शरद यादव का संपूर्ण राजनीतिक जीवन देखें तो उनका ज्यादातर वक्त अपनी पक्की जमीन तलाशने में ही बीता।
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मंडल आयोग की रिपोर्ट का राजनीति पर असर
शरद यादव के राजनीतिक जीवन का चरम बिंदु 1989 में तत्कालीन वीपी सिंह सरकार में मंत्री रहते हुए पिछड़ों को नौकरी व शिक्षा में आरक्षण की सिफारिश करने वाली ‘मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करवाना था।‘ कहते हैं कि वीपी सिंह इस रिपोर्ट से होने वाली सामाजिक उथल-पुथल की संभावना के मद्दे नजर इसे लागू करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उनके मंत्रिमंडल के दो युवा सहयोगियों शरद यादव और राम विलास पासवान ने इसे उन पर दबाव डालकर लागू करवाया, यह मानकर कि इससे कांग्रेस कमजोर हो सकती है।
इस रिपोर्ट के लागू होने की घोषणा के बाद ही देश की राजनीति में भूचाल आ गया। मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद हिंदू समाज के और विभाजित होने की आशंका के बीच भाजपा और संघ ने राममंदिर आंदोलन को खड़ा किया। समूची सियासत मंडल बनाम कमंडल में सिमट गई। इसका आगे चलकर परिणाम यह हुआ कि पिछड़ी जातियों को नौकरियों और शिक्षा में बहुप्रतीक्षित आरक्षण तो मिला, लेकिन यह लक्ष्य काफी हद तक पूरा होने के बाद अधिकांश पिछड़ी जातियां भगवा रंग में रंग गईं।
उधर शरद यादव के दूसरे समाजवादी साथियों लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह और नीतीश कुमार ने क्षेत्रीय राजनीति को साधते हुए जातिवादी राजनीति में ही अपना लाभ देखा और बाद में उन्हीं शरद यादव को लगभग हाशिए पर ढकेल दिया, जिनको वो समाजवादी आंदोलन में अपना बड़ा भाई मानते थे।
यह भी विडम्बना ही है कि मंडल राजनीति का खूंटा गाड़ने के बाद शरद उसी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे, जिसके सत्ता में आने के पीछे अटलजी के व्यक्तित्व के साथ-साथ कमंडल का भी बड़ा करिश्मा था।
जमीन तलाशते रहे शरद यादव
शरद यादव का संपूर्ण राजनीतिक जीवन देखें तो उनका ज्यादातर वक्त अपनी पक्की जमीन तलाशने में ही बीता। कोई भी सीट ऐसी नहीं थी, जिसे वो दावे के साथ अपना कह सकते थे। राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के चलते वो क्षेत्रीय नेता भी नहीं बन सकते थे, जैसा कि लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव या नीतीश कुमार ने किया। क्योंकि इन सबके लिए समाजवाद जाति धर्म में लिपटा सत्तावाद ही था।
उधर देश में कमंडल राजनीति का दूसरा चरण शरद यादव जैसे नेताओं के राजनीतिक गुमनामी में जाने का कारण बना। आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में एक उपभोगवादी और धार्मिक आग्रहों में लिपटा तबका आकार ले रहा था। यूपीए 2 सरकार के जाते-जाते कमंडल राजनीति की जमीन पुख्ता हो चुकी थी। हिंदू समाज में जातीय विभाजन धार्मिक विभाजन के आगे कमजोर पड़ चुका था ( यह बात अलग है कि कुछ क्षेत्रीय नेता अब हिंदुत्व के खिलाफ फिर उसी जाति राजनीति को हवा देने में लगे हैं, इसके नतीजे क्या होंगे, यह आगे पता चलेगा)।
संघ द्वारा 2013 में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने के बाद शरद यादव ने एनडीए संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया तो उधर बिहार में नीतीश कुमार में सत्तारूढ़ जदयू ने भाजपा गठबंधन को तोड़ दिया। तमाम विपक्षी नेताओं के पूर्वानुमानों को तगड़ा झटका देते हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में अपने दम पर ही बहुमत हासिल कर ली, हालांकि सरकार उसने सहयोगी दलों को साथ लेकर एनडीए की बनाई।
मोदी युग में कमजोर पड़ गई थी राजनीति
मोदी युग में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति में शरद यादव जैसे नेताओं की खास जगह नहीं बची। दरसअल मोदी के पीएम बनने के साथ देश में ओबीसी के राजनीतिक वर्चस्व की आकांक्षा का वह चक्र पूरा हो गया था, जिसे शरद यादव ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करवा कर शुरू किया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने खुलकर बताया कि वो पिछड़े वर्ग से हैं।
मोदी के पीएम बनने और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में और ज्यादा ताकत के साथ सत्ता में लौटने का अर्थ यही था कि शरद अपने ही खेल में मात खा गए थे। कमंडल ने मंडल को अपने भीतर समेट लिया था। यह बात निर्विवाद है कि मोदी के पीछे आज देश की बहुसंख्यक पिछड़ी जातियों का समर्थन है और आगे भी इसमें खास फर्क पड़ने वाला नहीं है। कहते हैं कि शरद यादव अपनी अस्वस्थता के बावजूद कोशिश में थे कि मोदी के हिंदुत्व के खिलाफ वो विपक्षी दलों को एक करें। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं है। क्योंकि 21वीं सदी में राजनीति के आयाम बदल गए हैं।
बहरहाल इतिहास शरद यादव को इसलिए तो याद रखेगा ही कि उन्होंने उस सामाजिक न्याय की बुनियाद रखी, जिसका देश की राजनीति को अर्से से इंतजार था।
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