राजेंद्र माथुर- भारत एक अंतहीन यात्रा
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वैश्विक परिस्थितियों पर रहती थी गहरी नजर
राजेंद्र सर दूरदृष्टा थे, एक भविष्यदृष्टा। वे अपने समय, समाज और राजनीति के साथ वैश्विक परिस्थितियों पर इतनी गहरी नजर रखते थे कि उन्हें पढ़ते हुए लग ही नहीं रहा कि इन बातों और विचारों को चार से पांच दशक पहले कहा गया है। उनकी कलम सर्वकालिक, प्रासंगिक और संदर्भ के अनुसार इतनी ज्यादा मारक, ज्वलंत, भेदी और किसी भविष्यवाणी की घोषणा की तरह दिखाई पड़ती है।
उनके लिखे लेख आज भी विस्मय में डाल देते हैं- चाहे वह “गहरी नींद के सपनों में बनता हुआ देश हो”, “गाय तब और अब हो”, “गांधी: जादू के बाद हो” “महज चुनावी नारा हो”, “2057 के राष्ट्र-राज्य में बदलता 1857 का समाज हो” या फिर “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से पुराना एक भारतीय स्वप्न” हो इन लेखों से झांक रही उनकी कलम मानों प्रकाश की ऐसी दृष्टि थी जो आज भी पीढ़ियों के दिलों में उजाला भरती है। इस रोशनी के जरिए आज ही नहीं बल्कि आने वाले भविष्य का दूर-दूर तक फैला अंधकार छंट सकता है।
वरिष्ठ कवि, पत्रकार, लेखक और अनुवादक विष्णु खरे ने हिंदी के इस श्रेष्ठ और विरले पत्रकार संपादक राजेंद्र माथुर के निधन पर “जाना एक प्रकाश स्तंभ का” शीर्षक से एक लेख लिखा था जो चर्चित भी हुआ था और उस दौर में राजेंद्र माथुर सर को दी गई अनूठी और पूर्ण श्रद्धांजलि थी। हालांकि यह लेख मैंने पढ़ी नहीं, किंतु इसका शीर्षक जहन में अटका रह गया क्योंकि जिस शख्सियत को विष्णु सर प्रकाश स्तंभ कह रहे थे उसका प्रकाश वाकई पीढ़ियों और भारतीय पत्रकारिता के संसार को हमेशा एक दिशासूचक, विचारस्तंभ और मशाल के रूप में रौशनी देता रहेगा।
वास्तव में मेरी पीढ़ी के लिए श्री राजेंद्र माथुर एक प्रकाश स्तंभ ही हैं- किताबों से झांक रही उनकी कलम हमारे लिए आश्चर्य ही है।
पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन।
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