उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक पहल प्रशंसनीय है।
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वहीं राम उपाधि से विभूषित थाई राज परिवार की प्रतिनिधि राजकुमारी महाचक्री सिरिंनधोर्न भारत की आध्यात्मिक यात्राओं पर आती रहती हैं। थाईलैंड मे वो भारत की सांस्कृतिक प्रतिनिधि के समान है। जबकि एशिया महाद्वीप का इकलौते ईसाई पहचान वाला देश फिलीपींस भी अपने इस अतीत को लेकर आग्रही है। तभी तो यहां हुए आसियान शिखर सम्मेलन की शुरुआत स्थानीय रामलीला के मंचन से हुई। इस कार्यक्रम मे प्रधानमंत्री मोदी से लेकर अमेरिका राष्ट्रपति तक मौजूद थे। किंतु सभी जगह एक सी परिस्थितियां नही है। प्रमाणों के बावजूद भी पाश्चात्य विद्वान राम के सांस्कृतिक प्रभाव को अब तक स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, उन्हें गलत सिद्ध होने का भय है। वास्तव में दुनिया भर के देशों के भारतीय जुड़ाव वाले अतीत से इन्हें आपत्ति है।
मुख्यमंत्री योगी की ये पहल प्रशंसनीय
ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक पहल प्रशंसनीय है। उनकी सरकार पश्चिम एशिया से लेकर सुदूर दक्षिण अमेरिका तक प्राप्त हुए साक्ष्यों के प्रमाणीकरण की दिशा में काम कर रही है। इसको लेकर उत्तर प्रदेश कला संस्कृति विभाग एवं अयोध्या शोध संस्थान सक्रिय है। ऐसे प्रयास इन देशों संग भारत के रिश्तों में नया अध्याय जोड़ सकते है।
तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक थाती विरासत के प्रति प्रेम ने इस राममय संस्कृति के लिए कही अधिक अनुकूलतायें पैदा की है। ऐसा ही एक प्रयास इस वर्ष रामनवमी पर स्वामी रामदेव कर रहे हैं इस दिन राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के जागरण एवं प्रचार संकल्पनाओं के साथ सौ युवा संन्यास ग्रहण करेंगे। इस पावन दिवस के लिए ये एक नया सार्थक चलन है। ऐसे मे संस्कृति प्रेमी नेतृत्व का होना किसी अतिरिक्त मुनाफे सा है। किंतु अब भी कुछके और प्रयासों की जरूरत है।
ऐसा ही एक प्रयास अयोध्या से जनकपुर और अयोध्या से श्रीलंका तक हुई प्रभु श्रीराम की दोनों महत्वपूर्ण यात्रा के पड़ाव स्थलों के प्रचार एवं विकास को लेकर भी होना चाहिये। वास्तविक तौर पर राम के आदर्श, मूल्य एवं चरित्र निर्माण की कहानी इन दो यात्राओं से संबद्ध है। इनमे से अधिकांश स्थल अब भी संवारे जाने की प्रतीक्षा में है। इसकी शुरुआत राम की प्रिया देवी सीता के पावन जन्मभूमि सीतामढ़ी बिहार से हो सकती है। आखिर आद्य कवि बाल्मीकि के शब्दों में रामायण राम की मर्यादा और सीता के महान चरित्र के महत्व का ही तो ग्रंथ है।
अगर ऐसे प्रयास प्रयोग होते रहे तो निश्चित ही आगामी वर्षों में राम जन्मोत्सव भी अपनी कथा और लीलाओं की तरह विश्वव्यापी होगा। वैसे भी सहयोग सहचर्य सह अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय वाली ये संस्कृति अपने ज्ञान गुण स्वभाव नाते पुनः विश्व संचार की ओर अग्रसर है। भारतीय संस्कृति परंपरा अध्येता
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