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प्रियंका गांधी को सोनभद्र जाने से रोककर भाजपा ने की रणनीतिक भूल?

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26 घंटे के बाद प्रियंका गांधी का उतर प्रदेश के चुनार किले में चल रहा धरना खत्म हो गया। - फोटो : अमर उजाला
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26 घंटे के बाद प्रियंका गांधी का उतर प्रदेश के चुनार किले में चल रहा धरना खत्म हो गया। सोनभद्र जिले के  उभा गांव में नरसंहार के शिकार हुए लोगों के परिजनों से मिलने के बाद प्रियंका गांधी ने अपना धरना खत्म किया।

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इस पूरे घटनाक्रम ने यूपी सरकार के कामकाज और रणनीति पर सवाल खड़ा कर दिया है। पीड़ितों से मिलना विपक्ष के नेताओं का लोकतांत्रिक अधिकार है। फिर जब यूपी सरकार ने  पीड़ित परिवारों से अंत में प्रियंका को मिलवा ही दिया तो फिर सरकार ने इतनी ड्रामेबाजी क्यों की? क्योंकि इसका राजनीतिक लाभ तो कांग्रेस को मिला।

योगी आदित्यनाथ और प्रियंका गांधी
प्रियंका गांधी को उभा गांव जाने से रोकने का मकसद क्या था? क्योंकि राजनीतिक पटल पर कांग्रेस हेडलाइन में चुनार गेस्ट हाउस के घटनाक्रम के कारण उस समय आई है, जब बसपा प्रमुख मायावती अपने भाई को केंद्रीय जांच एजेंसियों के निशाने से बचाने में लगी है। वहीं सपा नेता अखिलेश यादव उभा गांव के पीडितों के प्रति संवेदना व्यक्त करने की सिर्फ खानापूर्ति कर रहे थे।
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हालांकि प्रियंका गांधी के धरने और गिरफ्तारी के घटनाक्रम को 1977 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी से तुलना करना ठीक नहीं है। इंदिरा गांधी की बिहार की बेलछी यात्रा से भी इसकी तुलना ठीक नहीं है। हालांकि निश्चित तौर पर हताश कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को प्रियंका गांधी के नए अंदाज से ताकत मिली है। उनमें यह विश्वास जागा है कि प्रियंका गांधी ड्राइंग रूम और एयरकंडिशन की राजनीति से निकल जमीन पर भविष्य में निकलेंगी।

प्रियंका में कांग्रेस को एक बार फिर से नई उम्मीद दिखाई दी है। - फोटो : अमर उजाला

क्या ड्राइंग रूम-एयरकंडिशन पॉलिटिक्स से निकल ही है कांग्रेस?
प्रियंका गांधी ने चुनार के किले स्थित गेस्ट हाउस में बिजली और पानी का काटे जाने के बाद भी धरने पर बैठे रहने का फैसला लिया। इससे थके-हारे कांग्रेसियों में जान आई है। लगातार हार झेल रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए यह संजीवनी है, क्योंकि इस समय कांग्रेस के पास संघर्ष करने नेताओं का भारी अभाव है। कांग्रेस नेता ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स करते रहे हैं। एयरकंडिशन कमरों से बाहर नहीं निकलते हैं।

यह आरोप खुद कांग्रेसी कार्यकर्ता लगाते हैं। कांग्रेसी नेता पिछले तीस सालों की राजनीति में इतना आराम पसंद हो गए हैं कि एक गर्मी भरी रात में किसी गांव में भी नहीं रुक सकते। कांग्रेसी नेता अगर किसी इलाके में दौरे पर निकलते हैं तो पहले पता करते हैं कि आसपास कोई एयरकंडिशन होटल है या नहीं।

राहुल गांधी पर भी एयरकंडिशन संस्कृति बढ़ावा देने का आरोप लगा। उनपर दिल्ली में ड्राइंग रूम में बैठकर फैसला लेने का आरोप लगा। यह भी आरोप लगा कि राहुल चुनावी साल में सिर्फ चुनावी पर्यटन के लिए निकलते हैं। इससे कार्यकर्ता लगातार हताश होते गए। लेकिन चुनार के किले में रात बिता प्रियंका ने परंपरा को तोड़ा है। उनके साथ कांग्रेसी कार्यकर्ता भी बैठ गए हैं। दरअसल, कांग्रेस के कई संघर्षशील नेताओं ने कांग्रेस के ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स के कारण कांग्रेस को राम-राम कहा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी औऱ आसाम में हेमंत विस्व सरमा इसके उदाहरण हैं।

क्या भाजपा लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण कर रही है ?
किसी भी घटना के बाद पीड़ितों से मिलने की परंपरा भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों में शामिल है। जब कांग्रेस देश में शासन कर रही थी तो विपक्षी दल जिसमें भाजपा भी शामिल थे। किसी घटना के बाद घटनास्थल का दौरा करते रहे है। फिर आज सत्ता मे आने के बाद भाजपा क्यों इस लोकतांत्रिक परंपरा को खत्म कर रही है। वैसे यह पहली घटना नहीं है।

मध्यप्रदेश में मंदसौर में हिंसा के बाद किसानों परिवारों से मिलने जा रहे राहुल गांधी को पहले भी रोका गया था। जून 2017 में मंदसौर में हिंसा में मारे गए किसानों के परिजनों से मिलने को जा रहे राहुल गांधी को तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान ने रोका था।

यही नहीं गुजरात के नेता हार्दिक पटेल भी मंदसौर पीड़ित किसान परिवारों से मिलने जा रहे थे। उन्हें भी मध्यप्रदेश पुलिस ने रोक दिया था। लोकतंत्र में पीड़ितों से मिलना विपक्ष का अधिकार है। अगर यह अधिकार भी शासन या सत्ता छीन लेगी तो लोकतंत्र का मतलब क्या है? 

वैसे भी प्रियंका गांधी सोनभद्र में पीड़ित परिवारों के मिलकर हिंसा फैलाने नहीं जा रही थी। प्रियंका गांधी शासन की हर शर्त मानने को तैयार थी, लेकिन यूपी सरकार ने उन्हें सोनभद्र जाने से रोक दिया। निश्चित तौर पर भाजपा सरकार में कुछ घबराहट है, तभी प्रियंका गांधी को सोनभद्र जाने से रोका गया।

क्या प्रियंका को सोनभद्र जाने से रोकना भाजपा की रणनीतिक भूल है?
प्रियंका सोनभद्र जाने से रोका जाना क्या भाजपा की रणनीतिक भूल है? इसके पीछे तर्क यह है कि अगर प्रियंका गांधी सोनभद्र जाकर पीड़ित परिवारों से मिल भी लेती तो इसका नुकसान क्या था, या इसका लाभ क्या था? वे परिवारों से मिल वापस दिल्ली चली जाती। ज्यादा से ज्यादा सोनभद्र में एक प्रेस कांफ्रेंस करतीं।

दरअसल, सोनभद्र जाकर परिवारों से मिलने के बाद प्रियंका को उतना राजनीतिक लाभ नहीं मिलता, जितना चुनार के किले में धरने के बाद प्रियंका को मिला है। यूपी सरकार को कम से कम यह पता होगा कि देश में नेताओं द्वारा पीड़ितों से मिलना, उन्हें सांत्वना देना मात्र एक परंपरा ही रह गई है।

नेताओं के जाने के बाद भी पीड़ितों का हाल वही का वही रहता है। अगर प्रियंका गांधी सोनभद्र जाकर नरसंहार के शिकार हुए परिवारों से मिल उन्हें सांत्वना देती तो इससे भाजपा को कोई नुकसान नहीं होना था। एक दो दिनों में बात आई गई हो जाती है, जैसे पहले भी तमाम मामलों में इस देश में होता रहा है। इसका एक उदाहरण मुजफ्फरनगर के दंगे है।

मुजफ्फरनगर में दंगों के शिकार हुए पीड़ित परिवारों का आज क्या हाल आज है, वो देश जानता है। दंगों के बाद तमाम दलों के नेता पीड़ितों से मिलने पहुंचे थे। लेकिन आज हालात क्या हैं? अभी तक दंगों से संबंधित 42 मामलों का न्यायालय से फैसला आ चुका है। पुलिस की जांच में भारी खामियों के कारण 41 मामलों में दंगों के आरोपी बरी हो चुके हैं।

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बीएचयू के ट्रामा सेंटर अस्पताल में प्रियंका गांधी - फोटो : अमर उजाला

कमजोर होती बसपा-सपा की जमीन पर कांग्रेस हो सकती है खड़ी?
प्रियंका गांधी इस समय यूपी पर खास ध्यान दे रही है, तभी उन्होंने सोनभद्र में हुए सामूहिक नरसंहार की घटना के तुरंत बाद सोनभद्र का रुख किया। यह सच्चाई है कि पिछले बीस सालों में यूपी और बिहार की तरफ कांग्रेस ने ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस का संगठन कमजोर होता गया। यूपी में कांग्रेस का वोट बैंक भाजपा, सपा और बसपा में शिफ्ट हो गया।

2019 के आम चुनाव के बाद राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद बचे-खुचे कांग्रेसी कांग्रेसी कार्यकर्ता सकते में हैं। हताशा में हैं। ऐसे में प्रियंका गांधी ने जनता के बीच आकर कमान संभालने की कोशिश की है। लगातार हार से हताश कांग्रेसियों को लगता है कि अब प्रियंका गांधी ही एकमात्र कांग्रेस की उम्मीद है।

दरअसल, भारी सफलता के बाद भाजपा शासन की गलत रणनीति कांग्रेस की मदद कर सकती है। भाजपा ने यूपी में सपा और बसपा को भारी नुकसान पहुंचाया है। बसपा और सपा के कोर वोटरों को अब अहसास हो गया है कि भ्रष्टाचारों के आरोपों से घिरे सपा और बसपा के नेता भाजपा से सीधी लड़ाई नहीं लड़ सकते।

सपा और बसपा दोनों दलों के नेताओं को सीबीआई, ईडी और अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों का भय है। वैसे में सपा बसपा के नेता जान-बचाने के लिए भाजपा से अंदरुनी सांठगांठ भी कर सकते हैं। दूसरी तरफ यूपी में कांग्रेस की राजनीति का सफाया भाजपा ने नहीं बल्कि सपा और बसपा ने किया था। 1990 के बाद सपा और बसपा ने कांग्रेस के वोट बैंक को निगल लिया था।

दलित और मुस्लिम कांग्रेस के कोर वोटर थे। वे सपा और बसपा के साथ चले गए थे। जबकि कांग्रेस के ब्राहमण कोर वोट ने भाजपा का दामन थाम लिया। किसी जमाने में दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण गठजोड़ कांग्रेस को मजबूत रखता था। सवाल यही उठ रहे हैं कि बदलते हालात में बसपा और सपा के वोट कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो सकते हैं। लेकिन अहम सवाल यही है कि क्या भाजपा को छोड़ ब्राह्मण कांग्रेस के साथ आएंगे ? 

क्या यूपी के ब्राहमण आज राहुल और प्रियंका पर उतना भरोसा करेंगे, जितना किसी जमाने में वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी पर करते थे ?  हालांकि कांग्रेस के पास इस समय हिंदी पट्टी के दो राज्यों बिहार और यूपी में न तो जिला स्तरीय ढांचा बचा है न ही ब्लॉक स्तरीय ढांचा बचा है। फिर संगठनहीन कांग्रेस को कैसे प्रियंका गांधी जिंदा करेगी, यह समय बताएगा।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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