करनाल के पास उन हरे-भरे खेतों के बीच से गुजरते राष्ट्रीय राजमार्ग पर रोजाना न जाने कितनी ही गाड़ियां निकलती होंगी। उनमें बैठे यात्रियों की नजर एक छोटे-से हरे बोर्ड पर भी जरूर पड़ती होगी, जिस पर लिखा है, तरावड़ी। शायद ही यह नाम अब किसी को कुछ याद दिलाता होगा। हालांकि, हरियाणा के गांव-कस्बों में आज भी जब किसी का बहुत नुकसान हो जाए या कोई पूरी तरह बर्बाद हो जाए, तो बरबस लोगों के मुंह से निकलता है...‘मारे गए तरावड़ी के घाट’।
यह वही तरावड़ी है, जिसे ऐतिहासिक स्रोतों में तराइन के नाम से भी जाना जाता है, जहां 1191 ईस्वी में मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच भीषण युद्ध हुआ था। पृथ्वीराज यह युद्ध जीत गए, पर मोहम्मद गौरी को पूरी तरह परास्त नहीं कर पाए। तबकात-ए-नासिरी पुस्तक के अनुसार, गौरी ने अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाया। उसकी फौज 1192 ईस्वी में एक बार फिर तराइन के मैदान में थी। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को संदेश भेजा कि अगर वह वापस लौट जाए, तो टकराव रुक सकता है। तय हुआ तब तक कोई पक्ष हमला नहीं करेगा।
इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, गौरी समझ गया था कि सीधी लड़ाई में वह राजपूतों से नहीं जीत सकता। उसने चुपचाप हमले की तैयारी की। पुस्तक जवामी-उल-हिकायत के अनुसार, गौरी ने अपने सैन्य शिविर में अलाव जलवा दिए। राजपूतों को लगा कि गौरी की सेना आराम कर रही है। इधर, गौरी ने रात में सो रही राजपूत सेना पर हमला बोल दिया। जब पृथ्वीराज युद्ध के लिए तैयार हुए, तो गौरी की सेना भाग निकली। यह भी चाल थी। पीछा कर रहे राजपूतों को गौरी की सेना ने रोक लिया और वहां हुए निर्णायक संघर्ष में पृथ्वीराज की सेना पराजित हुई। इसके बाद मोहम्मद गौरी ने पूरे उत्तर भारत में भयंकर तबाही मचाई।
इतिहासकार एस लेन-पूल लिखते हैं, 'तराइन के दूसरे युद्ध ने भारत के आत्मसम्मान को तहस-नहस कर दिया। राजपूतों को इस हार से उबरने में लंबा वक्त लगा। प्रभाव इतना व्यापक था कि नुकसान को इंगित करता मुहावरा बन गया... मारे गए तरावड़ी के घाट'।