कर्नाटक की जीत से कांग्रेस में नई ऊर्जा
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हिमाचल के बाद कर्नाटक से धोया हाथ
इससे पहले 2022 के अंत में हुए चुनावों में जहां भारतीय जनता पार्टी को अपने शासित एक राज्य हिमाचल प्रदेश से हाथ धोना पड़ा था। इस साल की शुरुआत में उसने अपने शासित एक राज्य कर्नाटक को भी खो दिया। जिन राज्यों में चुनाव होना है, उनमें छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, तो तेलंगाना में टीआरएस की सरकार। इन्हीं तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी चुनौती है। यहां शासित सरकारों पर अपना कब्जा करने की।
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में भी 2018 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त खानी पड़ी थी। लेकिन, कांग्रेस से बगावत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के बल पर यहां शिवराज सिंह चौहान दोबारा सत्ता पर काबिज हो गए।
कांग्रेसी यहां अपनी सरकार को पुनः हथियाने के लिए जोड़-तोड़ में जुटी है। वह भी उस समय, जब यहां शासित भारतीय जनता पार्टी सरकार में अंदरुनी कलह जोरों पर है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व कैलाश जोशी के पुत्र और सरकार में मंत्री रहे दीपक जोशी का भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर कांग्रेस में शामिल होना और कई भाजपाई नेताओं के पार्टी छोड़ने के कयासों के बीच कांग्रेस, गुटबाजी के बावजूद सरकार में आने को लालायित है।
वहीं कर्नाटक के पड़ोसी राज्य तेलंगाना में भी जहां टीआरएस की सरकार है विधानसभा चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावनाएं है। यहां टीआरएस, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच मुकाबला होगा!
भविष्य की राजनीति को प्रभावित करेंगे विधानसभा चुनाव
देखना होगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए बनने वाले मोर्चे में शामिल मुख्यमत्री के चंद्रशेखर राव अपने राज्य में भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए क्या कांग्रेस से गठबंधन करेंगे? इस सवाल का जवाब भविष्य की राजनीति को बहुत ही प्रभावित कर सकती है।
राजस्थान और छत्तीसगढ़ जहां कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां कांग्रेस अपनी सरकार बचाने के लिए जी तोड़ कोशिश करेगी। हालांकि, राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच चल रही लड़ाई जगजाहिर है। उसका हल नहीं निकाला गया तो राज्य के चुनाव परिणामों पर यह विपरीत असर डालेगी। लेकिन, राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद यहां मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति तो पैदा हुई है इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
शेष बचे चार राज्यों त्रिपुरा मेघालय, नागालैंड और मिजोरम के परिणाम 2024 के लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने का उतना असर नहीं रखते! पर, ऐसा ही हो यह जरूरी भी नहीं है। लेकिन, इतना तो तय है कि आगामी लोकसभा के पूर्व राज्यों के होने वाले चुनावों के परिणामों से मतदाताओं का मन प्रभावित जरूर होता है।
बहरहाल 2023 में 9 राज्यो में होने वाले विधानसभा के चुनावों को केंद्र की भाजपा सरकार के 9 वर्षों के कामकाज का असर मतदाताओं को प्रभावित करता है या नहीं, यह मोदी सरकार की हैट्रिक के साथ भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की नई दिशा को निर्धारित करेगा।
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