भारत-पाकिस्तान के बीच खेला जाने वाला क्रिकेट मैच किसी युद्ध की तरह ही करार दिया जाता है। दोनों तरफ भावनाओं में बहने वाले लोग अच्छे प्रदर्शन पर खिलाड़ियों को सिर पर बैठा लेते हैं और खराब प्रदर्शन पर उनके घरों के सामने प्रदर्शन करते हैं, उनके परिवार तक को धमकी देने से बाज नहीं आते।
खेलों के साथ ऐसा भारत-पाकिस्तान के अलावा तब भी होता है, जब मुख्यतः यूरोपियन देश फुटबॉल खेलते हैं। वहां भी एक-दूसरे को गालियां देने से लेकर गोलियां चलाने तक का काम अंजाम दिया जाता है। खेलों को लेकर इस तरह का रवैया सोच में डालता है, क्योंकि खेलों का तो मूल मकसद ही एक-दूसरे के प्रति खेल भावना विकसित करने का होता है, न कि खेल भावना को ताक पर रखकर एक-दूसरे से युद्धरत हो जाने का।
फिर आते हैं भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच पर। ये खेल नहीं एक पूरा एक बाजार है, जहां टीवी से लेकर पटाखे तक बिकने को तैयार हैं। एक सामान्य सा खेल जो कि भारत के राष्ट्रीय खेल पर तक हावी है, उसका हौव्वा इस कदर आमजन के दिमाग में फिट कर दिया जाता है कि हार-जीत युद्ध की जय-पराजय जितनी गंभीर हो जाती है। तुर्रा यह कि खेल का हर प्रतिद्वंदी उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना सिर्फ एक पड़ोसी देश।
बात फिर सिर्फ जीत का जश्न मनाने तक सीमित नहीं रहती। कुछ सिरफिरे लोग इसे धर्म और लैंगिक अपशब्दों का अखाड़ा बना देते हैं। बात बहस से बढ़कर लड़ाई और दंगों तक पहुंच जाती है। महज एक खेल में हार-जीत का परिणाम कुछ लोगों के साथ साथ पूरे देश को उठाना पड़ता है। यहीं बात खत्म नहीं हो जाती। इस आग को आने वाली पीढ़ियों तक ऐसे ही पहुंचाने की पूरी कोशिश की जाती है।
आज यानी 24 अक्टूबर को फिर एक बार भारत-पाकिस्तान टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप में एक-दूसरे के खिलाफ खेलने वाले हैं। पिछले कुछ दिनों से अनवरत सोशल मीडिया से लेकर टीवी के विज्ञापनों तक में इसी मैच से संबंधित खबरों की बाढ़ जारी है।
समाचार चैनल्स में तो भारत-पाकिस्तान के पिछले सालों में खेले मैचों के अंश दिखाए जा रहे हैं। यहां तक भी ठीक है, लेकिन इन झलकियों में केवल वे हिस्से शामिल किए जा रहे हैं, जिनमें या तो खिलाड़ी एक-दूसरे से बहस कर रहे हैं या कोई कंट्रोवर्शियल स्थिति पैदा हो रही है। इतने पर भी चैनल्स रुक नहीं रहे, उन हिस्सों को विशेष कमेंट्री और स्लो मोशन के साथ-साथ रिपीट किया जा रहा है। मतलब एक ही शॉट कम से कम 10 बार दिखाया जा रहा है।
पिछले कई सालों से विज्ञापन की एक सीरीज चलाई जा रही है, जिसमें बाकी प्रतिद्वंदी देशों के साथ-पाकिस्तान को भी टारगेट किया गया है।
'मौका' भी है और दस्तूर भी है कि इस विज्ञापन में ज्यादातर पाकिस्तान को लेकर ही इस तरह के तंज कसे गए हैं कि मेरे 10 वर्षीय बेटे ने ऐसे ही एक विज्ञापन को देखकर कहा कि -'ये तो गलत बात है ममा। किसी को ऐसे थोड़े ही ना रोस्ट करते हैं।' क्योंकि इस विज्ञापन में दो बच्चे क्लास में बैठे हैं और बच्ची अपने सहपाठी बच्चे से कहती है कि तेरे पापा को थैंक्स, क्योंकि उन्होंने जीरो का आविष्कार नहीं किया होता तो मैथ्स इतना आसान नहीं होता।
जब बच्चे के पिता आते हैं तो वह बच्ची उनसे कहती है कि- 'अंकल हर मौके पर इतने जीरो लाओगे तो....।' ये कौन सा कल्चर, कौन सी शिक्षा हम बच्चों को दे रहे हैं? वे बच्चे जो निष्कपट हैं, जो न धर्म जानते हैं, न जात। उनके मन मे हम ये जहर भर रहे हैं। और ऐसा नहीं कि ये एक तरफा है। जो भी पक्ष ये जहर बो रहा है, वह कटघरे में खड़ा करने लायक है।