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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: आयरलैंड सिनेमा की विश्व को देन

सार

नब्बे के दशक में आयरलैंड में फिल्म बोर्ड में संशोधन हुआ और इसके साथ आयरलैंड में सिनेमा की दूसरी लहर आई। इसमें एलन पार्कर की म्यूजिकल ‘द कमिंटमेंट’ की सफलता ने चार चांद लगा दिए।
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2004 में पॉल ग्रीनग्रास की फिल्म ‘ब्लडी सनडे’ - फोटो : Twitter
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विस्तार
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उतार-चढ़ाव के बावजूद छोटा-सा देश आयरलैंड न केवल कमाल की फिल्में बनाता रहा है, वरन कमाल के सिने-अभिनेता, सिने-निर्देशक, सिनेमाटोग्राफर, कोस्ट्यूम डिजायनर तथा आर्ट डॉयरेक्टर भी विश्व को देता रहा है। यह साहित्यकारों की धरती भी रही है अत: यहां साहित्याधारित फिल्म बनना स्वाभाविक है।

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जेम्स जॉयस के काम पर ‘ए पोर्ट्रेट ऑफ द अर्टिस्ट एज ए यंग मैन’, ‘द डेड’, ‘यूलिसेस’, ‘ब्लूम’, ‘नोरा’ आदि फिल्में बनी हैं। यहां नेल जोर्डन, लेनी एब्राहमसन, जिम शेरिडन जैसे निर्देशक हुए हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में दुनिया को दी हैं। यहां शुरू से सिने-दर्शक रहे हैं, आज दुनिया के सबसे अधिक सिने-दर्शक द्वारा कमाई यह देश करता है।

आयरलैंड ने विश्व को कोलीन फैरेल, पियर्स ब्रोसनैन. माइकेल फैसबेंडर, सैम नील, लिआम नीसन जैसे कुछ बहुत अच्छे अभिनेता दिए हैं।

सिडनी ऑल्कॉट और उनकी किलेम फिल्म कम्पनी आयरलैंड की शुरुआती सिने-प्रड्यूसर की रूप में आगे आई। ‘द लैड फ्रॉम ओल्ड आयरलैंड’ (1910) उनकी पहली फिल्म थी। ‘आइरिश डेस्टिनी’ मूक दौर की एक महत्वपूर्ण फिल्म थी। यह आयरलैंड के स्वतंत्रता युद्ध के समय की एक प्रेम कथा है। इसे ‘ईस्टर राइजिंग’ की दसवीं सालगिरह पर 1926 में प्रदर्शित किया गया था।
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सवाक फिल्म काल की एक पहली फिल्म डॉक्यूड्रामा ‘मैन ऑफ अरान’ थी, जिसे रॉबर्ट फ्लैहर्टी ने 1934 में बनाया गया था। यह अरान टापू के मछुआरे ‘टाइगर’ किंग और उसके परिवार की कहानी है। आइरिश-अमेरिकन निर्देशक जॉन फोर्ड ने अपने पूर्वजों के देश आयरलैंड लौटकर प्रवासी जीवन पर ‘द क्वाएट मैन’ (1952) बनाई। इस टेक्नीकलर फिल्म में एक सेवानिवृत अमेरिकन बॉक्सर अपने जन्मस्थान आयरलैंड के गांव लौटता है।


साठ के दशक की फिल्में

फिर साठ के दशक में आयरिश सिने-परिदृश्य पर दो ऑस्कर विजेता लेखक, एडिटर, निर्देशक डेविड लीन (1908-1991) का उदय हुआ। इनकी प्रसिद्ध फिल्में हैं, ‘लॉरेंस ऑफ अरेबिया’, ‘ए पैसेज टू इंडिया’, ‘द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई’, ‘डॉक्टर जिवागो’ आदि। इनकी गाथात्मक फिल्म ‘रेयन्स डॉटर’ (1970) आयरलैंड में अवस्थित है। डेविड लीन आए थे कि पांच महीने में शूटिंग खत्म कर लेंगे पर एक तूफान के फिल्मांकन हेतु उन्हें आठ महीने रुकना पड़ा, फिल्म निर्माण का खर्च कई गुणा बढ़ गया।

ड्रामा-रोमांस की इस फिल्म में 1916 के ईस्टर राइजिंग के समय आयरलैंड के छोटे-से गांव के एक शादीशुदा को एक परेशानी में घिरे ब्रिटिश ऑफिसर से प्रेम हो जाता है। इस फिल्म को प्राप्त होने वाले नौ पुरस्कारों में दो ऑस्कर पुरस्कार (सर्वोत्तम सहायक अभिनेता जॉन मिल तथा सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफर फ्रेडी यंग) भी शामिल हैं। फिर तो आयरलैंड लोकेशन कई निर्देशकों को अपने फिल्मांकन के लिए भाने लगे।

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आयरलैंड सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock

सत्तर के दशक का सिनेमा

सत्तर के दशक में आयरलैंड में सिनेमा की पहली लहर आई और इसमें निर्देशक देश-समाज की सभ्यता-संस्कृति पर फिल्म बनाने लगे। इनमें प्रसिद्ध हैं, बॉब क्विंट (‘लैमेंट फोर आर्दर लीरी’, ‘बुदावैनी’, ‘पोइटिन’), पैट मर्फी (‘एन डेवलिन’, ‘नोरा’), जो चोमर्फोर्ड (‘ट्रैवलर’, ‘हाई बूट बेनी’, ‘रीफर एंड द मॉडेल’) ये लोग लेखक-निर्देशक थे, साथ ही जो चोमर्फोर्ड सिनेमाटोग्राफर भी था।

पैट मर्फी ने अभिनय भी किया। पैट मर्फी की ‘एन डेवलिन’ (1984) दो घंटे की ऐतिहासिक कहानी है, उसकी जो स्त्री आइरिश विद्रोह में फंस गई, एन डेवलिन की कहानी कहती है। इस स्त्री सिने-निर्देशक ने फिल्म भी स्त्री नजरिए से बनाई है। इसी ने आगे चल कर ‘नोरा’ (2000) बनाई इस पौने दो घंटे की फिल्म में होटल में जेम्स जॉयस के होटल की कर्मचारी नोरा से बातचीत से होती है।

नोरा की बेवाक बातचीत, खुले व्यवहार से जॉयस आकर्षित होता है और उसे अपने साथ आने का निमंत्रण देता है। ‘एक्सकैलिबर’ (1981) तथा ‘मोना लीसा’ (1986) इसी काल की फिल्में हैं।


आयरलैंड में सिनेमा की दूसरी लहर

नब्बे के दशक में आयरलैंड में फिल्म बोर्ड में संशोधन हुआ और इसके साथ आयरलैंड में सिनेमा की दूसरी लहर आई। इसमें एलन पार्कर की म्यूजिकल ‘द कमिंटमेंट’ की सफलता ने चार चांद लगा दिए। दो घंटे की इस फिल्म में डबलिन का जिम्मी रैबिट बेरोजगार है, वह आयरिश वर्किंग क्लास को लेकर एक बैंड बनाता है। टैक्स कानून में परिवर्तन के चलते यहां खूब फिल्में बनीं।

‘द क्राइंग गेम’ (नेल जोर्डन), ‘इन द नेम ऑफ द फादर’ (जिम शेरिडैन), ‘द स्नैपर’ (स्टीफन फ्रियर्स), ‘वार ऑफ द बटन्स’ (जॉन रॉबर्ट्स), ‘द जनरल’ (जॉन बूरमैन), ‘वाकिंग नेड डेवाइन’ (किर्क जॉन्स) कुछ अन्य फिल्में इस समय आयरलैंड से आईं। 1993 की सवा दो घंटे की फिल्म ‘इन द नेम ऑफ द फादर’ है। जिम शेरिडैन की ही दो ऑस्कर प्राप्त है, बायोपिक ‘माई लेफ्ट फुट’ है, इसमें क्रिस्टी ब्राउन सेरेब्रल पैल्सी के साथ जन्मा है मगर वह अपने बाएं पैर से चित्रकारी तथा लेखन करता है।

1994 में लेखक निर्देशक गेराल्ड स्टेमब्रिज ने अपनी पहली फिल्म ‘गुइल्ट्रिप’ बनाई जिसमें घरेलू हिंसा तथा वैवाहिक दरार का चित्रण है। यह उन दिनों के लिए एक नया विषय था।


देश के इतिहास से संबंधित फिल्में

इक्कीसवीं सदी में आयरलैंड में कुछ ऐसी फिल्में बनी हैं जिनका संबंध इस देश के इतिहास से है। 2002 में लेस ब्लैयर की फिल्म ‘एच3’ (H3) बेलफास्ट के करीब एक जेल 1981 में हुई एक हड़ताल के विषय में है। फिल्म ने तीन पुरस्कार जीते। 2004 में पॉल ग्रीनग्रास ने ‘ब्लडी सनडे’ नाम से आयरिश इतिहास के सबसे काले दिनों को उठाया है। पीटर मुलान की फिल्म ‘द मैग्डैलेन सिस्टर्स’ एक सामाजिक संस्था के स्कैंडल का खुलासा करती है। यह तीन बहनों की कहानी है, जो कॉन्वेंट की अमानवीय परिस्थितियों के बीच अपने स्व को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करती हैं।
 
जिम शेरिडैन की तीन ऑस्कर के लिए नमित फिल्म ‘इन अमेरिका’ (2002) आयरलैंड के एक प्रवासी परिवार को दिखाती है जो परिवार खुद को अमेरिका में व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।
 
एलेक्जेंडर डुमा के प्रसिद्ध काम पर 2002 में केविन रेनॉल्ड्स ने ‘द काउंट ऑफ मोंटे क्रिस्टो’ बनाई। ‘इंटरमिशन’, ‘वन्स’ ‘किसेस’, ‘व्हेन ब्रेडैन मेट ट्रुडी’ इस सदी की आयरलैंड से आने वाली कुछ अन्य फिल्में हैं। ‘वन्स’ (2007) जॉन कैरनी की कम बजट की म्यूजिकल फिल्म है, जिसने सर्वोत्तम गीत का ऑस्कर जीता।

नील जोर्डन ने 2009 में ‘ऑनडाइन’ बनाई जिसमें एक मछुआरा अपने जाल में एक औरत पाता है जिसे उसकी बेचैन बेटी बहुरूपिया जलपरी मानती है। इसी निर्देशक ने 2012 में ‘बाइजैंटिअम’ फिल्म बनाई जिसे दो पुरस्कार प्राप्त हुए। इसमें एक तटीय इलाके के निवासी अपनी जान की बाजी लगा कर दो रहस्यमई औरतों के विषय में पता करते हैं।

आज आयरिश सिनेमा ऐसे मुकाम पर है, जहां वह विश्व के किसी भी देश के सिनेमा से मुकाबला कर सकता है। दुनिया को यहां से आने वाली फिल्मों की गुणवत्ता को लेकर कोई शक नहीं रह गया है।



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यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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