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युवा दिवस विशेष: जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का संदेश देते थे स्वामी विवेकानंद

सार

देह काम वसूलने के लिए है। देह चमकाकर रुई में सुरक्षित सजाने के लिए थोड़े ही है। ये नई बात थी। सन्यासी फुटबॉल खेल रहे हैं- ये बिलकुल नई बात थी। नहीं तो बूढ़े भारत की बूढ़ी मान्यता तो ये रही थी कि सन्यासी अगर किसी को खेलते हुए देखें, तो कहें, "आज ये खेल रहे हैं, कल काल इनके साथ खेलेगा बच्चा।"
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स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनलवरी 1863 को हुआ था। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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देखो, किताबी ज्ञान देने वाले तो हमेशा से बहुत रहे हैं। स्वामी विवेकानंद अनूठे हैं उस आदर्श से जो उन्होंने जी कर प्रस्तुत किया। बहुत कम तुमने साधु-संत, सन्यासी देखे होंगे, जो इतने सुगठित-सुडौल शरीर के हों जितने विवेकानंद थे। खेल की, कसरत की उनकी दिनचर्या में बंधी हुई जगह थी, और यही नहीं कि सिर्फ व्यक्तिगत रूप से खेलते थे; अपने साथियों को भी कहें कि- "आवश्यक है, व्यायाम आवश्यक है।"

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अब इस बात को समझना; सूक्ष्म है। एक ओर तो शरीर को बनाकर रखना है, और दूसरी ओर शरीर से चिपक भी नहीं जाना है- जैसे शरीर एक उपकरण है, एक संसाधन है; इस्तेमाल करना है उसका। लेकिन जिस चीज का इस्तेमाल करना है, उसको इस्तेमाल करने के लिए ही सही, स्वस्थ और मजबूत तो रखोगे न? तो मजबूत तो इसको रखना है।

उन्होंने कहा, "मजबूत रखना है, लेकिन इससे पहचान नहीं बांध लेनी है। जब मौका आएगा, इसको हंसते-हंसते त्याग भी देंगे और शरीर की जितनी हम सेवा कर रहे हैं, जितना इसको तेल पिला रहे हैं, जितना इसको व्यायाम दे रहे हैं, इससे दूना इससे काम लेंगे। तो देह, ये मत सोचना कि मैं तेरा सत्कार भर कर रहा हूं। देह की सेवा बिलकुल करेंगे; उसे अच्छा भोजन देंगे, मांसपेशियों को ताकत से भरपूर रखेंगे, और ये सब करके तुझसे काम वसूलेंगे।"
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देह काम वसूलने के लिए है। देह चमकाकर रुई में सुरक्षित सजाने के लिए थोड़े ही है। ये नई बात थी। सन्यासी फुटबॉल खेल रहे हैं- ये बिलकुल नई बात थी। नहीं तो बूढ़े भारत की बूढ़ी मान्यता तो ये रही थी कि सन्यासी अगर किसी को खेलते हुए देखें, तो कहें, "आज ये खेल रहे हैं, कल काल इनके साथ खेलेगा बच्चा।" तो इस ढहते हुए देश के ढहते हुए अध्यात्म में स्वामी विवेकानंद ने एक ताक़त भर दी - "स्ट्रेंथ इज़ लाइफ, वीकनेस इज़ डेथ (शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु है)।"

सुनने में साधारण सी बात है, पर बहुत-बहुत कीमती और प्रासंगिक बात है, क्योंकि बहुत पुराना है भारत; इतना पुराना होता गया, होता गया, वृद्ध ही हो गया, जर-जर ही हो गया; ताकत को, स्ट्रैंथ को बिलकुल भूल ही गया। उस वृद्ध भारत में नए प्राणों का संचार करा स्वामी विवेकानंद ने।

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स्वामी विवेकानंद - फोटो : Social Media
उन्होंने जीवन से जो क्रान्तिकारी आदर्श प्रस्तुत करा है, उसको देखिए। उनको एक स्वामी मात्र की तरह मत देखिए, या उनको एक वक्ता या लेखक मात्र की तरह मत देखिए। स्वामी विवेकानंद को आप बहुत ज्यादा उनके कृतित्त्व से नहीं जान पाएंगे। 

आप कहें, "मैं उनकी राज योग पर या कर्म योग पर किताबें पढ़ लूंगा तो मुझे पता चल जाएगा कि स्वामी विवेकानंद कौन थे," तो बात बनेगी नहीं। आपको उस इंसान की जिंदगी को देखना पड़ेगा - बड़ा खूबसूरत, जवान आदमी था। और जब आप उसकी जिंदगी को करीब जाकर देखेंगे, प्यार हो जाएगा आपको; बिलकुल मुरीद हो जाएंगे, फैन। क्योंकि योग इत्यादि की बातें तो बहुतों ने करी, स्वामी विवेकानंद ने भी करी, आज भी न जाने कितने लोग कर रहे हैं।

बातों की हिन्दुस्तान में कब कमी रही है? बातें करने वाले तो बहुत हैं, करके दिखाने वाले लोग कम रहे हैं। उन्होंने करके दिखाया। उन्होंने खुद आगे खड़े होकर आदर्श प्रस्तुत किया, और बिलकुल नए ढंग का आदर्श - उन्होंने अध्यात्म को जमीन पर उतार दिया, सड़क पर उतार दिया; भारत की ही नहीं, अमेरिका की सड़क पर उतार दिया।

जीवन में अगर ज्ञान उतरा है, किसी भी तरीके से - विवेकानंद को रामकृष्ण मिले थे, उस ज़रिए से उनके जीवन में ज्ञान उतरा था। आपके जीवन में किसी भी जरिए से अगर ज्ञान उतरा है, तो ज्ञान के बाद फिर मिशन चाहिए। अगर रामकृष्ण गुरु मिले हैं, तो फिर रामकृष्ण मिशन आएगा ही आएगा। 

मैं बार-बार कहा करता हूं, "मुझे मत बताओ कि तुम्हें पता क्या है। मुझे दिखाओ तुम जी कैसे रहे हो।" ये सब पता होना, जानकारी, ज्ञान इत्यादि बहुत मूल्य की चीज नहीं है; बहुतों को पता है। और जीने में जो एक केन्द्रीय बात विवेकानंद पकड़ते थे, वो थी 'ताकत'। मुझे दिखाओ तुम्हारी जिंदगी में ताकत कितनी है?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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