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ऊंची पहाड़ी पर सजती थी पृथ्वीराज की कचहरी: उपेक्षा और खनन की मार झेलती ऐतिहासिक धरोहर

सार

तोशाम स्थित ऊंची पहाड़ियां लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेती हैं। ये पहाड़ियां सम्राट पृथ्वीराज चौहान की गौरवगाथा की साक्षी हैं।
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ऐतिहासिक स्थल खनन से जर्जर हालत में पहुंचा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भिवानी में तोशाम स्थित ऊंची पहाड़ियां बरबस लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेती हैं। करीब दो किलोमीटर क्षेत्र में फैली पहाड़ियां सम्राट पृथ्वीराज चौहान की गौरवगाथा की साक्षी हैं। माना जाता है कि 12वीं शताब्दी में इन्हीं पहाड़ियों पर उनका सामरिक अड्डा था। पहाड़ी पर उनके द्वारा निर्मित बारह दरवाजों वाली 850 फीट ऊंची बारहदरी में उनकी कचहरी सजती थी, जिसमें जनता के दुख-दर्द सुने जाते थे। प्राचीन पत्थरों और चूने से निर्मित यह इमारत वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है।
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इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण वर्ष 1166 से 1180 ईस्वी के बीच हुआ, जब दिल्ली पर चौहान वंश का शासन था। 

सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए पृथ्वीराज चौहान ने तोशाम को सैन्य गतिविधियों का केंद्र बनाया था। बारहदरी में बैठकर उनके सिपहसालार दुश्मनों की गतिविधियों पर नजर रखते थे। चारों दिशाओं में बने तीन-तीन दरवाजे इसकी विशिष्ट पहचान हैं। मुख्य पहाड़ी पर बारूद का भंडार भी मौजूद था। चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रवि प्रकाश बताते हैं कि भिवानी हड़प्पाकालीन संस्कृति का भी प्रमुख औद्योगिक केंद्र रहा है। जिले के तिगड़ाना व मिताथल में चूड़ियां बनाने की फैक्टरियां थीं, जिनकी जानकारी उत्खनन से मिली है। 

तोशाम की पहाड़ी पर चौथी-पांचवीं शताब्दी के शिलालेख तथा विष्णु मंदिर के अवशेष इस क्षेत्र के गुप्तकाल से ही महत्वपूर्ण होने का प्रमाण देते हैं। पृथ्वीराज चौहान ने इसे सैन्य ठिकाने के रूप में विकसित किया था। खनन गतिविधियों के कारण यह धरोहर आज जर्जर होती जा रही है। हालांकि हरियाणा सरकार ने हाल ही में पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1964 के तहत इसे राज्य संरक्षित स्मारक घोषित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। तोशाम निवासी वीरेंद्र संडवा कहते हैं कि वर्ष 2018 में पहाड़ी पर स्थापित वायरलेस सिस्टम पर कार्यरत पुलिसकर्मियों ने पानी की टंकियों को व्यवस्थित करने के लिए कुछ मलबा हटाया था।
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इसी दौरान उन्हें रेत से ढका एक पत्थर मिला, जिसे एक ओर रख दिया गया। इस पर नजर पड़ी, तो मैंने साफ कर पुरातत्व विभाग के तत्कालीन संरक्षक एस. पी. चालिया से संपर्क किया। चालिया ने इसे 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच की वामन अवतार की प्रतिमा बताया। भारतीय पुरातत्व विभाग को इस स्थल का वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन कराकर इतिहास के रहस्यों को नई पीढ़ी के सामने लाना चाहिए।
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