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शीला दीक्षित स्मृति शेषः एक शहर की तस्वीर बदल देने वाली नेता का यूं अचानक चले जाना

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दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कांग्रेस की बेटी थीः राहुल गांधी - फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली की 3 बार सीएम रहीं शीला दीक्षित का जाना केवल एक जिस्म का दुनिया से कम हो जाना मात्र नहीं है। राहुल गांधी के शब्दों में वे कांग्रेस की बेटी थीं। एक ऐसी बेटी जो अपनी बात पर जिद की हद तक टिके रहने, आम लोगों के बीच हर समय बने रहने के लिए लोकप्रिय थीं। उनका व्यवहार और आम लोगों से जुड़ाव उन्हें कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी के नेताओं की फेरहिस्त में सबसे अलग बनाता था।

 

शीला दीक्षित के पास भविष्य का जिस तरह का विजन का था वैसा कम ही कांग्रेसी नेताओं में देखने को मिला। उनकी सांगठनिक क्षमताएं और कुशलताएं भी सबसे अलग थीं। यही वजह थीं कि ढलती उम्र में भी वे दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर काबिज थीं। वे एक भविष्यदृष्टा राजनेता थीं। आधुनिक दिल्ली उसकी बानगी भी है।

आधुनिक दिल्ली और शीला दीक्षित 

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दिल्ली के नये रूप में ढलने की कहानियां भी कुछ कम यादगार नहीं  है। उन दिनों मेरा ऑफिस ग्रीन पार्क में था। मेरा घर हनुमान रोड से ज्यादा दूर नहीं था और मैं अपने स्कूटर से ऑफिस जाता था। मेडिकल के पास रेड लाइट थी। छह रास्ते-यानी एक बार रेड लाइट में फंसे तो 7 मिनट। इतनी देर में हमारा चेहरा काला हो जाता था। नाक को साफ करो तो कालिख निकलती थी। फिर वहां अपने तरीके का अनूठा फ्लाई ओवर बनना शुरू हुआ।

उधर, उससे पहले बड़े विरोध के बाद दिल्ली की डीज़ल बसों, खासकर हत्यारी रेड लाइन बसों को बंदकर सीएनजी बसों को अनिवार्य कर दिया गया। फिर तिपहिया स्कूटरों को भी सीएनजी में बदला गया। उसके बाद दिल्ली में हरियाली बढ़ाने के काम हुए। अब सड़क पर निकलना अपना मुंह काला करना या सांस में कार्बन घोलना नहीं रह गया।

यह नई तरह की दिल्ली थी जिसे शीला दीक्षित अपने हाथों से आकार दे रही थी। पर्यावरण के लिए शीला दीक्षित के योगदान पर अलग से लिखा जा सकता है। कुल मिलाकर शीला दीक्षित को दिल्ली का चेहरा बदलने का श्रेय दिया जाता है। उनके कार्यकाल में दिल्ली में विभिन्न विकास कार्य हुए।

शीला दीक्षित से मनोज तिवारी की मुलाकात - फोटो : अमर उजाला

कांग्रेस का लंबा और पुराना अध्याय थीं शीला दीक्षित 
बहरहाल, विकास की भविष्योन्मुखी सोच, नेहरु-गांधी विचारधारा की समर्थक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और उससे आगे आम लोगों के दिलों पर राज करने वाली शीला दीक्षित का राजनीतिक करियर एक लंबा अध्याय था। 

शीला दीक्षित साल 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। उनके नेतृत्व में लगातार तीन बार कांग्रेस ने दिल्ली में सरकार बनाई। वह सबसे लंबे समय (15 साल) तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। 

कांग्रेस की कद्दावर नेता शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उन्होंने दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से पढ़ाई की और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की। शीला दीक्षित साल 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश के कन्नौज से भी सांसद रहीं। बतौर सांसद वह लोकसभा की एस्टिमेट्स कमिटी का हिस्सा भी रहीं। 

 

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शीला ने महिलाओं के लिए भी अलग तरह से काम किया। - फोटो : सोशल मीडिया
शीला दीक्षित ने महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग में 5 साल (1984-1989) तक भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे प्रधानमंत्री कार्यालय में 1986 से 1989 तक संसदीय कार्यराज्यमंत्री रहीं।

अनूठी सांगठनिक क्षमता थीं शीला दीक्षित के पास 
आज जिस स्थिति में कांग्रेस है वहां शीला दीक्षित जैसे राजनेता पार्टी के मार्गदर्शक के साथ-साथ संगठन के विवेक के रूप में मौजूद रहे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बेहद करीब मानी जाने वाली शीला दीक्षित का विरोधियों और विपक्षी नेताओं के साथ व्यवहार भी हमेशा चर्चा में रहा।

हाल ही में भाजपा सांसद मनोज तिवारी का जीत के बाद उनसे घर पर मिलने जाना भी यह बताता है कि वे किस तरह विरोधी नेताओं से मिलती थीं और विपक्षी नेता भी उन्हें बेहद पसंद करते थे। जीवन और राजनीति में प्रगतिशील, उदार और लोकतांत्रिक मूल्यों से भरपूर शीला दीक्षित बेहद अलग नेता रहीं। 

साल 1998 के लोकसभा चुनावों में शीला दीक्षित को भारतीय जनता पार्टी के लाल बिहारी तिवारी ने पूर्वी दिल्ली क्षेत्र में मात दी थीं। बाद में वह मुख्यमंत्री बनीं। शीला दीक्षित गोल मार्केट क्षेत्र से 1998 और 2003 से चुनी गईं। इसके बाद 2008 में उन्होंने नई दिल्ली क्षेत्र से चुनाव लड़ा। शीला दीक्षित के दो बच्चे हैं- संदीप दीक्षित और बेटी लतिका सैयद। संदीप दीक्षित कांग्रेस से सांसद रह चुके हैं। आज जब कांग्रेस को ऐसे कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित लोगों की जरूरत थी। सच में यह अपूरणीय क्षति है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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