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हिंदी दिवस: हिंदी की बिंदी पर क्षेत्रवाद की चिन्दी

सार

हिंदी की खूबसूरती इसी में है कि उसमें कई भाषाओं और बोलियों के रंग समाए हैं। क्या यह बात अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण नही? 
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हिंदी से लगाव होना जरूरी - फोटो : istock
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विस्तार
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करीब 4-5 महीनों से दक्षिण बनाम उत्तर में भाषाई विवाद जोरों से चालू है। इस पूरे विवाद में हालांकि हिंदी की बात से इतर इस बात पर बहस हो रही है कि मेरी भाषा बेहतर, तेरी भाषा कमतर। हिंदी एक ऐसी भाषा है जो राष्ट्रीय भाषा न होते हुए भी वैश्विक भाषा का रूप ले रही है। आगे भी इसके प्रसार की पूरी संभावना है, बशर्ते हिंदी को जैसी है वैसी ही स्थिति में स्वीकारा जाए। हम इंसान हर चीज को अपनी सुविधा के हिसाब से ढालने का गुर जानते हैं। लेकिन जब वो चीज ढल जाती है तो हम ही शिकायत करने लगते हैं। हिंदी की खूबसूरती इसी में है कि उसमें कई भाषाओं और बोलियों के रंग समाए हैं। क्या यह बात अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण नही? लेकिन हम इससे संतुष्ट नही हैं। वे लोग जो हिंदी के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं उनमें से ज्यादातर की गाड़ी हिंदी की शुद्धता पर आकर अटक जाती है। वे चाहते हैं कि हिंदी को पूरी शुद्धता के साथ ही अपनाया जाए बजाय उसको व्यवहारिक संरचना के साथ अपनाने के। 

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इस बात को इस तरह समझा जा सकता है। जब हम बात करते हैं तो बात ही करते हैं, वार्तालाप नहीं करते। ट्रेन या रेल हमारे जीवन में आराम से आती-जाती हैं, लौहपथगामिनी बोलते बोलते तो गाड़ी छूटने का ही डर हो जाये। यहां वर्तालाप हिंदी का शुद्ध स्वरूप है तो बात हिंदी का व्यवहारिक स्वरूप। तो बजाय इस व्यवहारिक स्वरूप को अपनाने के, केवल एक तरह की हिंदी के प्रयोग पर अड़े रहना हिंदी के विकास की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। इसका यह मतलब कतई नहीं कि हिंदी के शुद्ध स्वरूप को भुला दिया जाए। जिसे शुद्ध स्वरूप पसन्द हो, वह इसे उसी तरह से अपना सकता है। किसी भी चीज पर जोर जबरदस्ती क्यों हो! 

विस्तृत आकाश में बिखरे हिंदी के रंग - फोटो : pexel
पिछले कुछ दिनों से हिंदी सिनेमा और दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी एक घोषित युद्ध छिड़ा हुआ है। किसकी भाषा बेस्ट, किसकी वेस्ट। और दोनों ही छोर से सेलिब्रिटीज गुगली फेंकने से बाज नहीं आ रहे। उसपर राजनीति भी इस भाषाई कौर में कंकर बनकर आने लगी है। कभी कोई नेता एक भाषा का पक्ष ले लेता है तो दूसरा दूसरी भाषा का। वैसे यहां एक बात और गौर करने वाली है।

यह पहली बार नही है जब दक्षिण भाषाई लोगों ने हिंदी को लेकर हंगामा करने का प्रयास किया हो। ऐसा पहले भी हो चुका है। एक रोचक बात यह भी है कि दक्षिण का एक हिस्सा हिंदी को सहजता से अपनाता है, हैदराबाद जैसा शहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है और दक्षिण का ही दूसरा हिस्सा हिंदी को न समझने की बात करता है, जो कि मुख्यतः तमिलनाडु (चेन्नई) के उदाहरण से समझा जा सकता है। 
 
हर भाषा और बोली महत्वपूर्ण है और मीठी भी। इनसे जुड़ी है भारत की समृद्ध संस्कृति और विरासत भी। इन सारी भाषाओं और बोलियों को मातृभाषा के रूप में पाया जाए या शौकिया तौर पर सीखा जाए ये अलग बात है लेकिन हिंदी को इन सबको जोड़ने वाली कड़ी भी तो बनाया जा सकता है। ताकि एक राष्ट्र, एक भाषा के विचार को सार्थकता दी जा सके। 
 
यहां दो किस्से खासतौर पर साझा करना चाहूंगी। पहला अनुभव है दिल्ली में सम्पन्न एक अंर्तराष्ट्रीय सेमिनार का। ये 2000 के दशक की शुरुआत थी और मैं पत्रकारिता के मैदान में नया जोश लेकर कूद पड़ी थी। इस सेमिनार के कवरेज के लिए दिल्ली जाना हुआ। अंतरराष्ट्रीय सेमिनार था लिहाजा पूरी दुनिया से प्रतिभागी लैंगिक समानता-असमानता पर अपने विचार प्रकट करने आये थे। बाकी सब ठीक था बस मन मे यह धुकधुकी जरूर थी कि अमेरिकन और अंग्रेज प्रतिभागियों से बात करते समय उनका एक्सेंट समझने के लिए क्या करूँगी। खासकर इंटरव्यू के दौरान। क्योंकि शोधपत्र पढ़ते वक्त तो सबटाइटल्स की तर्ज पर स्लाइड्स भी आ जानी थीं और पेपर की कॉपी भी मिल जानी थी। बाकी लोगों की अंग्रेजी समझने लायक थी।

सुखद आश्चर्य तब हुआ जब सेमीनार के ठीक पहले औपचारिक परिचय के दौरान ज्यादातर विदेशी, बहुत विनम्रता से टूटी फूटी हिंदी बोलते मिले। जो हिंदी नहीं बोल पा रहे थे उन्होंने भी पूरा सहयोग करते हुये बातचीत के दौरान अपने बोलने को इतना क्लियर और बैलेंस्ड रखा कि हमको दुबारा कोई भी चीज पूछने की जरूरत बहुत कम पड़ी। इसी बीच जब मैं एक टेबल पर बैठी एक श्रीलंकन, बांग्लादेशी और साउथ अफ्रीकन प्रतिभागी से बात करने लगी तो बांग्लादेशी महिला ने बहुत सहजता से हिंदी में बात की। उनकी हिंदी में अंग्रेजी, उर्दू और बांग्ला की भी मिठास थी और उन्होंने मुझे कहा, हिंदी मुझे इसलिए भी अच्छी लगती है क्योंकि मेरी बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी मिलकर उसे पूरा कर देते हैं। और आम हिंदी बोलने वाले इसे आसानी से समझ भी जाते हैं। मैं भारत के कई हिस्सों में घूमी हूँ और मेरी भाषा कभी मेरे लिए बाधा नहीं बनी। 
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हिंदी की खूबसूरती इसकी विविधता में है
दूसरा किस्सा इस अनुभव के कुछ सालों बाद का। विज्ञापन विभाग से एक दिन फोन आया कि किसी नए सीरियल के प्रमोशन में हमारे अखबार की भी सहभागिता है और उसके लिए मुझे सीरियल की नायिका से कुछ बात करनी है जो अगले दिन छपेगी। पहले इवेंट कम्पनी के ट्रेनी बच्चों ने बात की, उसके बाद सीरियल की प्रमोशनल एक्टिविटी सम्पन्न करवाने वाले बंदों ने और उसके बाद नायिका उपलब्ध हुईं। हाय- हैलो के बाद मैंने पहला प्रश्न हिंदी में पूछा और वे अंग्रेजी में शुरू हो गईं। महज 10 मिनिट की बात में मेरे सारे हिंदी प्रश्नों के जवाब उन्होंने अंग्रेजी में दिए। यहां तक भी ठीक था, लेकिन उनकी अंग्रेजी से बेहतर अंग्रेजी मुझे राजस्थान में मिले अपने पटर पटर अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन बोलने वाले उस टूर गाइड की लगी, जिसने कभी स्कूल का चेहरा भी नहीं देखा था। इन मैडम की अंग्रेजी में लइक (लाइक), तो (अंग्रेजी के सो की जगह) और ना (अंग्रेजी प्रश्नवाचक और विस्मयादिबोधक चिन्ह की जगह) की भरमार थी।

उसपर गज्जब यह कि वे भारत के हिंदी भाषी बेल्ट से थीं और अंग्रेजी माध्यम स्कूल से पढ़ी थीं। उन्होंने जो बोला वो मात्र 4 लाइनों का कंटेंट था लेकिन उसको समझकर और उसका अर्थ निकालकर लिखने में मुझे 4 पेज जितना श्रम करना पड़ा। हालांकि इस कंटेंट से किसी को मतलब भी नही था। अगले दिन अखबार में खबर के साथ छपने वाले नायक और नायिका के फोटो हर कमी को पूरा कर देते और यह बात नायिका भी भली भांति जानती थीं। न तो उन्हें, न ही किसी और को यह फर्क पड़ता था कि एक हिंदी सीरियल के प्रमोशन के लिए वे अंग्रेजी में बोल रही हैं।

गौरतलब है कि यही सीरियल या कार्यक्रम जब किसी क्षेत्रीय भाषा में होते हैं तो कलाकार बेझिझक उसी भाषा में इंटरव्यू देते हैं। अब यह विचार का विषय है कि हिंदी सिनेमा और ग्लैमर जगत में क्या जानबूझकर हिंदी को हेय जताने के प्रयास किये जाते हैं!
 
अभी कुछ समय पहले एक समारोह में बोलते हुए ख्यात अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दकी ने कहा था कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोग काम हिंदी में करते हैं लेकिन स्क्रिप्ट से लेकर बाकी सारे कम्युनिकेशन तक अंग्रेजी में होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जरा सोचिए कि एक हिंदी फिल्म में कलाकार को उसकी भूमिका, डायलॉग्स (रोमन में लिखे हुए) और भाव तक अंग्रेजी में बताए जाएंगे तो वह किरदार के प्रति न्याय कैसे कर पायेगा भला।
 
अपने बेटे की लगभग हर पीटीएम में, टीचर्स पर एक सवाल का दबाव मैं हमेशा पाती हूँ। वो यह कि -मैम/सर, हमारे बच्चे ने तो अब तक अंग्रेजी में ठीक से बोलना शुरू ही नहीं किया। इसको आप ठीक से सिखा नहीं रहे हो क्या? अब ज्यादातर समय तो टीचर्स बड़ी विनम्रता से इस सवाल को टालती हैं। लेकिन एक बार एक टीचर ने अजीज आकर उक्त पैरेंट को अंग्रेजी में कहा कि बच्चे को हम तो सिखा ही रहे हैं, आप लोग घर पर भी अंग्रेजी की प्रैक्टिस कीजिये। हम बच्चे को रटाकर या उसपर दबाव बनाकर उसे नहीं सिखाना चाहते। अगर आप घर पर पूरे समय हिंदी या दूसरी भाषा मे उससे बात करते हैं तो जाहिर है बच्चा उसमे अधिक सहज महसूस करेगा। वो अंग्रेजी भी सीख रहा है लेकिन बच्चे को नई चीजें सीखने और जानने को प्रेरित कीजिये बजाय सिर्फ किसी एक भाषा को सीखने के। 

अब यह बात उक्त पैरेंट को कितनी समझ आई ये तो नहीं पता लेकिन उन्होंने कुछ सेकेंड्स की चुप्पी के बाद बड़ी बेफिक्री और बेशर्मी से हँसते हुए यह जरूर कहा- बस मैडम, ऐसी ही अंग्रेजी बच्चे को भी आनी चाहिए, जैसी अभी आपने बोली! 
मैडम ने ठंडी सांस लेकर मुझे देखा और हम दोनों मुस्कुरा दिए। इस समस्या का कोई हल नही था। 
 
तात्पर्य यह कि हिंदी को लेकर लोगों की मानसिकता को बदलने की जरूरत है। यह रोज के व्यवहार में लाने की जरूरत है कि अंग्रेजी हो या अन्य कोई भाषा उसे सीखना अच्छी बात है लेकिन हिंदी हमारी पहचान है, उसे अपनाने में न तो झिझक होनी चाहिए, न ही शर्म।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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