रॉकी और रानी की प्रेम कहानी
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फिल्म में नवाचार की गुंजाइश शेष
यशराज का बैनर, करण जौहर का निर्देशन यानी बॉलीवुड का वो सुविधा संपन्न तपका जो रिस्क भी ले सकता है और एक्सपेरिमेंट भी कर सकता है, तो फिर उन्होंने इतना डरकर फिल्म बनाना क्यों चुना, ये समझ के बाहर है। इतनी सुविधाओं के बीच तो वो एक बेहतरीन नया सिनेमा या सिनेमा में किसी तरह का नवाचार कोशिश कर सकते थे। पूरी फिल्म ऐसी लगी जैसे टुकड़ों में लिखी और गुनी गई हो और फिर उसे पॉलिटिकली करेक्ट बनाने के लिए चेक बॉक्स टिक करे गए हों। यकीनन करन को फिल्म कला की समझ है दर्शक हमेशा उनसे कुछ अलग और बेहतर बनाने की उम्मीद करते हैं।
मैं समाज शास्त्र का विद्यार्थी रहा हूं जो ये मानता है कि बदलाव एक झटके में नहीं धीरे-धीरे आता है। फिल्म, गीत, नाटक और साहित्य व्यक्ति से सवाल कर सकते हैं, पर उसे बदलने की अगर राह दिखाएं तो वो जो विश्वास योग्य लगे और जिसका अनुसरण किया जा सके। मैं अब तक खुद को विश्वास नहीं दिला पा रहा कि एक पढ़े-लिखे सुविधा संपन्न संभ्रांत बंगाली परिवार की बेटी-रानी (आलिया भट) एक न्यूज़ चैनल की चर्चित एंकर हैं जिनसे बड़े-बड़े नेता कांपते हैं, पर जो अपने ही न्यूज चैनल में घुसे एक खतरनाक तौर पर उच्छृंखल लड़के से हार जाती है जब वो उसे जबरन गले लगाता है, उसकी मर्ज़ी के बिना छूता है या फिर हर थोड़ी देर में लिप लॉक कर लेता है।
फिल्म में रणवीर की दादी (जया) और दादा (धर्मेंद्र) एक हर तरह से बेमेल रिश्ते को निभा रहे हैं, उधर आलिया की दादी (शबाना ) ने पति के अत्याचार तब तक सहे जब तक वो मर नहीं गए। फिल्म के आखिर में जैसे दादा (धर्मेंद्र) 'घर नहीं टूटने देना 'कहकर अंतिम सांस लेते हैं, यकीन ही नहीं होता कि ये उसी डाइरेक्टर की फिल्म है जिसने अपने करियर की शुरुआत में ही 'कल हो न हो ' जैसी फिल्म बनाई हो जो ये कहती ही थी की घुट-घुटकर जीने से बेहतर अलग रहकर खुश रहना है।
रणवीर के शायर दादा (धर्मेंद्र) और आलिया की दादी (शबाना आजमी) को बाहर एक दूसरे से कभी प्रेम हुआ और फिर दोनों की अपने-अपने परिवारों के कारण दूरी बन गई, समझ आया। दोनों एक दूसरे को नहीं भूल पाए और एक दूसरे के बिना अधूरे रहे। ये भी समझा। दोनों को बच्चों ने पहले लुक-छिपकर मिलवाया, दोनों खुश हुए, पर फिर धर्मेंद्र ये कहकर दुनिया होड़ गए कि घर नहीं टूटने देना है। अगर करन धर्मेंद्र और शबाना के बीच लिप लॉक कराने की हिम्मत जुटा सकते हैं तो धर्मेंद्र के पात्र को जिंदा रखकर दोनों को दोस्त बनाकर भी साथ ला सकने की हिम्मत जुटा सकते थे।
मैं समझ नहीं पा रहा कि इतने सालों से फिल्म हॉल जाकर हर तरह की फिल्म देखने वाला 'मैं' इस फिल्म को लेकर इतना उद्वेलित क्यों हो गया हूं? शायद इसलिए कि करण किसी भी तरह की रिस्क लेने की हिम्मत जुटाने की बजाय एक अजीब सी तीखी कम कसैली ज़्यादा वाली चाट परोस चुके हैं , जिसमें परिवार भी है, सस्ती हरकतें भी हैं , स्त्री विमर्श का ऊपरी तड़का भी है , दैहिक तृप्ति का स्त्री संवाद भी है, कहीं थोड़ा सा प्रेम भी बीच-बीच में दिखता गायब होता है।
मानो थोड़ा इम्तियाज अली, थोड़ा करण जौहर ,थोड़ा महेश मिक्सी में डालकर ऐसे घोंटे हों कि जिन्हें न निगलते बने न उगलते। यकीनन ये निर्देशक निर्माता का निर्णय है कि वो क्या दिखाना चाहते हैं और क्या नहीं, पर कम से कम ऐसा तो दिखाएं कि नई राह दिखे या कुछ नई सोच हो। नया सिनेमा किसी पिटी-पिटाई लीक से जन्म कैसे ले सकेगा? पॉलिटिकली करेक्ट होने का बोझ इस फिल्म में लगातार हर दृश्य में दिखता है।
निश्चय ही आम दर्शक पूरे हफ्ते कमाकर एक दिन फिल्म का टिकट खरीदकर जब सिनेमा देखता है तो मनोरंजन चाहता है, पर मनोरंजन और सस्ता मनोरंजन जो मेहेंगे टिकट पर हो, वो चुभता है। रॉकी और रानी की प्रेम कहानी जैसे किसी सांप सीढ़ी के खेल को देखने जैसी है जिसमें बड़े-बड़े कलाकारों के नाम सफलता की सीढ़ी लगते है।
यशराज का बैनर जीत की गारंटी लगता है तो वही परदे पर दिखाई सुनाई दिया दैहिक अग्नि शांत करता प्रेम, युगल जोड़े को मिलवाता प्रेम, दादा दादी से लिप लोक कराता प्रेम, सस्ते संवादों पर ताली पीटता दर्शक, 99 पर काटने वाले सांप सा लगता है , जो दर्शक को बहुत नीचे लाकर मारता है। हिंदी फ़िल्मी दर्शकों के लिए ये फिल्म किसी ऐसी परीक्षा से कम नहीं जिसका पेपर पहले ही लीक हो चुका है।
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