कहानी में जब बुधिया की मृत्यु हो जाती है, तो घीसू उसके क्रियाकर्म के लिए जमींदार से लेकर गाँव के बनिया-महाजनों तक से मंगनी करने पहुँच जाता है। जमींदार उसे बुरा मानते हुए भी पैसे दे देते हैं। बाकी जगहों से भी पैसे मिल जाते हैं। अनाज-लकड़ी भी मिल जाती है। गाँव के लोग अर्थी के लिए बांस इत्यादि काटने में लग जाते हैं। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि बुरे से बुरे व्यक्ति पर भी जब दुःख पड़ता है, तो समाज उसे संभाल लेता है। यह बात कफ़न के पैसों से पूड़ियाँ खा रहे घीसू-माधव की बातचीत में और बेहतर ढंग से स्पष्ट होती है।
माधव कहता है, “जब बुधिया मरने पर हमसे पूछेगी कि तुमने मुझे कफन क्यों नहीं दिया तो क्या कहेंगे ?”
इसपर घीसू जवाब देता है, “तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा?... उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!... वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया।“ यहाँ घीसू का इशारा समाज की तरफ ही है। वस्तुतः यथार्थ की इस क्रूर कथा में भी प्रेमचंद ने समाज की मानवीयता का एक सुंदर आदर्श गढ़ दिया है और निश्चित रूप से यह आदर्श खोखला नहीं है।
सारांश यह है कि प्रेमचंद यदि एक ही साथ बौद्धिक वर्ग और सामान्य जनमानस दोनों के बीच लोकप्रिय हैं, तो इसका कारण उनकी रचनाओं की सहज भाषा और आमजन से जुड़े विषयों के साथ-साथ यथार्थ में आदर्श की संभावना का संधान कर लेना भी है।
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