शिवसेना का चुनाव चिन्ह
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भगवा गठबंधन और शिवसेना का किरदार
यह भी गौरतलब बात है कि जब तक बाल ठाकरे जिंदा और राजनीति में सक्रिय रहे तब तक महाराष्ट्र की भगवा गठबंधन में शिवसेना बड़े भाई के किरदार में रही। 1995 में जब भगवा गठबंधन की विजय हुई तो शिवसेना के मनोहर जोशी राज्य के मुख्यमंत्री और भाजपा के गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने, लेकिन 2014 के चुनाव के बाद महाराष्ट्र में शिवसेना की भूमिका छोटे भाई की हो गई क्योंकि उसे भाजपा के 122 सीटों की तुलना में आधी यानी 63 सीट मिली और उसे मजबूरन मुख्यमंत्री पद भाजपा के देवेंद्र फडणवीस को देना पड़ा।
बहरहाल, महाराष्ट्र में छोटा भाई बनने का यह अपमान उद्धव ठाकरे बर्दाश्त नहीं कर पाए और बदला लेने के लिए मौके का इंतजार करने लगे। 2019 के चुनाव में जब भाजपा की सीटें 122 से घटकर 106 हुई तो उन्हें बदला लेने का मौका मिल गया और उन्होंने ढाई साल भाजपा और ढाई साल शिवसेना के मुख्यमंत्री की मांग कर दी। जबकि दोनों दलों ने देवेंद्र फडणवीस को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने के नारे के साथ चुनाव लड़ा था।
कांग्रेस का साथ पड़ा भारी
ढाई साल शिवसेना के लिए मुख्यमंत्री की मांग करते समय उद्धव जानते थे कि भाजपा हाईकमान उनकी मांग नहीं मानेगा। लिहाजा, उद्धव ठाकरे ने उसी कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की आत्मघाती निर्णय लिया जिसकी मुखर आलोचना बाल ठाकरे जीवन भर करते रहे।
शिवसेना कार्यकर्ताओं, विधायकों और सांसदों का रुख शुरू से कट्टर और आक्रामक हिंदुत्व का रहा है। ऐसे में वे कांग्रेस और एनसीपी का साथ मन से स्वीकार ही नहीं कर सके। यही वजह है कि पिछले साल उद्धव ठाकरे को जोरदार झटका देते हुए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 56 में से 40 विधायकों ने विद्रोह कर दिया और राज्य में भाजपा के साथ सरकार बना ली। इसके बाद उद्धव ठाकरे को एक और झटका तब लगा जब उनके 12 सांसद शिंदे गुट में चले गए। इसीलिए निर्वाचन आयोग के फैसले को उद्धव के लिए तीसरा और सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।
अब शिवसेना के सामने अस्तित्व का संकट है, क्योंकि शिवसेना नाम और पार्टी का चुनाव चिह्न धनुष-बाण एकनाथ शिंदे को मिल चुका है। एक तरह से वह शिवसेना सुप्रीमो बन गए हैं। अब उद्धव के समर्थक भी कहने लगे हैं कि अपने फैसलों के चलते ठाकरे परिवार बाल ठाकरे की विरासत को संभाल नहीं पाया।
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