रचनात्मकता के बादशाह सुरेश सलिल जी
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उनका काव्य संचयन हितैषी हो या फिर कविता सदी, पाब्लो नेरुदा की प्रेम कविताओं का हिन्दी अनुवाद हो या फिर नाजिम हिकमत की कविताएं, सुरेश सलिल के अपार रचनात्मक खजाने में उनकी सक्रियता और रचनात्मकता को सामने लाने वाले कई दस्तावेज हैं।
कविता को दायरे में नहीं बांध सकते
कविता और गीत के बारे में सुरेश सलिल कहते थे .. ‘मैं शिल्पवाद और भाषा के आग्रह का लगातार विरोध करता रहा हूं। कविता किस शिल्प में लिखी जाए, गीत में, मुक्त छंद में या फिर किसी भी रूप में, ये कविता की विषय वस्तु स्वयं तय करती है। ऐसा नहीं है कि आपने तय कर लिया कि इस विषय वस्तु को हमें गीत में ही लिखना है, तो आप हर विषय गीत में ही लिखते रहें, कविता को आप किसी दायरे में नहीं बांध सकते। वह किसी भी रूप में अभिव्यक्त हो सकती है।‘
सलिल जी की अनुदित कहानियों का संग्रह पिछले साल अगस्त में ही आया था, अपनी ज़ुबान में। नाज़िम हिकमत की कविताओं के अनुवाद का संग्रह– देखेंगे उजले दिन... काफी पसंद किया गया। कविताओं के अलावा सलिल जी ने बच्चों पर बहुत काम किया, बच्चों और किशोरों के मनोविज्ञान को गहराई से समझने वाले सलिल जी ने बेहद आसान भाषा में उनके लिए लिखा। कविताएं, गीत और तमाम क्रांतिकारियों की जिंदगी के तमाम पहलुओं से उन्हें रूबरू करवाया। भगत सिंह के अलावा उस दौर के तमाम गुमनाम लेकिन बेहद जुझारू क्रांतिकारियों की जीवनी उनके भीतर ऊर्जा भरती और सलिल जी उनके बारे में गहराई से शोध करते।
सत्ता और पूंजीवाद के जनविरोधी चेहरे को वह अपने तरीके से सामने लाते- बेहद संजीदगी और भाषाई मर्यादाओं का पूरा-पूरा सम्मान करते हुए। समझौता उन्होंने कभी नहीं किया। काकोरी के दिलजले का शोध-संपादन करने के अलावा काकोरी के क्रांतिकारी शिवकुमार मिश्र की आत्मकथा काकोरी से नक्सलबाड़ी का संपादन भी सलिल जी ने किया।
रचनात्मक ऊर्जा से खुद को रखा जीवंत
अनुवाद में उनका जवाब नहीं था। भाषा प्रवाह ऐसा कि आप पढ़ते चले जाएं, बगैर इस एहसास के कि यह किसी अन्य देश की सामाजिक, राजनीतिक परिदृष्य के संदर्भ में या पात्रों पर लिखा गया है।
बेशक आज की पीढ़ी के लिए साहित्य और कविता के उत्सवी मायने हों, आज के दौर में बेशक साहित्य का बाजार एक नए ग्लैमर के साथ नजर आ रहा हो, पुस्तक मेलों, लिटरेचर फेस्टिवल के अलावा ऐसे तमाम आयोजनों की शहर-शहर में धूम हो, साहित्यकारों की सोच बदली हो, लेकिन सलिल जी उन सबसे अलग अपनी दुनिया में गुमसुम, बेहद सीमित दायरों और अपनत्व से भरे अपने कुछ मित्रों के बीच लिखते-पढ़ते और खुद को गढ़ते रहे।
आखिरी सांस तक मुस्कराते, बीमारी में भी रचनात्मक ऊर्जा से खुद को जीवंत बनाते सलिल जी चुपचाप चले गए। उनके विशाल रचना संसार एक धरोहर की तरह हमेशा हमारे साथ रहेंगे। अलविदा सलिल जी।
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