जमशेदजी टाटा युवा विवेकानंद से बहुत प्रभावित हुए थे।
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जमशेद जी हैरान थे विवेकानंद को देखकर
जमशेदजी टाटा भगवा वस्त्रधारी उस युवा के चेहरे का तेज और बातें सुनकर काफी हैरान थे। भारत को कैसे सबल बनाना है इस पर उनकी राय एकदम स्पष्ट थी, ना केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी। विवेकानंद ने एक और काफी अहम प्रेरणा जमशेदजी टाटा को इस यात्रा के दौरान दी। वो थी भारत में एक टॉप लेवल की यूनीवर्सिटी खोलना जहां से वर्ल्ड लेवल के स्टूडेंट्स देश भर में निकलें, जिसमें ना केवल साइंस की रिसर्च हो बल्कि ह्यूमेनिटी की भी पढ़ाई हो। टाटा ने दोनों ही बातों को गंभीरता से लिया भी, उसके बाद टाटा अपने रास्ते पर और स्वामी अपने रास्ते पर। इस मुलाकात में दो बातें टाटा ने स्वामीजी से समझीं, एक गरीब भारतीय युवा को भरपेट खाना मिल जाए और दूसरी शिक्षा मिल जाए तो वो देश की तकदीर बदल सकता है, और टाटा ने रोजगार और शिक्षा को अपना मिशन बना लिया।
ये लिखा था ब्रिटेन के अखबारों में
हालांकि दोनों की ये पहली मुलाकात थी, लेकिन टाटा उनसे काफी प्रभावित हुए। स्वामी जी का सम्मान टाटा की नजरों में तब और भी बढ़ गया, जब ब्रिटेन के अखबारों ने उनके भाषण के बाद लिखा कि ‘’After listening him we find how foolish it is to send missionaries to his country.”। शिकागो भाषण के बाद विवेकानंद के चर्चे पूरे यूरोप और अमेरिका में होने लगे, वहां से वो इंग्लैंड चले गए, जहां उन्होंने कई लैक्चर वेदांत पर दिए।
स्वामीजी 1897 में भारत आए और जब वो लौटे तो लोग उनकी घोडागाड़ी में से घोड़े निकालकर खुद जुत गए, ऐसे स्वागत से अभिभूत हो गए स्वामी जी। स्वामीजी ने भारतवासियों में इतना आत्मविश्वास बढ़ा दिया था कि हर कोई उन्हें सुनने को उतावला था। इधर जमशेदजी टाटा ने अपनी जिंदगी के चार मिशन बना लिए थे, एक स्टील मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोलना, एक विश्व स्तर की यूनीवर्सिटी शुरू करना, एक बड़ा होटल खड़ा करना और एक हाइड़्रो इलैक्ट्रिक प्लांट बनाना। हालांकि होटल ताज उनके सामने ही 1903 में बनकर तैयार हो चुका था बाकी तीनों सपने उनके बाद पूरा हो पाए।
विवेकानंद शिकागो भाषण के दौरान।
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