जम्मू-कश्मीर से अलग हुआ लद्दाख
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शायद आत्मनिर्णय के बारे में नजरिया कुछ साफ़ हो जाए। आत्मनिर्णय और मानवअधिकार की वक़ालत कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बलूचिस्तान को क्यों भूल रहे हैं? वहां 1947 के बाद से ही आत्मनिर्णय के आधार पर बलोच अपने देश की वापसी मांग रहे हैं।
बलूचिस्तान तो पाकिस्तान का हिस्सा 1947 में भी नहीं था। पाकिस्तान ने बलोच नवाब को धमकाकर उस स्वतंत्र देश पर क़ब्ज़ा किया था। यह सब तो इतिहास के पन्नों की प्रामाणिक जानकारी है। आत्मनिर्णय की मांग कर रहे बलूचियों पर पाकिस्तानी सेना ने टैंको से हमले कराए हैं, हवाई हमले किए हैं और मुठभेड़ों में आत्मनिर्णय की मांग कर रहे वहां के निवासियों को मौत के घात उतारा है। अच्छा हो कश्मीर पर बात करने से पहले इमरान अपने इन तीन राज्यों का अतीत भी जान लें।
इस्लाम के अनुयायी इमरान ख़ान के पास इस बात का कोई उत्तर है कि उनके देश के ही शिया मुसलमानों, सूफ़ियों मुहाजिरों और अहमदियाओं को कितनी आज़ादी है। उनके अधिकारों की बात तो दूर, उन्हें बुनियादी हक़ भी नहीं हैं? कितने शिया मुसलमान जबरन ग़ायब कर दिए गए। कोई नहीं जानता कि वे कहां हैं सिवाय पाकिस्तानी फौज के। अहमदियाओं के सारे नागरिक अधिकार छीनकर पाकिस्तान कौन से मानव अधिकारों और आत्मनिर्णय की बात कर सकता है? हिन्दुओं, सिखों, ईसाईयों और बौद्धों पर अत्याचारों की कौन बात करे?
राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की रविवार को बैठक के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत को मानवीय क़ानूनों और 1983 की पारंपरिक हथियारों पर कन्वेंशन की याद दिला रहे हैं। वे शायद भूल गए कि हिन्दुस्तान भी पाकिस्तान को ऐसे अनेक समझौतों की याद दिला सकता है।
वे शिमला संधि क्यों याद नहीं करना चाहते? उस संधि पर कोई बन्दूक की नोक पर भुट्टो से हस्ताक्षर नहीं कराए गए थे। उसमें सारे विवाद द्विपक्षीय बातचीत से निपटारे की बात कही गई थी। उसे भूलकर कारगिल जंग के बाद नवाज़ शरीफ़ अमेरिका भागे गए थे और इमरान ख़ान भी अमेरिका जाकर ट्रंप से मध्यस्थता की भीख़ मांगने गए। अपने समझौते ही पाकिस्तान के हुक्मरान याद नहीं रखना चाहते तो इसमें भारत का क्या दोष है?
भारत के धैर्य और संयम की सीमा का नाजायज़ लाभ उठाने की आदत पाकिस्तान को छोड़ देनी चाहिए। हिन्दुस्तान यदि ख़ामोश है तो उसका बड़ा कारण हज़ार साल की साझा विरासत है। हिन्दुस्तान के लाखों परिवारों की रिश्तेदारियां पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान भले ही आदम गुफाओं में रहते हुए बर्बरता दिखाए ,भारत अपनी संस्कृति से विचलित नहीं होगा। लेकिन याद रखना होगा कि यदि भारत एक बार पाकिस्तान की बर्बर राह पर चल पड़ा तो उसका अस्तित्व बचाना कठिन हो जाएगा। वक़्त की मांग है कि पाकिस्तान एक बार अपने लिए सहज - स्वाभाविक देश बने। एंटी इंडियन देश के रूप में उसका कोई वजूद नहीं है।
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