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एक आस थी कि अंदर से पंचम दा दरवाज़ा खोल दें

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एक पवित्र पूजनीय स्थल की तरह, पंचम के आशिक़ों और पागलों का ये तीर्थ स्थान है। - फोटो : SELF
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पिछले 3-4 दिनों से धर्म पत्नी की वजह अस्पताल में गुज़र रहे थे। मुंबई की बारिश में पक भी गया था और बिटिया का ऑफिस भी अस्पताल के पास ही था। बीच में सोचा कि ज़रा बाहर हो आता हूं, थोड़ा मूड बदलेगा। प्रसिद्ध पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि भी थी। रास्ते में नज़र पड़ी एक पुरानी बिल्डिंग पर।  मेरीलैंड। वैसे मुंबई में मैंने कई साल गुज़ारे हैं, कई बार इस रस्ते से आना-जाना भी किया, मगर कभी पैदल नहीं गया था तो इस बिल्डिंग पर नज़र नहीं पड़ी। 

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मन में एकाध किलो लड्डू फूट गए। क्या ये वही बिल्डिंग है? फ़िल्मकार सुजॉय घोष ने अपनी फिल्म झंकार बीट्स में प्रमुख कलाकारों को इस बिल्डिंग के बाहर नमन करते हुए दिखाया था। क्या यह वही बिल्डिंग है जिसके फर्स्ट फ्लोर के फ्लैट की बालकनी में बैठा, चश्मा लगाया एक शख्स आते-जाते हुए फ़िल्मी हस्तियों को आवाज़ देकर बुलाया करता था।
 

पंचम दा और आशा भोसलेः तस्वीर ट्वीटर - फोटो : Social Media
क्या ये वही बिल्डिंग है जहां फिल्म संगीत जगत के बड़े-बड़े धुरंधर आकर गानों की तैयारी करते थे, म्यूजिक सिटिंग्स हुआ करती थी और बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्म के लिए गाने चुनने आते थे? क्या ये वही बिल्डिंग है जहां हिंदी फिल्म के सबसे बेबाक निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने घर के मालिक को खरी-खरी सुनाकर रुला दिया था और फिर जन्म हुआ था विधु विनोद की फिल्म 1942 अ लव स्टोरी के संगीत का। 

झक अजीब चीज़ है। मैं भी चल पड़ा अंदर जहां एक बूढ़ा चौकीदार बैठा था।  मैंने कहा कि सांताक्रूज़ में कोई और मेरीलैंड भी है? उसने कहा नहीं। मेरे दिल ने 2-4 दर्ज़न गुलाटियां मार दी। मैंने कहा कि ये आरडी बर्मन वाला मेरीलैंड है। चाचा मुस्कुराया और बोला- हां है तो मगर कोई आता नहीं अब।

गए महीने उनका जन्मदिन था, तब भी कोई नहीं आया। घर बंद पड़ा है। मैं कुछ और कहता उसके पहले चाचा ने कहा - जाओ-जाओ, फर्स्ट फ्लोर पर। दरवाज़ा बंद है मगर फोटो ले सकते हो। अपनी ज़िन्दगी में इससे ज़्यादा रफ़्तार से कभी नहीं भागा। फर्स्ट फ्लोर की सीढ़ियां चढ़ीं, एक साथ दो। सीधे हाथ पर दरवाज़ा था, उस पर आरडी बर्मन की नाम की पट्टी लगी थी।  

ज़िन्दगी में बहुत कम लोगों से मिलने की इच्छा हुई है। चार्ली चैपलिन, किशोर कुमार, गुलज़ार साहब और आरडी बर्मन। गुलज़ार साहब को छोड़ के सब ऊपर जा चुके हैं।  अपना क़ाबा, मक्का मदीना, बद्रीनाथ, केदारनाथ, जेरुसलम, ननकाना साहब सब कुछ यहीं था। 

फर्स्ट फ्लोर, मेरीलैंड अपार्टमेंट। कांपते हाथ, भरी हुई आंखें, भर्राया हुआ गला और दिमाग के सारे तार बज उठे थे- पंचम सुर में। ये पंचम का घर है। दरवाज़ा बंद है तो क्या। अंदर नहीं जा सकता तो क्या।पंचम नहीं है तो क्या!  रिहर्सल नहीं हो रही तो क्या! म्यूजिक सिटिंग नहीं है तो क्या! पंचम और मोहम्मद रफ़ी मिलकर मुग़लई मटन नहीं पका रहे तो क्या! अब सिगरेट शराब और बढ़िया मसालेदार नॉनवेज की महफ़िल नहीं चल रही तो क्या। है तो पंचम का घर! 

एक पवित्र पूजनीय स्थल की तरह, पंचम के आशिक़ों और पागलों का ये तीर्थ स्थान है। 1972 में पहली पत्नी रीता से अलग रहकर पंचम ने बांद्रा के सीज़र पैलेस होटल में "परिचय" फिल्म का संगीत बनाया था। बीती न बितायी रैना और मुसाफिर हूं यारों जैसे गाने होटल में बने थे। इसके कुछ समय बाद पंचम का अपना ठिकाना बना मेरीलैंड अपार्टमेंट। यहीं पर हमने देखा और सुना पंचम का पागलपन।

मारूतिराव, केर्सी लॉर्ड, टोनी वॉज़,फ्रेंको, भानु गुप्ता, सपन चक्रवर्ती, जगमोहन, बबलू चक्रवर्ती, बासुदेव, रमेश अय्यर, सुनील कौशिक, शिव कुमार शर्मा, होमी मुल्ला, लुइस बैंक्स, रणजीत गजमेर जैसे कई संगियों और संगीत के दिग्गजों ने यहां पंचम के सुरों को गीत की शक्ल दी।

मनोहारी दा जो एसडी बर्मन के साथी थे, बाद में पंचम के साथी बनकर अंत तक रहे। आशा जी ने पंचम की मृत्यु वाले दिन पंचम के कमरे में जाने से मना कर दिया क्योंकि सुर साम्राज्ञी ने पंचम को एक ज़िंदा दिल यारबाज आदमी की तरह देखा था, वो कल्पना में भी पंचम का न होना बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।पंचम का प्यारा नौकर सुदाम, चाय पिलाता रहता था और पंचम की ज़िन्दगी में एक गार्डियन की भूमिका निभाता था। ये वही घर था।  बाहर निकलकर मैंने चाचा को "थैंक यू" कहना चाहा मगर, इतना छोटा शब्द भी क्या निकले। बस रोता रोता उनके हाथ पकड़ लिया, सिर झुकाए खड़ा रहा फिर भाग लिया।

मैं विचारधारा से नास्तिक हूं, मगर आज देव दर्शन तो नहीं हुए मगर देवस्थल पर मैं 2 मिनट खड़ा रहा और महसूस करता रहा। पंचम के आखिरी दिन बहुत ही अकेले थे। कोई होता नहीं था। फिल्म मेकर्स ने आना-जाना छोड़ दिया।

पंचम की फिल्म्स पिट रही थी। मगर अपने क़द से बड़ा ये शख्स आज भी उतना ही मौजूं है जितना आज से 25 साल बाद होगा। पंचम के सेक्रेटरी भरत ने जब पंचम के जाने के बाद उनका बैंक लॉकर खुलवाया, उसमें से एक ही नोट निकला 5 रुपए का।  पंचम।  
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पंचम दा का घर मेरे लिए देवस्थली से कम नहीं। - फोटो : Social Media
पंचम यात्रा में डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता ब्रम्हानंद सिंह की आरडी पर बनी डाक्यूमेंट्री से बहुत कुछ जानने को मिला। हिंदी फिल्मों के इनसाइक्लोपीडिया भाई पवन झा के स्नेह से पंचम के नए-नए आयाम सुनने को मिलते रहे।

बरसों पहले पूना से आए पंचम मैजिक के अंकुश चिंचणकर के साथ बिताए चंद घंटे, पुराने बॉस आलोक पुरोहित का वो पंचम के गाने सुना सुनाकर पागल कर देना, रेडियो के गुरु तापस सेन द्वारा मुझे पंचम बजाने की खुली छूट देना। निर्देशक विवेक वासवानी के साथ पंचम के गानों का सिलेक्शन शेयर करना। किस्मत से दादा हेमंत केंकरे से परिचय होना और उनसे पंचम का पर्सनल साइड जानना।

पंचम के पागल रिया मुखर्जी, प्रणय नायगांवकर, राहुल नहिरे,और भी कई मित्रों का पंचम पागलपन को बढ़ावा देना। अक्का सुधा सदानंद के लाड के नतीजे के तौर पर पंचम के सबसे बड़े पागल अनिरुद्ध और बालाजी (जिन्होंने पंचम पर अब तक की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक लिखी है) से परिचय करवाना, और इन सबसे ऊपर, पिताजी श्री दिलीप गुप्ते का पंचम और पंचम के बाप से सुरीला परिचय करवाना। 31 जुलाई 2019 को आप सबके एहसान का एक हिस्सा चुका आया हूं, मैं पंचम के दरवाज़े तक हो के आया हूं।  

बंद दरवाज़े के पीछे, एक आस थी...कि अंदर से सुदाम दरवाज़ा खोल दे, और सफ़ेद कुरता और लुंगी पहने हुए, हाथ में सुलगी हुई सिगरेट का कश खींचते हुए पंचम बोल दे - अरे विप्लव, बाहर क्या खड़ा है... आजा आजा... मैंने मटन बनाया है। तू बैठ। फिर अपन गाना सुनते हैं। रफ़ी की पुण्यतिथि वाले दिन गाना बज रहा था - भूलेगा दिल, जिस दिन तुम्हें. वो दिन ज़िन्दगी का आखरी दिन होगा। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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