उन्होंने जीवन से जो क्रान्तिकारी आदर्श प्रस्तुत करा है, उसको देखिए। उनको एक स्वामी मात्र की तरह मत देखिए, या उनको एक वक्ता या लेखक मात्र की तरह मत देखिए। स्वामी विवेकानंद को आप बहुत ज्यादा उनके कृतित्त्व से नहीं जान पाएंगे।
आप कहें, "मैं उनकी राज योग पर या कर्म योग पर किताबें पढ़ लूंगा तो मुझे पता चल जाएगा कि स्वामी विवेकानंद कौन थे," तो बात बनेगी नहीं। आपको उस इंसान की जिंदगी को देखना पड़ेगा - बड़ा खूबसूरत, जवान आदमी था। और जब आप उसकी जिंदगी को करीब जाकर देखेंगे, प्यार हो जाएगा आपको; बिलकुल मुरीद हो जाएंगे, फैन। क्योंकि योग इत्यादि की बातें तो बहुतों ने करी, स्वामी विवेकानंद ने भी करी, आज भी न जाने कितने लोग कर रहे हैं।
बातों की हिन्दुस्तान में कब कमी रही है? बातें करने वाले तो बहुत हैं, करके दिखाने वाले लोग कम रहे हैं। उन्होंने करके दिखाया। उन्होंने खुद आगे खड़े होकर आदर्श प्रस्तुत किया, और बिलकुल नए ढंग का आदर्श - उन्होंने अध्यात्म को जमीन पर उतार दिया, सड़क पर उतार दिया; भारत की ही नहीं, अमेरिका की सड़क पर उतार दिया।
जीवन में अगर ज्ञान उतरा है, किसी भी तरीके से - विवेकानंद को रामकृष्ण मिले थे, उस ज़रिए से उनके जीवन में ज्ञान उतरा था। आपके जीवन में किसी भी जरिए से अगर ज्ञान उतरा है, तो ज्ञान के बाद फिर मिशन चाहिए। अगर रामकृष्ण गुरु मिले हैं, तो फिर रामकृष्ण मिशन आएगा ही आएगा।
मैं बार-बार कहा करता हूं, "मुझे मत बताओ कि तुम्हें पता क्या है। मुझे दिखाओ तुम जी कैसे रहे हो।" ये सब पता होना, जानकारी, ज्ञान इत्यादि बहुत मूल्य की चीज नहीं है; बहुतों को पता है। और जीने में जो एक केन्द्रीय बात विवेकानंद पकड़ते थे, वो थी 'ताकत'। मुझे दिखाओ तुम्हारी जिंदगी में ताकत कितनी है?
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