आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर कुछ गंभीर प्रश्न
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भारत में CBSE बोर्ड से लेकर JEE, NEET, CUET, UGC-NET, SSC, UPSC, रेलवे, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ परीक्षाएं नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों के भविष्य का आधार हैं। इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना पूरे शिक्षा तंत्र पर लोगों के विश्वास को कमजोर करता है। भारत में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष का प्रतिफल मानी जाती है। विशेषकर ग्रामीण, निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह जीवन बदल देने वाला अवसर होती है। किसी घर में सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र आने की खुशी कई बार करोड़ों रुपये मिलने की खुशी से भी अधिक होती है, क्योंकि उसके पीछे वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें जुड़ी होती हैं।
इसी उम्मीद में अनेक अभिभावक अपनी सीमित आय के बावजूद बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, पुस्तकों, किराये और अन्य आवश्यकताओं पर अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बच्चे की सफलता पूरे परिवार की कठिनाइयों का अंत करेगी। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वर्षों की मेहनत, विश्वास और आर्थिक त्याग को भी तोड़ देता है। कई परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरे संकट में पहुँच जाते हैं, और कुछ युवाओं के लिए यह निराशा असहनीय रूप ले लेती है।
सरकार को इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए। प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं से प्रभावित परिवारों की परिस्थितियों का आकलन कर आवश्यक आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही शिक्षा व्यवस्था का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में होना चाहिए जो केवल प्रशासनिक दक्षता ही नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और विद्यार्थियों की संवेदनाओं के साथ निर्णय लेने की क्षमता भी रखते हों। परीक्षाओं की शुचिता केवल विद्यार्थियों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न है। यदि मेहनत करने वाले युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठ गया, तो इसकी कीमत केवल एक सरकार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ेगी।
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