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पुरखों की स्मृतियां: श्री राजेंद्र माथुर- पीढ़ियों को दिशा बताता एक प्रकाश स्तंभ

सार

राजेंद्र सर मेरी भी याद का हिस्सा हैं किंतु मूर्त स्मृति का नहीं अपितु किताबों और विचार के उस संसार का, जो बीते कुछ दिनों से मेरे अवचेतन का हिस्सा रहा है।
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राजेंद्र माथुर- स्मृतियां - फोटो : Twitter
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विस्तार
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आज हिंदी के श्रेष्ठ और विरले संपादक, पत्रकार-लेखक श्री राजेंद्र माथुर की पुण्यतिथि है। एक ऐसे समय में जबकि स्मृतियों की उम्र छोटी हो रही है और वे तकरीबन बुलबुले की मानिंद व्यवहार कर रहीं हैं, वहां राजेंद्र माथुर की यादों का सुंदर और हरा-भरा हिस्सा यहां-वहां नजर आ रहा है, सो अच्छा और सुखद महसूस हो रहा है। 

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उन्हें याद करने वालों में वे भी शामिल हैं जिन्होंने उनके साथ काम किया है और वे भी हैं जो उनके समकालीन रहे और उनसे मिलकर एक अलग ऊर्जा पाते रहे।  

इधर, राजेंद्र सर मेरी भी याद का हिस्सा हैं किंतु मूर्त स्मृति का नहीं अपितु किताबों और विचार के उस संसार का जो बीते कुछ दिनों से मेरे अवचेतन का हिस्सा रहा है। 
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दरअसल, 9 अप्रैल को राजेंद्र सर की पुण्यतिथि है, यह बात तारीख के लिहाज से दिनों से जहन में थी और इसी बहाने थी कि संभव हुआ तो एक लंबा स्मृति लेख मैं राजेंद्र सर पर लिख सकूं क्योंकि लिखने का यह प्रकाश उन बातों और विचारों से उत्साह बनकर आ रहा था जिन्हें कभी इस अनूठे पत्रकार ने अपनी कलम से प्रवाहित किया था। किंतु जीवन की आपा-धापी, समय अभाव और दूसरे कारण से लिखना टलता रहा और संभव है कि यह तब तक टलता रहे जब तक कि मैं उनका लिखा पूरा ना पढ़ जाऊं।  

बहरहाल, सच कहूं तो राजेंद्र सर को पढ़े बिना उनकी दृष्टि, चिंतन की एकदम अलग धारा को समझना आसान भी नहीं। उनके लिखे हुए से गुजरते हुए जान पड़ रहा है कि ज्ञान की एक अंतहीन सरिता उनके साथ बह रही थी, उनकी बहुआयामी दृष्टि, वैश्विक फलक और समाज व संस्कृति को देखने, समझने की क्षमता इतनी अनूठी, दुर्लभ और हैरान करने वाली है कि हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए वह प्रकाश स्तंभ ही हैं।  

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राजेंद्र माथुर- भारत एक अंतहीन यात्रा - फोटो : Twitter

वैश्विक परिस्थितियों पर रहती थी गहरी नजर

राजेंद्र सर दूरदृष्टा थे, एक भविष्यदृष्टा। वे अपने समय, समाज और राजनीति के साथ वैश्विक परिस्थितियों पर इतनी गहरी नजर रखते थे कि उन्हें पढ़ते हुए लग ही नहीं रहा कि इन बातों और विचारों को चार से पांच दशक पहले कहा गया है। उनकी कलम सर्वकालिक, प्रासंगिक और संदर्भ के अनुसार इतनी ज्यादा मारक, ज्वलंत, भेदी और किसी भविष्यवाणी की घोषणा की तरह दिखाई पड़ती है।
 
उनके लिखे लेख आज भी विस्मय में डाल देते हैं- चाहे वह “गहरी नींद के सपनों में बनता हुआ देश हो”,  “गाय तब और अब हो”, “गांधी: जादू के बाद हो”  “महज चुनावी नारा हो”, “2057 के राष्ट्र-राज्य में बदलता 1857 का समाज हो”  या फिर “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से पुराना एक भारतीय स्वप्न” हो  इन लेखों से झांक रही उनकी कलम मानों प्रकाश की ऐसी दृष्टि थी जो आज भी पीढ़ियों के दिलों में उजाला भरती है। इस रोशनी के जरिए आज ही नहीं बल्कि आने वाले भविष्य का दूर-दूर तक फैला अंधकार छंट सकता है।  

वरिष्ठ कवि, पत्रकार, लेखक और अनुवादक विष्णु खरे ने हिंदी के इस श्रेष्ठ और विरले पत्रकार संपादक राजेंद्र माथुर के निधन पर “जाना एक प्रकाश स्तंभ का” शीर्षक से एक लेख लिखा था जो चर्चित भी हुआ था और उस दौर में राजेंद्र माथुर सर को दी गई अनूठी और पूर्ण श्रद्धांजलि थी। हालांकि यह लेख मैंने पढ़ी नहीं, किंतु इसका शीर्षक जहन में अटका रह गया क्योंकि जिस शख्सियत को विष्णु सर प्रकाश स्तंभ कह रहे थे उसका प्रकाश वाकई पीढ़ियों और भारतीय पत्रकारिता के संसार को हमेशा एक दिशासूचक, विचारस्तंभ और मशाल के रूप में रौशनी देता रहेगा।  

वास्तव में मेरी पीढ़ी के लिए श्री राजेंद्र माथुर एक प्रकाश स्तंभ ही हैं- किताबों से झांक रही उनकी कलम हमारे लिए आश्चर्य ही है।  

पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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