सिंध में हे रहे जबरन धर्मांतरण का विरोध
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सदियों से सिंधी समाज में उमर और मारवी की इस कहानी को बहुत गर्व और उत्साह के साथ सुनाया जाता है ।कई कलाकारों, खासकर प्रख्यात सिंधी कवि शाहअब्दुल लतीफ ने इस दास्तान के अलग-अलग पहलुओं का बहुत खूबसूरती से बखान किया है। इसी कारण मारवी को वतन परस्ती और अपनी जड़ों से हमेशा जुड़े रहने के फितूर की अनोखी मिसाल माना जाता है। अपनी मिट्टी परिवार और समाज की इज्जत को महफूज रखने के लिए बड़ी से बड़ी हस्ती के सामने निडर खड़े रहने और किसी के सामने नही झुकने का नाम है मारवी।
लेकिन जिस सिंध की विरासत के वियोग में मारवी ने अपनी जान दांव पर लगा दी थी वो सिंध अब अपनी पहचान को बचाने के एक बार फिर राजकीय ताकतों से संघर्ष कर रहा है। एक बेहद बदतर दौर से गुज़र रहा ये इलाका आज गैर मुल्की तहजीब के दुप्रभाव के सामने बेबस नजर आता है।
सिंध क्षेत्र में बढ़ता चीन का प्रभुत्व
इस सांस्कृतिक अतिक्रमण में सबसे अव्वल भूमिका पाकिस्तान का खास दोस्त चीन निभा रहा है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर इस क्षेत्र पर धीरे-धीरे चीन का प्रभुत्व कायम हो रहा है। सीपेक प्रोजेक्ट यानी चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के तहत बनाए गए कोयले के दो पावर प्लांट यहां के लोगों के लिए सिर दर्द बन चुके हैं।
एक अनुमान के अनुसार इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए लगभग 10 लाख पेड़ काटे गए हैं। इसका नतीजा ये हुआ कि इन बड़े औद्योगिक परियोजनाओं से ना सिर्फ सिंध की हवा और पानी दूषित होने का खतरा है बल्कि कई किस्म के जीव और पौधे भी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
वैसे तो चीन और पाकिस्तानी सरकार ने सिंध में तरक्की की कमी और अपर्याप्त जन सुविधाओं का हवाला दे कर इन योजनाओं को उचित सिद्ध करने की कोशिश कर रही है, मगर अधिकांश स्थानीय लोगों को ये यकीन है कि इस क्षेत्र में चीनी नागरिकों की बढ़ती संख्या और उनके तौर तरीकों से सिंध की सांस्कृतिक धरोहर धराशाई हो रही है ।
इसके अलावा पाकिस्तान में तेजी से फैलती हुई धार्मिक कट्टरता भी थार रेगिस्तान के अनोखे स्वरूप को तेज़ी से धूमिल कर रही है। पिछले कुछ महीनों में यहां लगातार कई ऐसी दुखद घटनाएं हुई जिसमें नाबालिग हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उनका धर्म बदलवाने के बाद उनका जबरन निकाह करवा दिया गया है। पूरे क्षेत्र के अल्पसंख्यकों में खौफ का माहौल छाया हुआ है और वो अपनी पुश्तैनी धरोहर से वंचित हो चुके हैं। सबसे ज्यादा अफसोस की बात ये है कि पुलिस और बाकी सरकारी तंत्र ने भी रोजाना हो रहे इस तशद्दुद को अनदेखा कर चुप्पी साधी हुई है।
सदियों पहले थार की विरासत और संस्कृति के लिए मारवी ने बहुत कष्ट झेले थे और बादशाह उमर के प्रेम प्रस्ताव के सामने झुकने से मना कर दिया था। मगर आज सिंध की पुरानी सभ्यता को इस तरह बिखरते देख कर इस रेगिस्तान में फिरती मारवी की रूह यकीनन तड़प रही होगी।
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