मार्क्स की अंधी दौड़ से बचिए
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ग्रेडिंग और नंबर सिस्टम
यदि ग्रेडिंग सिस्टम या नंबरों की बात की जाए तो इसका इतिहास बेहद पुराना है। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्राचीन ग्रीस में सबसे पहले औजारों की ट्रेनिंग पर ग्रेड देना प्रारंभ हुआ था। उसके बाद इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि वर्ष 1646 में हॉर्वर्ड ने नंबरों के आधार टर डिग्री देना प्रारंभ किया। वर्ष 1785 में याले प्रेसिडेंट इजरा स्टिलिस ने अमेरिका में सबसे पहले ग्रेडिंग स्केल लागू कराया, जिसमें ऑप्टिमी, सेकंड ऑप्टिमी, इनफीरियर्स और प्रजोरिस नाम से चार ग्रेड दिए जाते थे।
भारत में गुरुकुल चला करते थे या बच्चों को घर पर शिक्षा देने की परंपरा थी। गुरुकुल में सभी छात्र समान होते थे। कोई ग्रेड लागू नहीं होता था। जब अंग्रेजों ने भारत में शिक्षा संस्थानों की स्थापना शुरू की, लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा का एक सिस्टम और पाठ्यक्रम बनाया। उसके बाद हमारे यहां भी बच्चों को मार्क्स देने का चलन शुरू हुआ, जो आज भी जारी है। मार्क्स के इस चक्रव्यूह से ना हम निकल पा रहे हैं, ना अपने बच्चों को निकाल पा रहे हैं।
75 साल पहले जब देश अंग्रेजों से मुक्त हुआ तो शिक्षा के क्षेत्र में सुधार या बदलावों के प्रयास शुरू हुए। सरकारों ने एजुकेशन सिस्टम में परिवर्तन किए, लेकिन मार्क्स की बेड़ियों को कोई सरकार अब तक तोड़ नहीं निकाल पाई है।
यह भी सच है कि हमारे नेता अक्सर दूसरे देशों में एजुकेशन सिस्टम को देखने जाते हैं, लेकिन क्लास रूम में परिवर्तन के अलावा नया कुछ लागू नहीं करा पाए हैं, जबकि जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका जैसे देशों में बच्चों की रुचि के अनुसार पढ़ाई पर जोर दिया जाता है। फिलहाल भारत में ऐसा कोई प्रयोग संभव होता नजर नहीं आ रहा है।
मार्क्स की अंधी दौड़ से बचिए
मार्क्स की अंधी दौड़ में हम दौड़ते ही चले जा रहे हैं। पुड्डुचेरी की घटना वाकई आंखें खोलने वाली है। इसे केवल एक बच्चे की हत्या का मामला समझकर छोड़ देना गलती होगी। यह एक सामाजिक और मानसिक समस्या है। आखिर एक मां ने किस मानसिकता से ग्रसित होकर बेटे के सहपाठी की हत्या का षड्यंत्र रचा। इस दृष्टिकोण में व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
केवल हत्या के मामले में एक विक्टोरिया को सजा दे देने से इस समस्या का हल नहीं निकलेगा। जरूरत ऐसा वातावरण बनाने की है, जिसमें गलाकाट कंपटीशन और मार्क्स की अंधी दौड़ ना हो। केवल कुछ मार्क्स ऊपर-नीचे आने से जीवन प्रभावित नहीं हो जाता है। यदि यही बात विक्टोरिया ने समझी होती तो आज 13 साल का मणिकंदन जिंदा होता। समाज इस विषय पर मिलकर सोचे। बच्चों को बच्चा रहने दें, उन्हें और खुद को प्रेशर कुकर ना बनाएं।
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