राहुल गांधी कांग्रेस में परिवर्तन की लड़ाई हार चुके हैं।
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कुल मिलाकर सोनिया गांधी को एक बार फिर से उन्हीं नेताओं पर विश्वास जताना पड़ा है जो अब पुराने पड़ गए हैं, जिनके कारण कांग्रेस की यह दुर्गति है, जर्जर हैं और कई प्रकार की विसंगतियों के शिकार हैं।
राहुल गांधी कांग्रेस में परिवर्तन की लड़ाई हार चुके हैं। उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से न केवल इस्तीफा दिया है अपितु अब वे कांग्रेस के प्रति उदासीन रवैया भी अपनाते दिख रहे हैं। कांग्रेस में ऐसा पहली बार हुआ है। इससे पहले ऐसे मौके तीन बार आए लेकिन तीनों बार कांग्रेस का नया नेतृत्व जीता और पुराना हार गया।
याद कीजिए जब पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का संकट पैदा हुआ था तो के. कामराज ने पहले लचीले मिजाज के कांग्रेसी लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे किया और बाद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की कमान नवीन विचारों वाले युवाओं के हाथ में सौंप दिया था।
कामराज ने मोरारजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया क्योंकि वे दक्षिणपंथी सोच एवं हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक थे। मोरारजी के बारे में यह भी प्रचलित था कि वे कठोर पूंजीवादी व्यवस्था के हिमायती हैं। यह पहला मौका था जब कांग्रेस के अंदर नवीन और प्रगतिशील विचारधारा की जीत हुई थी। हालांकि, पंडित जवाहरलाल नेहरू और गांधी के बीच भी इसी प्रकार का अंतरविरोध था और उस समय भी नेहरू के चिंतन की जीत हुई थी न कि गांधी के विचारों की जीत हुई।
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी को ऐसे युवाओं की जरूरत पड़ी जो आने वाले समय में उसकी खुद की विचारधारा को देश में स्थापित करे।
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दूसरा मौका इंदिया गांधी के कालखंड में ही आया। उन दिनों इंदिरा गांधी कई मोर्चों पर लड़ रही थी। इंदिरा गांधी कठोर और समावेसी राष्ट्रवाद के एक नए विचारधारा पर काम कर रही थी। याद रहे जो लोग इंदिरा गांधी को साम्यवादी रुझान के नेता मानते हैं वे गलत हैं क्योंकि केरल की चुनी हुई बहुमत की साम्यवादी सरकार को अपदस्थ करने में इंदिरा गांधी की ही सबसे बड़ी भूमिका थी।
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी को ऐसे युवाओं की जरूरत पड़ी जो आने वाले समय में उसकी खुद की विचारधारा को देश में स्थापित करे। इसके लिए इंदिरा गांधी ने नया प्रयोग किया और युवातुर्क का चिंतन लेकर आई। अपनी टीम में समाजवादी चिंतक आचार्य नरेन्द्र देव के चिंतन से प्रभावित युवा नेता चन्द्रशेखर को जोड़ा, मोहन धारिया आए और कृष्णकांत व रामधन कांग्रेस के साथ जुड़े। आरके धवन इंदिरा गांधी के निकटस्थों में एक हो गए। इस प्रयोग के बाद एक बार फिर पुराने कांग्रेस के पुराने नेता हासिए पर ढकेल दिए गए और पूरे देश में कांग्रेस का डंका बजने लगा।
तीसरा मौका राजीव गांधी के समय में आया। उस समय भी पुराने नेतृत्व को पीछे ढकेला गया और राजीव गांधी अपनी टीम में राजेश पायलट, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरेन्द्र सिंह, माधव राव सिंधिया जैसे नए एवं उर्जावान युवाओं को जोड़ा। इस टीम ने कांग्रेस और देश दोनों को लाभ पहुंचाया। इसी टीम के कारण राजीव गांधी सफलता के साथ शासन चलाने में कामयाब रहे।
हरियाणा में फिर से चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हावी हो गए।
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इसके बाद पीबी नरसिंहा राव का दौर आया। राव ने गांधी परिवार को हासिए पर रखने की कोशिश की। कांग्रेस में गठबंधन का नया प्रयोग किया और पूरे पांच साल तक सरकार चलाते रहे। राव के दौर के बाद कांग्रेस में कमजोरी प्रारंभ हो गई लेकिन तुरंत सोनिया गांधी ने मोर्चा संभाल लिया और एक बार फिर से कांग्रेस को मजबूत कर दिया।
कांग्रेस 10 साल तक अजेय रही लेकिन इस 10 साल के दौरान कांग्रेस सांगठनिक पतन जारी रहा। नया और युवा नेतृत्व नहीं पनप पाया। जो पनपा वह प्रशिक्षित नहीं था साथ ही साथ वह कमजोर भी था। सत्ता जाने के बाद कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों ने राहुल के नेतृत्व में नया प्रयोग किया जो कांग्रेस करती रही है लेकिन राहुल इस प्रयोग में खड़े नहीं उतरे। राहुल बाएं चलते रहे और देश नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर से दक्षिणपंथ का रास्ता चुन लिया।
राहुल गांधी प्रयोग के तौर पर बिहार, झारखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली आदि में नए और युवा नेतृत्व को मौका दिया लेकिन पुराने नेताओं ने राहुल की योजना पर पानी फेर दी। राहुल गांधी गुजरात में भारत सिंह सोलंकी को लेकर आए लेकिन अहमद पटेल गुट ने राहुल की एक न चलने दी।
हरियाणा में फिर से चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हावी हो गए। पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र के सामने नवजोत की एक न चली। उत्तराखंड में प्रितम सिंह पवार को हरीश रावत गुट ने धूल चटा दिया है। मध्य प्रदेश में लोकसभा में हारने के बाद भी दिग्विजय अपरिहार्य बने हुए हैं। राजस्थान में गहलोत की तुति बोल रही है। झारखंड का प्रयोग तो मानो धरासायी ही हो गया।
अब कांग्रेस का क्या होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन यह पहला मौका है जब कांग्रेस में पुराने नेता जीते हैं और नया नेतृत्व हासिए पर चला गया है। इस बात से यह साबित होता है कि फिलहाल कांग्रेस में कोई परिवर्तन की आशा नहीं है। राहुल के टीम के युवा साथी हार्डकोर साम्यवादी संदीप सिंह गुमनाम हो गए हैं और जिसने चौकीदार चोर है का नारा दिया वह प्रवीण मिश्रा अपने व्यक्तिगत रोजगार में लौट चुके हैं। अब कांग्रेस को एक नए कामराज की तलाश है।
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