फ़ोर्ब्स पत्रिका के ताजा 100 भारतीय आइकॉन्स की लिस्ट में सनी लियॉन भी शामिल हैं क्योंकि उन्हें इस नेट ट्रैफिक में हमने सर्वाधिक खोजा है। 2019 में अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, फ्रांस जैसे देशों से भी हम भारतीय पोर्न देखने के मामले में आगे रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या 2013 की 40 फीसदी की पोर्न लत के 2019 में 86फीसदी तक पहुंचने के साथ ही हमारी चेतना का स्वरूप समेकित रूप से विकृत तो नही हो रहा है। क्या हम एक कामांध समाज की चेतना का निर्माण कर रहे है। 2017 में जियो के आने के बाद स्मार्टफोन पर जिस तरह से पोर्नहब हमने अपने मन में विकसित कर लिये हैं वह इस बात की चेतावनी भी है कि हमारे इंटरनेट उपभोग पर तार्किक बंधन भी आवश्यक है।
केंद्र सरकार ने पिछले सालों में करीब 400 पोर्नसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया है, इसके बाबजूद जिओ कम्पनी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि इससे महज 200 एमबी डाटा की खपत स्मार्टफोन से घटी है। समझा जा सकता है कि हमारी सामूहिक चेतना किस तरफ उन्मुख है। इसलिये इंटरनेट की मौलिक आजादी का नियमन और नियंत्रण अत्यावश्यक है। केवल एक नागरिक की आजादी भर से यह जुड़ा हुआ सीमित महत्व का मामला नहीं है, ये समाज की सेहत का आधार भी है। जाहिर है इसे बोलने, घूमने, फिरने, रहने जैसी जीवनोपयोगी स्वतंत्रता के समानांतर नही रखा जा सकता है।
एक सभ्य और सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के अपने अंतर्निहित हित होते हैं जो सर्वोपरि है। अगर इंटरनेट की मौलिक स्वतंत्रता राष्ट्रीय राज्य की अवसरंचना या सुरक्षा में खलल पैदा करती है तो कोई भी सम्प्रभु राज इसे स्वीकार नही करेगा। इंटरनेट के मौलिक अधिकार पर जश्न मनाने वाले बड़े वर्ग को इस तथ्य को समझना ही होगा कि इस आजादी की बुनियाद पर न तो राष्ट्रीय सुरक्षा औऱ न ही सामाजिक विद्रूपता को खड़ा किया जा सकता है।
असल में भारत के चुनावी लोकतंत्र ने आजादी के मायनों को अपनी अपनी सुविधा की व्याख्या पर खड़ा कर रखा है। सोशल मीडिया के असीमित प्रभाव ने इसमें करोड़ों लोगों को एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा दिया है और आज कथित तौर पर जनमत को प्रभावित करने का यह सशक्त हथियार भी बन गया है। स्वाभाविक ही है कि भारत जैसे देश में जहां नेशन फर्स्ट का कोई विचार नागरिकों के जेहन में नही रहता है वहां इस नेट की तार्किक आजादी का विचार ही राष्ट्रीय हित में है।
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