कोरोना के दौरान शिक्षण संस्थान बंद रहें। अब जब शिक्षण संस्थान खुले हैं तो कई स्कूल जुआघर में तब्दील नजर आएं।
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शैक्षिक चुनौतियों का संकट
कोरोना के दौरान शिक्षण संस्थान बंद रहे। अब जब शिक्षण संस्थान खुले हैं तो कई स्कूल जुआघर में तब्दील नजर आए। विद्यार्थियों में करियर को लेकर कुंठा बढ़ी है। मिड डे मील की व्यवस्था में खामियां मिलीं। विद्यार्थियों के सपने तार-तार हुए।
आर्थिक व व्यक्तिगत संकट के चलते कई विद्यार्थियों ने बीच में पढ़ाई छोड़ दी तो कई ने दूसरी राह पकड़ ली। कौशल (स्किल्ड) और संपन्न विद्यार्थी ही दौड़ में टिक पाए। विद्यार्थियों में सवाल पूछने की ललक कम पड़ गई। कॉपी घर रह गई जैसे बहाने बढ़ गए हैं। सपने के दबाव में चेहरे की रंगत उड़ गई, मुस्कान फीकी पड़ गई।
सामूहिक जवाबदेही से सपने साकार हों
ऐसे में अमृत महोत्सव वर्ष के शिक्षक दिवस पर मोदी ने पीएम श्री के तहत 14,500 स्कूलों को मॉडल बनाने का जो बीड़ा उठाया है, वह निश्चित तौर पर सराहनीय है। 2014 के केंद्रीय बजट में शिक्षा के क्षेत्र में 38,600 करोड़ का प्रावधान था जो इस साल बढ़कर 1 लाख 4 हजार 277 करोड़ तक पहुंच चुका है। हालांकि, संसाधन से लेकर संकल्प तक शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर वृद्धि के बावजूद अभी भी यह बजट नाकाफी है।
नई शिक्षा नीति की बुनियाद पड़ चुकी है और खेल-खेल में, खिलौने के माध्यम से विद्यार्थियों को खिलने का अवसर प्रदान करने की बात चल रही है। नई शिक्षा नीति के लिहाज से स्कूल अब भी संसाधनों से लैस नहीं हैं।
केंद्र सरकार का पीएम श्री योजना के तहत 14,500 स्कूलों को विकसित करआसपास के शैक्षिक माहौल को सुधारने का संकल्प है। सरकारी स्कूलों के नतीजे भले सुधरे हैं लेकिन निजी बनाम सरकारी स्कूलों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में प्रतिभाएं अब भी कुंठित हैं।
महंगाई की मार पढ़ाई पर भी पड़ी है। संस्थानों के फीस की भरपाई करने में बच्चे और अभिभावक परेशान हैं। ऐसे में आजादी के शताब्दी वर्ष (2047) तक शैक्षिक क्रांति के सपने साकार करने के लिए शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों के साथ-साथ केंद्र व राज्य सरकारों को भी सपने जगाने होंगे।
हर हाल में शिक्षा पर सियासत का दौर खत्म करना होगा और मिलकर सपने साकार करने होंगे, तभी आजादी के शताब्दी वर्ष (2047) तक शैक्षिक क्रांति के भविष्य बुन पाएंगे। मिलकर उम्मीद करें, सपने साकार हों, विजयी भवः का मंत्र गुंजायमान हो।
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