उस व्यक्ति ने कहा कि इस व्यक्ति को मारकेश (मृत्युयोग) है, इसके बचने की कोई संभावना नहीं है।
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राजीव गांधी के चुनाव का सारा इंतजाम सतीश शर्मा देखते थे। सतीश शर्मा के एक नजदीकी ‘बाबा’ के नाम से मशहूर थे जो प्रतापगढ़ के थे, लेकिन अब इलाहाबाद में बस गए थे। उनका असली नाम शिव प्रसाद मिश्र था। वे उस समय राज्यसभा के सदस्य थे। वे मेरे पापा के भी मित्र थे।
एक दिन पापा और सतीश शर्मा, शिव प्रसाद मिश्र के आवास पर गए और वहां इस बात की चर्चा हुई कि राजीवजी की नामांकन तिथि को लेकर किसी अच्छे ज्योतिषी से परामर्श ली जाए। शिव प्रसाद मिश्र ने मेरे पापा के बारे में कहा कि इनका कई ज्योतिषियों से संपर्क है-वे किसी का नाम सुझाएं।
पापा के संपर्क में गया के एक ज्योतिषी थे जिन पर पापा को भरोसा था। उनका नाम कोई पाठक था (पापा नाम भूल गए हैं)। पाठकजी उन दिनों दिल्ली में किसी हिंदी फीचर एजेंसी में लेख लिखते थे और साथ-साथ ज्योतिष का भी काम करते थे। पापा ने सतीश शर्मा से राजीवजी की कुंडली ली और पाठकजी के पास गए। वैसे राजीव प्रधानमंत्री रह चुके थे, उनकी कुंडली कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित थी।
पाठकजी ने कुंडली देखते ही कहा कि इस व्यक्ति को मारकेश (मृत्युयोग) है, इसके बचने की कोई संभावना नहीं है। पापा ने कहा कि पाठकजी, गंभीरता से देखिए यह राजीवजी की कुंडली है। पाठकजी अपने प्रेडिक्शन पर अड़े रहे। उन्होंने जोर देकर कहा कि बचना मुश्किल है। पाठकजी ने इसके उपाय के तौर पर कहा कि अगर पीतांबरा पीठ में जाकर तीन लाख या उससे ऊपर कोई विशेष जप करवाए जाएं तो कुछ राहत मिल सकती है।
पापा ने ये सारी बातें सतीश शर्मा और शिव प्रसाद मिश्र को बता दी। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ?
राजीव गांधी इस देश के सबसे युवा और कम उम्र के प्रधानमंत्री रहे।
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उत्तर भारत का चुनाव पहले निपट चुका था। दक्षिण का बाकी था। मेरे पापा जैसे संगठन में काम करने वाले लोग आराम करने कुछ दिन अपने घर आ गए थे, लेकिन महीना भर नहीं बीता की राजीव की हत्या की खबर आ गई।
लालू यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस विरोधी मुहिम की लगाम यादवों के हाथ में थी। पिछड़ा उभार, सवर्ण-पिछड़ा टकराव, जातीय रैलियां बिहार में शुरू हो चुकी थीं। लेकिन मुझे याद है राजीव की जब हत्या हुई तो मेरे गांव के अहीर भी उतने ही दुखी थे जितने सवर्ण थे। एक बहुत ही बुजुर्ग आदमी था जो मेरे यहां दूध देने आता था। उसका कहना था- ‘हमने वोट भले ही च्रक छाप (जनता दल का चुनाव चिह्न) को दिया, लेकिन इंदिरा का बेटा देखने में बहुत शरीफ़ था। उसे ऐसे नहीं जाना चाहिए था’।
आज राजीव गांधी की पुण्यतिथि है, तो प्रसंगवश ये बातें याद आ गईं। पापा ने कहा है कि उन्हें गया वाले पाठकजी का पूरा नाम याद आएगा तो बता देंगे।
(एक बात और, उसी गया वाले पाठकजी की बेटी से हिंदी के एक प्रसिद्ध टीवी पत्रकार की शादी हुई जो काफी क्रांतिकारी किस्म के हैं। यहां उनका नाम लिखना विषयांतर है। )
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