गेहूं के निर्यात पर लगी पाबंदी
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गेहूं की उन्नत प्रजाति की खोज
कृषि वैज्ञानिक नार्मन बोरलॉग के प्रयास से सन् 1959 में गेहूं की उन्नत प्रजाति की खोज सम्भव हुई। उस वक्त भी बोरलॉग के गुरु एल्विन स्टेकमेन गेहूँ के भू- राजनीतिक इस्तेमाल के खतरे को भाप गए थे। उन्हें आश्चर्य इस बात को लेकर हुआ कि अमरीका की इस परियोजना को मेक्सिको ने इतनी जल्दी स्वीकार कैसे किया?
बहरहाल इस परियोजना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी स्टेकमेन ने नार्मन बोरलॉग को इस उम्मीद के साथ सौंपा कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद बोरलॉग इस परियोजना को 'मिशनरी जिल' से पूरा करेगें। इस प्रोजेक्ट को कितनी मेहनत करके बोरलॉग ने पूरा किया।
इसका विस्तृत विवरण सुषमा नैथानी की हाल ही में 'नेशनल बुक ट्रस्ट' से प्रकाशित पुस्तक- "अन्न कहां से आता है " में भी उपलब्ध है। एक कृषि वैज्ञानिक के साथ-साथ मिनसेटा विश्वविद्यालय के पहलवान रहे बोरलॉग सन् 1944 में मेक्सिको पहुंचे।
'शटल ब्रीडिंग' प्रक्रिया
दो साल के अंदर मेक्सिको के दो भिन्न जलवायु वाले इलाके में 'शटल ब्रीडिंग' के जरिए जो मुकाम वे हासिल किए। उससे उनके प्रतिद्वंद्वी कृषि वैज्ञानिकों में भी ईष्या पैदा होने लगी। वे बोरलॉग को हतोत्साहित करने के उद्देश्य से 'शटल ब्रीडिंग' को समय और संसाधनों की बर्बादी करार रहे थे। बोरलॉग ने अपना प्रयोग रोकने के बजाय अपने इस्तीफे की पेशकश कर दिया। पर स्थानीय किसान बोरलॉग के इस प्रयोग की उपयोगिता और व्यवहारिकता से प्रसन्न थे। वे बोरलॉग के साथ खड़े थे।
दरअसल बोरलॉग जिस जगह अपना प्रयोग शुरू किए-वहां नवम्बर-दिसंबर में गेहूं की बुआई हो जाती थी। अप्रैल-मई तक फसल कट जाती थी। वहीं सेंट्रल मेक्सिको में गेहूं अप्रैल-मई में बोया जाता था और फसल की कटाई अक्टूबर-नवम्बर तक हो जाती थी।
बोरलॉग की 'शटल ब्रीडिंग' योजना से मैदानी और पहाड़ी इलाके में गेहूँ के अच्छी पैदावार की संभावना बढ़ती गई।इस वजह से मेक्सिको जो उन्नति प्रजाति के गेहूँ के खोज के पहले अपने जरूरत का करीब पचपन फीसद आयात करता था।
यह भी एक अजीबोगरीब घटना है कि जो अमरीका आज भारत पर गेहू के निर्यात पर लगे पाबंदी पर रोक हटाने के लिए दबाव बना रहा है, उसी अमरीका में गेहूं और गेहूं से बनें सामग्री पर रोक लगाने के लिए सन् 2911 से अभियान चलाया जा रहा है। प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर विलियम डेविस सन् 2011 में एक किताब लिखी- the wheat belly( व्हीट बेली)। इस पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि-मोटापा ,हृदयरोग, और डाइबिटिज जैसे बीमारियों की मुख्य वजह गेहूं और गेहूं से बने अन्य सामग्री हैं।
गेहूं और रोग का खतरा
इस वजह से इसे तत्काल अपने प्लेट से हटाने में ही भलाई है। डॉ विलयम इसके बदले 'स्माल मिलेट्स' कहें जाने वाले अनाज-मसलन ज्वार-बाजरा-मक्का और चना से मिक्स आटे की रोटी और दूसरे व्यंजन खाने की सलाह दे रहे है।
गेहूँ में पाये जाने वाले 'ग्लूटेन प्रोटीन' को सबसे खतरनाक माना जा रहा है। गेहूँ में इसकी मौजूदगी से पेट संबंधी रोगों के लिए भी जिम्मेदार बताया जा रहा है। इसके अलावा अफरा, गैस, उल्टी, माइग्रेन और जोड़ो में तकलीफ की बीमारी की मुख्य वजह भी ग्लूटेन प्रोटीन को बताया जा रहा है। पूरी दुनिया मे ग्लूटेन प्रोटीन पर रिसर्च चल रहा है।
अमेरिका में गेहूँ को लेकर एक तरह से दोहरा अभियान चल रहा है। एक तरफ गेहूँ की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हाहाकार मची है, वहीं दूसरी तरफ गेहूँ और गेहूँ से बनें सामग्री को जितना जल्दी हो- खाने की प्लेट से अलग करने की मुहिम छिड़ी है। गेहूँ के भोजन में प्रयोग को मधुमेह-हृदय रोग-मोटापा के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। अब दुनिया के सामने मुश्किल सवाल है कि- पेट की ज्वाला शांत करने और शरीर की अनेक बीमारियों से छुटकारा पाने के बीच कौन सा उपाय ज्यादा मुफीद रहेगा?
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