोस्त और मौके में काम आने वाले रिश्तेदार नहीं हैं। वास्तव में मजबूत रिश्ता निःस्वार्थ त्याग मांगता है, समय मांगता है। जब हम अपने रिश्तों को मान देते हैं ,तो बदले में हमें वहां से भी मान मिलता है। पर अब रिश्ते लाइक्स और कॉमेंट्स पर ज्यादा निर्भर नजर आते हैं। मजबूत रिश्ते और दोस्त तब बनते हैं जब हम सुख-दुख का साथी बनते हैं लेकिन हम तो अधिक से अधिक फॉलोवर्स, बड़े घर और बड़ी कार की होड़ में लगे हुए हैं।
संयुक्त से एकल और अब एकल परिवार में भी अकेले रहने वाले लोगों तथा ऐसे समाज के लिए, यह नया बाज़ारवाद, एक विकल्प माना जा सकता है। जहां आपके शव को कंधा देने के लिए चार लोग भी इकट्ठा नहीं हों तो इन फ्यूनरल प्लानिंग स्टार्टअप कम्पनियों से सम्पर्क कर सकते हैं।
कुछ अभागे लोगों और उम्र दराज़ लोगों के लिए यह कंपनियां मज़बूरी हैं परन्तु सनातन संस्कृति वाले देश में ऐसी कम्पनी खुलना बहुत ही विचारणीय है। वास्तव में यह मामला संवेदना और व्यक्तित्व का भी है। जीवन का अंतिम सत्य यही है कि जो आया है वो जाएगा जरूर।
अहमद फराज ने लिखा है- ज़िंदगी से यही गिला है मुझे, तू बहुत देर से मिला है मुझे। हमसफर चाहिए हुजूम नहीं, इक मुसाफिर भी काफिला है मुझे।
परिवर्तन प्रकृति का अनिवार्य नियम है लेकिन परिवर्तन का सिलसिला हमें 'फ्यूनरल प्लानिंग व डेथ सर्विस' तक लाएगा इसकी कल्पना हमने नहीं की थी। वर्चुअल दुनिया से बाहर निकलकर रिश्तों को समय देना शुरू करिए क्योंकि बहुत खामोश रिश्ते ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहते।
कुल मिलाकर, रिश्तों को मजबूत बनाकर रखें, जिससे कि ज़िंदगी का आख़िरी रास्ता भी अपनों के साथ हो, ना कि किराए के लोगों के साथ।
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