टीचर समाज का अभिन्न अंग है। जाहिर-सी बात है वह फ़िल्मों में भी है। हिन्दी, इंग्लिश, मलयालम भाषा में आपको शिक्षक को केंद्र में रख कर बनी कई फिल्में मिल जाएंगी। मलयालम भाषा में 2022 में ‘द टीचर’ नाम से बनी फिल्म है। इस फ़िल्म में अमला पॉल, चेम्बन विनोद, मंजु पिल्लाई आदि ने काम किया है।
एम मोहनन की 2011 की मलयालम फ़िल्म ‘माणिक्यकल्लु’ एक ऐसी ही फ़िल्म है। इसमें एक युवा टीचर विनयचंद्रन (पृथ्वीराज सुकुमारन) एक गाँव के स्कूल में छात्रों के नजरिए में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। दो घंटे से कुछ ऊपर की 2000 की मलयालम फ़िल्म ‘लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल’ (निर्देशक फ़ैज़िल) नाजी काल की पृष्ठभूमि पर बनी त्रासद फ़िल्म ‘लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल’ से बिल्कुल भिन्न है।
मलयालम फ़िल्म में पति-पत्नी विनय (मोहनलाल) एवं सिंधु (संयुक्ता वर्मा) एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। विनय एक पब्लिक स्कूल में मलयालम भाषा का टीचर बनता है और अपने छात्रों में सकारात्मक मूल्य उत्पन्न करता है। प्रियदर्शन की ‘चेपु’ भी टीचर से जुड़ी फ़िल्म है और इस 1987 की फ़िल्म में भी मोहनलाल ने टीचर का पात्र जीया है। यहाँ वे इंग्लिश टीचर की भूमिका में हैं।
आइए अब कुछ विदेशी फ़िल्मों को देखते हैं, जिनमें टीचर की महत्वपूर्ण भूमिका है।
1989 की ‘डेड पोयेट्स सोसायटी’ तथा 2003 की ‘मोना लीसा स्माइल’ दोनों में टीचर एलिट स्कूल में काम करने आए हैं। फ़र्क यह है कि ‘डेड पोयेट्स सोसायटी’ लड़कों का बोर्डिंग स्कूल वेल्टन अकादमी है और टीचर पुरुष मिस्टर कीटिंग (रॉबिन विलियम्स) है, जबकि माइक नेवेल निर्देशित फ़िल्म ‘मोना लीसा स्माइल’ में लड़कियों के वेलेस्ले कॉलेज में कैथरीनन एन वाट्सन (जूलिया रॉबर्ट्स) स्त्री टीचर है।
दोनों शिक्षण संस्थान उच्च वर्ग के बच्चों के लिए हैं। उनके लिए टीचर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं है। वेल्टन अकादमी का काल 1959 है। पहले दिन इंग्लैंड के कैम्ब्रिज से इंग्लिश पढ़े और वेल्टन के पूर्व छात्र मिस्टर कीटिंग के छात्र उसके पढ़ाने के गैरपरम्परागत तरीके से चकित हैं। जबकि कैथरीन को जल्द पता चलता है कि उसकी छात्राओं ने पूरी टेक्स्टबुक तथा पूरा सिलेबस कंठस्थ कर रखा है। उसके सामने चुनौती है, वह इन छात्राओं को क्या पढ़ाए? छात्राएँ जो यहाँ केवल एक सफ़ल पत्नी की भूमिका सीखने आई हैं। उनके भीतर
सदियों से स्त्री की रूढ़ भूमिका की छवि उसे तोड़नी है और बताना है कि वे न केवल मात्र लीडर की पत्नी बनने केलिए हैं, वरन वे स्वयं लीडर बनने की क्षमता रखती हैं। काल यहाँ भी 1950 के दशक का ही है।
मिस्टर कीटिंग काव्य के सहारे छात्रों में नई चेतना जगाता है, जबकि कैथरीन मॉर्डन आर्ट्स के सहारे यह काम करती है। छात्राओं को व्यक्तिगत स्वतंत्रता-आर्थिक स्वावलंबन से परिचित कराती है। दोनों टीचर को फ़िल्म के मध्य में मैनेजमेंट के कोप का सामना करना पड़ता है, अंतत: वे छात्रों के चहेते और एक सफ़ल टीचर की ऊंचाई पाते हैं।
इनसे हटकर है, 1994 की दो घंटे से कुछ ऊपर की फ़िल्म ‘रेनेसाँ मैन’। यह कॉमेडी-ड्रामा फ़िल्म पेनी मार्शल द्वारा निर्देशित है। बिल रैगो (डैनी डेविटो) तलाकशुदा असफ़ल व्यापारी है। वह विज्ञापन जगत में विफ़ल रहा है, तभी उसे सेना द्वारा नए रंगरूटों को प्रशिक्षण केलिए रखा जाता है। उसे आठ छात्र सौंपे जाते हैं, जिनका व्यवहार उसे ठीक करना है।
उसे प्रशिक्षण देने का कोई अनुभव नहीं है। इन अनुशासनहीन लोगों को वश में करना सरल नहीं है। परेशान हो कर वह उन्हें शेक्सपीयर का ‘हेमलेट’ पढ़ाना शुरु कर देता है, और धीरे-धीरे चमत्कार होता है। फ़िल्म को प्रशंसा के साथ आलोचना झेलनी पड़ी।
टीचर का काम बहुत चुनौती भरा और जटिल काम है। यह नैसर्गिक प्रतिभा का मामला भी है। टीचर प्रशिक्षित हो अथवा नहीं मगर एक सफ़ल शिक्षक केलिए मानवीय गुणों यथा संवेदनशीलता, धैर्य, अपनी विशेषताओं के साथ अपनी सीमाओं का ज्ञान होना आवश्यक है। एक कुशल टीचर को अपने छात्रों की संभावनाओं को पहचानता है, उसी दिशा में छात्रों को विकसित होने का अवसर देता है। एक विशिष्ट टीचर अपने छात्र की न्यूनता को उसके गुण में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। उपरोक्त फ़िल्में और इस तरह की शिक्षक केंद्रित अन्य फ़िल्में यह दिखाती हैं।
जरूरी नहीं, जो किसी संस्थान में शिक्षण करे वही आपका शिक्षक हो। शिक्षक कोई पेशेवर अथवा गैरपेशेवर व्यक्ति हो सकता है। कई बार गैरपेशेवर व्यक्ति अधिक कुशल शिक्षक होते हैं। यहीं यह भी बताती चलूँ कि शिक्षक और गुरु दो बिल्कुल भिन्न पद हैं। प्रत्येक शिक्षक गुरु पद को सुशोभित नहीं करता है। गुरु विरले होते हैं।
शिक्षक दिवस पर इस पेशे से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को बधाई!
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