आयरलैंड सिनेमा का इतिहास
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सत्तर के दशक का सिनेमा
सत्तर के दशक में आयरलैंड में सिनेमा की पहली लहर आई और इसमें निर्देशक देश-समाज की सभ्यता-संस्कृति पर फिल्म बनाने लगे। इनमें प्रसिद्ध हैं, बॉब क्विंट (‘लैमेंट फोर आर्दर लीरी’, ‘बुदावैनी’, ‘पोइटिन’), पैट मर्फी (‘एन डेवलिन’, ‘नोरा’), जो चोमर्फोर्ड (‘ट्रैवलर’, ‘हाई बूट बेनी’, ‘रीफर एंड द मॉडेल’) ये लोग लेखक-निर्देशक थे, साथ ही जो चोमर्फोर्ड सिनेमाटोग्राफर भी था।
पैट मर्फी ने अभिनय भी किया। पैट मर्फी की ‘एन डेवलिन’ (1984) दो घंटे की ऐतिहासिक कहानी है, उसकी जो स्त्री आइरिश विद्रोह में फंस गई, एन डेवलिन की कहानी कहती है। इस स्त्री सिने-निर्देशक ने फिल्म भी स्त्री नजरिए से बनाई है। इसी ने आगे चल कर ‘नोरा’ (2000) बनाई इस पौने दो घंटे की फिल्म में होटल में जेम्स जॉयस के होटल की कर्मचारी नोरा से बातचीत से होती है।
नोरा की बेवाक बातचीत, खुले व्यवहार से जॉयस आकर्षित होता है और उसे अपने साथ आने का निमंत्रण देता है। ‘एक्सकैलिबर’ (1981) तथा ‘मोना लीसा’ (1986) इसी काल की फिल्में हैं।
आयरलैंड में सिनेमा की दूसरी लहर
नब्बे के दशक में आयरलैंड में फिल्म बोर्ड में संशोधन हुआ और इसके साथ आयरलैंड में सिनेमा की दूसरी लहर आई। इसमें एलन पार्कर की म्यूजिकल ‘द कमिंटमेंट’ की सफलता ने चार चांद लगा दिए। दो घंटे की इस फिल्म में डबलिन का जिम्मी रैबिट बेरोजगार है, वह आयरिश वर्किंग क्लास को लेकर एक बैंड बनाता है। टैक्स कानून में परिवर्तन के चलते यहां खूब फिल्में बनीं।
‘द क्राइंग गेम’ (नेल जोर्डन), ‘इन द नेम ऑफ द फादर’ (जिम शेरिडैन), ‘द स्नैपर’ (स्टीफन फ्रियर्स), ‘वार ऑफ द बटन्स’ (जॉन रॉबर्ट्स), ‘द जनरल’ (जॉन बूरमैन), ‘वाकिंग नेड डेवाइन’ (किर्क जॉन्स) कुछ अन्य फिल्में इस समय आयरलैंड से आईं। 1993 की सवा दो घंटे की फिल्म ‘इन द नेम ऑफ द फादर’ है। जिम शेरिडैन की ही दो ऑस्कर प्राप्त है, बायोपिक ‘माई लेफ्ट फुट’ है, इसमें क्रिस्टी ब्राउन सेरेब्रल पैल्सी के साथ जन्मा है मगर वह अपने बाएं पैर से चित्रकारी तथा लेखन करता है।
1994 में लेखक निर्देशक गेराल्ड स्टेमब्रिज ने अपनी पहली फिल्म ‘गुइल्ट्रिप’ बनाई जिसमें घरेलू हिंसा तथा वैवाहिक दरार का चित्रण है। यह उन दिनों के लिए एक नया विषय था।
देश के इतिहास से संबंधित फिल्में
इक्कीसवीं सदी में आयरलैंड में कुछ ऐसी फिल्में बनी हैं जिनका संबंध इस देश के इतिहास से है। 2002 में लेस ब्लैयर की फिल्म ‘एच3’ (H3) बेलफास्ट के करीब एक जेल 1981 में हुई एक हड़ताल के विषय में है। फिल्म ने तीन पुरस्कार जीते। 2004 में पॉल ग्रीनग्रास ने ‘ब्लडी सनडे’ नाम से आयरिश इतिहास के सबसे काले दिनों को उठाया है। पीटर मुलान की फिल्म ‘द मैग्डैलेन सिस्टर्स’ एक सामाजिक संस्था के स्कैंडल का खुलासा करती है। यह तीन बहनों की कहानी है, जो कॉन्वेंट की अमानवीय परिस्थितियों के बीच अपने स्व को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करती हैं।
जिम शेरिडैन की तीन ऑस्कर के लिए नमित फिल्म ‘इन अमेरिका’ (2002) आयरलैंड के एक प्रवासी परिवार को दिखाती है जो परिवार खुद को अमेरिका में व्यवस्थित करने का प्रयास कर रहा है।
एलेक्जेंडर डुमा के प्रसिद्ध काम पर 2002 में केविन रेनॉल्ड्स ने ‘द काउंट ऑफ मोंटे क्रिस्टो’ बनाई। ‘इंटरमिशन’, ‘वन्स’ ‘किसेस’, ‘व्हेन ब्रेडैन मेट ट्रुडी’ इस सदी की आयरलैंड से आने वाली कुछ अन्य फिल्में हैं। ‘वन्स’ (2007) जॉन कैरनी की कम बजट की म्यूजिकल फिल्म है, जिसने सर्वोत्तम गीत का ऑस्कर जीता।
नील जोर्डन ने 2009 में ‘ऑनडाइन’ बनाई जिसमें एक मछुआरा अपने जाल में एक औरत पाता है जिसे उसकी बेचैन बेटी बहुरूपिया जलपरी मानती है। इसी निर्देशक ने 2012 में ‘बाइजैंटिअम’ फिल्म बनाई जिसे दो पुरस्कार प्राप्त हुए। इसमें एक तटीय इलाके के निवासी अपनी जान की बाजी लगा कर दो रहस्यमई औरतों के विषय में पता करते हैं।
आज आयरिश सिनेमा ऐसे मुकाम पर है, जहां वह विश्व के किसी भी देश के सिनेमा से मुकाबला कर सकता है। दुनिया को यहां से आने वाली फिल्मों की गुणवत्ता को लेकर कोई शक नहीं रह गया है।
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